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शोरगुल
दमदार संवादों का शोरगुल


























Movie Review
शोरगुल:तामजाम के शोर में कहानी गुल


निर्देशक  : प्रणव कुमार सिंह और जीतेंद्र तिवारी

कलाकार : आशुतोष राणा, जिमी शेरगिल, संजय सूरी, नरेंद्र झा, सुहा गोजेन, दीपदास राणा, हितेन तेजवानी, एजाज खान

                

कई बार फिल्म देख कर एक आह-सी निकलती है। शोरगुल देखने बाद भी कुछ ऐसा ही होता है। देश के वर्तमान माहौल को ध्यान में रख कर लिखी गई फिल्म शोरगुल की कहानी में वो सब कुछ है जो एक अच्छी फिल्म के लिए जरूरी होता है। मसलन दमदार किरदार, शानदार संवाद, बेहतरीन कलाकार और संवेदनशील मुद्दा। बावजूद इसके फिल्म में एक अधूरापन है। फिल्म की कहानी उत्तर प्रदेश के एक कस्बाई इलाके की है। जिसके बहाने देश के वर्तमान माहौल को दिखाने की कोशिश की गई है। पर सबसे बड़ी समस्या यह है कि फिल्म बदलते सामाजिक परिवेश को दिखाने के लिए एक पुरानी कहानी का सहारा लेती है। हिंदू नायक और मुस्लिम नायिका। यह बताने की जरूरत नहीं है कि हिन्दी फिल्म के इतिहास में इस तरह की कितनी फिल्में बन चुनी हैं। वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिवेश में इस प्रेम कहानी को फिट करने की कोशिश दर्शकों को पसंद नहीं आती है और फिल्म वह कहने में सफल नहीं हो पाती जो वह कहना चाहती है।

दरअसल 2013 में हुए मुजफ्फरनगर के दंगे ने भारतीय राजनीति के समीकरण बदल दिये थे। इस घटना के बाद से ‘लवजेहाद’, ‘घर वापसी’ और ‘गौ माता’ जैसे कई मुद्दे देश की राजनीति में आए और लंबे समय तक मीडिया में चर्चा का विषय भी बने। साथ ही साथ कुछ नायकों का उभार भी हुआ। हिन्दुत्व के फायर ब्रांड, मुस्लिम सरपरस्त और सेक्युलर जैसे शब्द मुजफ्फरनगर दंगे के बाद आम लोगों की जुबान पर चढ़ गए। लेखक ने इन्हीं घटनाओं को शब्दों में पिरोकर फिल्म शोरगुल की कहानी तैयार की है।    

इसीलिए फिल्‍म के किरदार और वास्तविक जीवन के किरदारों में समानता देखने को मिलती है। यही वजह है कि फिल्म में हिन्दुत्व के फायर ब्रांड नेता रंजीत ओम बड़ी सहजता से संगीत सोम की और मुस्लिम नेता अलीम खान का किरदार आजम खान की याद दिलाने लगते हैं। वहीं दूसरी तरफ हाथों में लहराते हथियार और संवादों में हर हर महादेव, घर वापसी, गौमाता जैसे दूसरे भड़काऊ शब्‍द कुछ देर के लिए पर्दे पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सांप्रदायिक माहौल को जीवंत कर देते हैं। लेकिन इन सब के बीच एक बेजान-सी लव स्टोरी शोरगुल को एक घिसीपिटी मेलोड्रामा में बदल देती है, जिसमें तलवारधारी ‘मुसलमानों’ और त्रिशूलधारी ‘हिंदुओं’ के बीच खूनी संघर्ष होता है और अंत में पता चलता है कि कहानी पूरी फिल्मी है। इसमें सिर्फ रियालिज़्म का तड़का भर है।

फिल्म की कहानी तीन किरदारों के आसपास घूमती है। विधायक अजय ओम (जिमी शेरगिल), कस्बे का बाहुबली हिंदुवादी नेता है। विधायक अपने पार्टी का धौंस दिखाकर लोगों की जमीन हथियाता है, लेकिन एक दिन जब ओम के गुर्गे एक मुस्लिम किसान की जमीन हथियाने पहुंचते हैं तो बवाल हो जाता है। जिसे चौधरी साहब (आशुतोष राणा) हस्तक्षेप कर शांत करवा देते हैं। चौधरी का इलाके में दबदबा है। वो हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक हैं। ये बात ओम के लिए परेशानी का सबब है, क्योंकि उसे अगले साल एमपी का चुनाव लड़ना है। ओम को चौधरी का तोड़ जेनब (सुहा गजेन) में दिखाई देता है, जो चौधरी के बेटे रघु (अनिरुद्ध दवे) की दोस्त है। जेनब की शादी सलीम (हितेन तेजवानी) से होने वाली है और सलीम के भाई मुस्तकीन (एजाज खान) को जेनब का रघु संग उठना-बैठना पसंद नहीं है।

 

इस पूरे घटनाक्रम का फायदा ओम बड़ी चलाकी से उठाता है और जेनब-रघु की दोस्ती को सांप्रदायिक रंग दे देता है। शहर में दंगे हो जाते हैं, जिन्हें हवा देने में प्रदेश सरकार का एक मंत्री आलम खान (नरेन्द्र झा) भी पीछे नहीं है।

फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसके संवाद हैं। पर निर्देशक शानदार संवादों और दमदार कलाकारों का सही उपयोग करने में सफल नहीं हो पाए हैं। फिल्म के एक दृश्य में एक डायलॉग है- “सुरेश मरे या सलीम, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।” यह संवाद बहुत प्रभावशाली है लेकिन कमजोर निर्देशन की वजह से इसके जैसे बहुत- से संवाद दर्शकों पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाते। फिल्म के कई दृश्य आवश्यकता से ज्यादा लाउड हैं। लेखक ने समस्याओं को कहने के लिए हिंदीन फिल्मों का पुराना तरीका ही अपनाया है। पूरी फिल्म न तो लेखन में कुछ नया दिखाती है न निर्देशन में। फिल्म के संवादों को प्रभावहीन बनाने में बैकग्राउंड म्यूजिक का पूरा योगदान है। छोटे से छोटे संवाद पर बैकग्राउंड म्यूजिक का उपयोग इस आक्रामकता के साथ किया गया है किरदारों के संवाद और अभिनय की बारीकियाँ भावनात्मक स्तर तक नहीं पहुंच पातीं। तमाम बातें भाषण लगती हैं। ऐसा लगता है कि तमाम किरदार किसी रटे-रटाए फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं। फिल्म की कहानी में दर्शाए गये विभिन्न पहलुओं पर ऊपरी स्तर पर काम किया गया है। तथ्यों में गहराई और गंभीरता का अभाव है। बार-बार यही लगता है कि फिल्म को केवल सनसनी फैलाने के लिए बनाया गया है, क्योंकि इसमें जो बातें दर्शाई गयी हैं, उनसे कुछ सार्थक होता नहीं दिखता। दंगे के बाद विस्थापन की मार झेलने वालों और कैंपों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर असहाय जिंदगियों पर यह फिल्म खामोश रहती है। इसकी एकमात्र सफलता जिमी शेरगिल और नरेंद्र झा जैसे कुछ काल्पनिक पात्रों के बहाने उन राजनीतिक लोगों (और कुछ हद तक राजनीतिक पार्टियों) पर उंगलियां उठाने की हिम्मत करना है जो कथित तौर पर मुजफ्फरनगर दंगों में शामिल माने जाते रहे हैं।

 



   रुद्र भानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं।.

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