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सुल्तान
पहलवानी सुल्तानी मसाला बिरयानी


अब्बास अली ज़फर
लेखक व निर्देशक


























Movie Review
सुल्तान :पहलवानी सुल्तानी मसाला बिरयानी


अगर आप सलमान ख़ान के फ़ैन हैं तो आपको यह समीक्षा आपके लिए बिल्कुल नहीं है। अगर आप सलमान के एक दिन भाई-भाई टाईप फैन हैं तो आप इससे आगे बिल्कुल भी मत पढ़िएगा। हां, अगर आप शाहरूख़ ख़ान की फ़ैन वाले फैन हैं तो आप इसे अंत तक ज़रूर पढ़िए। अरे! अरे! रूकिए, सीधे क्लाईमैक्स पर मत जाईए! यहीं से पढ़ते जाई...

वह अपनी दमदार छाती दिखाता है। वह फ्रेम में आती है। वह पहली नज़र में प्यार में पड़ जाता, अपनी कलाबाज़ियां दिखाता है। वह उसके प्यार में पागल हो जाती है। एक अजीब से ढिनचक डांस स्टेप वाला गाना आता है। फिर अचानक एक ख़तरनाक उथल-पुथल होती है और लेंटर तोड़ एक्शन के साथ सब सुल्ट जाता है। अगर आप सलमान ख़ान की सुल्तान से इस तरह की उम्मीद कर रहे हैं तो आप बहुत ज़्यादा उम्मीद कर रहे हैं। इसमें भी कुछ-कुछ ऐसा होता है लेकिन दबंग स्टाईल में नहीं, यश राज स्टाईल में...

सुल्तान (सलमान ख़ान), अपने कारनामों के लिए मशहूर है, लेकिन उम्र तीन के पार हो चुकी है और अभी तक कुछ ढंग का हो नहीं पाया है, ख़ैर केबल का धंधा जमाने की कोशिश जारी है कि अचानक हरियाणी सुल्तान की टक्कर अंग्रेजी छोरी आरफां से हो जाती है। फिर क्या अपने प्रेम बाबू वाले अंदाज़ में शुरू हो जाता है देसी मेम को पटाने का सिलसिला, पर इस देसी मेम का ख़ून भी कम गर्म नहीं है, अरे ठहरी वो भी हरियाणी छोरी, मजनूं बने सुल्तान को बातों का ऐसा कस के रेवटा मारा कि दिमाग की चक्करघिन्नी हो गई। उसकी देसी दादी ने भी पते की बात यूं बताई कि हर छोरे की सफलता के पीछे किसी ना किसी छोरी का हाथ होता है। इससे पहले के सुल्तान अपनी होने वाली बीवी को चारों खाने चित करता उससे वह ही वह खुद धोबी पछाड़ खाकर औंधे मुंह गिर पड़ा जब पता चला के आरफा बीबी तो ख़ुद स्टेट चैम्पियन पहलवान है और तगड़े पहलवान की छोरी है। अब सुल्तान को ज़िंदगी का मकसद मिल गया और प्रेम बाबू को ख़ुद को सुल्तान साबित करने के लिए खूब दंड पेलने पड़े। उसके आगे जो भी होता है वह सब तो आपको पता भी है।

सुल्तान का पहला हिस्सा काॅमेडी, रोमांस और ड्रामा से भरपूर है, पटकथा ज़्यादा ढीली तो नहीं है लेकिन कुछ ज़्यादा ही खिची हुई है। पचास्सी मिनट के पहले हिस्से में जिस तरह से सुल्तान एक के बाद एक अख़ाड़े और प्यार की जंग बिना किसी ख़ास मुशक्कत के जीतता जाता है वह उनके फ़ैन्स से सीटियां तो निकलवा सकती हैं, लेकिन वह असलियत के रत्ती भर भी करीब नहीं लगती।  जनाब ज़फर अली साहब, मुझे उस पहलवान उस्ताद का पता तो दीजिए। असल में मैं भी तीस पार कर चुका हूं और अगर वह इस साल की स्टेट चैम्पियनशिप में एंट्री करवाने का वादा करें तो मैं आज ही उनका शागिर्द बन जाऊंगा।

लेखक व निर्देशक अब्बास अली ज़फर ने दमदार और सख़्त जान आर्फा के ज़रिए महिला सशक्तीकरण का पहलू छूने भर की कोशिश की है। शुरूआत में तो वह कन्या भ्रूण हत्या के मूल कारणों का ज़िक्र करते हैं लेकिन जैसे ही उसका निकाह हो जाता और वह गर्भवति होती है तो वह पूरी तरह से पितृसत्ता के सामने घुटने टेक देते हैं। सुल्तान जब महानायक बन जाता है तो सूरज की तरह धधकने वाली आर्फा एक घरेलु महिला की तरह पीछ धकेल दी जाती है और फिर एक टूटी हुई पत्नी और टीस से भरी मां के रूप में बुझते हुए दीपक की लौ की तरह फड़फड़ाती रह जाती है। अंत वह तन्हाई में डूबी हुई प्रेमिका व पत्नी के रूप में एक बार फिर उभरती है।

फ़िल्म का दूसरा लम्बा हिस्सा सुल्तान की ट्रेनिंग और मिक्सड मार्शल आर्ट स्टाईल कुश्ती के साथ बहुत ज़्यादा खिंचा हुआ है। यहां तक की क्लाईमैक्स से पहले का जाना-पहचाना भावनात्मक दृश्य भी भावनाओं के तार नहीं छेड़ पाता। आधुनिक शैली के कुश्ती के मैच बेहद फुर्तीले और विहंग्म अंदाज़ में फिल्माए गए हैं लेकिन यह भी कोई रोमांच पैदा करने में सफल नहीं होते।

सलमान ख़ान के साथ दमदार किरदार देकर अब्बास अली ज़फर ने अनुष्का शर्मा को एक बड़ा मौका दिया है, जिसमें वह एक दम खरी उतरी हैं। विश्व विजेता बन कर हस्पताल आने और दोबारा कुश्ती के अखाड़े में उतरने से पहले दरगाह में अनुष्का का सामना करने वाले दृश्यों में सलमान सटीक हाव-भाव लाने के लिए पूरा ज़ोर लगाते हुए दिखते हैं। यहां तक कि अपनी थुलथुली मोटी तोंद को आईने में देखने वाले दृश्य में भी वह काफी जदोजहद करते नज़र आए। सुल्तान की एक सबसे बड़ी ख़ामी है पचास साल के सलमान द्वारा तीस साल के लड़के का निभाया किरदार। एक भी दृश्य में वह कहीं से भी तीस के नहीं लगे हैं। इसी वजह से उनसे बेहद कम उम्र अनुष्का के साथ उनकी जोड़ी में वह आत्मीयता महसूस नहीं होती। अरे ज़फर साहब मेरा पड़ोसी राम खिलावन, उम्र पचास और ख़ालिस कुंवारा पूछ रहा था वह अपनी अनुष्का को कैसे पटाए, कोई फार्मुला ही बता दीजिए।

रणदीप हुड्डा अपने छोटे से किरदार में पूरे दमदार नज़र आए हैं। सुल्तान के दोस्त गोविंद के किरदार में अनंत शर्मा के संभावनाशील चरित्र अभिनेता के रूप में उभरे हैं। खिलंदड़े अंदाज़ में अमित साध गमगीन दूसरे हिस्से में यौवन और रोमांच भरते हैं। सुल्तान की दादी का किरदान निभा रही अभिनेत्री का अंदाज़ भी मन मोह लेता है।

यू ंतो बेबी को बेस पसंद है गीत इन दिनों सभी डीजे के स्पीकर फाड़ने पर उतारू है लेकिन फिल्म का गीत-संगीत पटकथा में कोई ख़ास रंग नहीं भरता। सबसे अजीब लगा है राहत फतेह अली ख़ान के मीठे प्रेमगीत को नाईट क्लब में फिल्माया जाना। माननीय ज़फर साहब कृपया बताने का कष्ट करें कि डीजे वाले बाबू मेरा गाना बजा के दौर में जन्मदिन की पार्टी में कौन सुगम संगीत सुनने नाईट क्लब जाता है। सिर आपको याद दिला दूं, बेबी को बेस पसंद है। इस बार इरशाद कामिल के गीतों पर भी बंबईया फिल्मों का रंग चढ़ा हुआ महसूस होता है। फ़िल्म में बार-बार बनजे वाला सुल्तान का टाईटल गीत बस आबरू बचा गया है। सिनेमेटोग्राफ़र अर्तुर ज़ूरावस्की ने देसी अख़ाडों को विहंग्मता से पर्दे पर उतारा है। 

हां सुल्तान पूरी तरह से सलमान ख़ान के रंग में डूबी हुई है। एक सैकेंड रूकिए, जैसे कि मैंने शाहरूख़ ख़ान के फै़न्स से वादा किया था तो बता दूं कि सुल्तान को शाहरूख़ ख़ान के रोमांस का अंदाज़ बहुत पसंद है। यकीन नहीं आता तो खुद जा के देख लीजिए।

मेरी तरफ से पहलवानी सुल्तानी मसाला बिरयानी को 2 सितारे...



   दीप जगदीप सिंह

दीप जगदीप सिंह स्‍वतंत्र पत्रकार, पटकथा लेखक व गीतकार हैं।. https://www.facebook.com/deepjagdeepsingh

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