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7 Hours to Go!!
सारा सत्यानाश


Saurabh Varma
Writer - Director


























Movie Review
7 Hours to Go..!!:सात का सत्यानाश


7 Hours to Go :
सात का सत्यानाश

लेखक – निर्देशक : सौरभ वर्मा

निर्माता : निकिता ठाकुर

संगीत : हनीफ शेख – सुगत शुभम

सिनेमैटोग्राफर : मिलिन्द जोग

संकलक : नितिन

कलाकार : शिव पंडित, संदीपा धर, नताशा स्टैनकोविक, रोहित वीर व वरुण बडोला

“सेवन आवर्स टू गो” एक थ्रिलर ड्रामा है. पब्लिसिटी भी इसी तरह की है. सात बंधक और सात घंटे...! फिल्म की शुरुआत बड़े ही धांसू अंदाज में होती है. लोकेशन, कैमरा वर्क, म्यूजिक और डायरेक्शन सब बड़ा ही विस्मित करनेवाला है, लेकिन कुछ देर बाद ही फिल्म की कलई खुलने लगती है. फिल्म के दृश्य कहानी की पगडंडी को छोड़कर जैसे तैसे भागने लगते हैं. दृश्य दर दृश्य निर्देशक अपनी काबिलियत को स्टैबलिश करता जाता है. अभिनेता वरुण बडोला एसीपी धड़के नामक बड़े काबिल पुलिस अफसर के तौर पर रुपायित होते हैं. फिल्म का नायक अर्जुन रणावत (शिव पंडित) भी जबरदस्त तरीके से परदे पर स्टैबलिश होता है. हीरोइन एसीपी शुक्ला (संदीपा धर) को खास पुलिस अधिकारी के तौर पर प्रकट किया जाता है. एक एक दृश्य एक एक चरित्र इस तरह सामने आता है कि आँखें फटी रह जाती हैं, लेकिन मन भटकता रहता है कि कहानी क्या है यार...? जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है बेचैनी बढ़ती जाती है, ये सब हो क्या रहा है ?! बहुत उलझन है! कहानी का कोई ओर छोर ही समझ में नहीं आ रहा है! बहुत बाद में समझ में आता है कि हीरो अपनी प्रेमिका की मौत का बदला लेने मुम्बई आया है. ओह !

बदले पर हिन्दी की 70 प्रतिशत फिल्में बनती हैं, लेकिन इस तरह की बदले वाली फिल्म आज तक नहीं देखी थी. फिल्म की दिक्कत यह है कि निर्देशक सौरभ वर्मा ही फिल्म के लेखक भी हैं. और इस फिल्म को उन्होंने एक लेखक नहीं, निर्देशक के तौर पर लिखा है. लेखक कहानी का सिरा पकड़ पटकथा लिखता है और उसी के अनुसार संवाद भी लिखता है. लेखक कहानी को उलझाता नहीं, बल्कि उलझी हुई कहानी को भी इस तरह पटकथा में सुलझाता है कि लेमैन दर्शक को भी फिल्म समझ में आ जाती है. क्योंकि जबतक दर्शक फिल्म को समझेगा नहीं, वह उससे जुड़ेगा नहीं, फिल्म को इंज्वाय नहीं करेगा. इस फिल्म के साथ यही दिक्कत है. फिल्म को हम इंज्वाय नहीं कर पाते हैं. दृश्यों का प्रस्तुतिकरण बड़ा ही भव्य है. लोकेशन से लेकर टेकिंग और एक्शन सबकुछ भव्य है, लेकिन पटकथा बेहद ही लचर है, नतीजा फिल्म अपने मकसद से फिसल जाती है. लेखक निर्देशक ने फिल्म में रोमांस और रिलीफ के अवसर नहीं रखे हैं, इसलिए संवाद के माध्यम से रिलीफ देने की कोशिश है, लेकिन असर होता यह है कि संवाद फूहड़ और खामखा के लगते हैं. और फिल्म की गंभीरता से भी मेल नहीं खाते. हालाँकि इस तरह के ऑपरेशन के दौरान पुलिस अफसर किस तरह से रिएक्ट करते हैं, यह यथार्थ रूप में दिखाने की कोशिश है, लेकिन गड्डमड्ड पटकथा की वजह से सारी और सबकी मेहनत का तेल हो गया है.

वरुण बडोला, संदीपा धर, शिव पंडित से लेकर छोटे से रोल में नताशा तक ने बेहतर अभिनय किया है, लेकिन...! सिनेमैटोग्राफर मिलिंद जोग का कैमरा वर्क कमाल है, लेकिन...! स्टंटमास्टर का काम भी जबरदस्त है, लेकिन...! निर्देशक ने भी तकनीकी तौर पर अपना द बेस्ट देने की कोशिश की है, लेकिन...! बिल्कुल ही नये स्टारकास्ट की फिल्म को अच्छी रिलीज भी मिली है, लेकिन...! लेकिन लेकिन लेकिन... अनप्रोफेशनल पटकथा ने सारा गुड़ गोबर कर दिया है.

लेखक-निर्देशक सौरभ वर्मा पटना के हैं. लंबे समय से फिल्म मार्केंटिंग से जुड़े रहे हैं. बड़ी बड़ी फिल्म कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं, इसलिए वह फिल्म को प्रजेंटेबल प्रोजेक्ट के तौर पर पेश करने में कामयाब भी रहे हैं, लेकिन यह फिल्म, फिल्म सिर्फ प्रोजेक्ट नहीं होती, यह मार्केटिंग हुनर को सबसे ऊपर का शिल्प मानने वालों के लिए समझने का अवसर देती है. स्क्रिप्ट किसी भी फिल्म का आधार है और स्क्रिप्ट रायटर उस आधार का शिल्पकार. इसलिए स्क्रिप्ट रायटर को ओवरपावर करके कोई भी अच्छी फिल्म नहीं बनाई जा सकती.  सौरभ वर्मा ने इस फिल्म की कहानी एक सच्ची घटना से प्रेरित होकर गढ़ी है. शायद आपको याद हो, कुछ साल पहले पटना का एक युवक कथित तौर राज ठाकरे को मारने के ख्याल से मुंबई आया था और बेस्ट की एक डबल डेकर बस में मुम्बई की बहादुर पुलिस ने उसका एनकाउंटर कर दिया था. वह युवक यहाँ क्या वाकई राज ठाकरे को मारने आया था, यह आज भी रहस्य है. हालाँकि पुलिस का दावा था कि वह इसी मकसद से आया था. बहरहाल सौरभ वर्मा बेहतर फिल्म बना सकते थे, लेकिन कमजोर सिर्फ पटकथा की वजह से ढप्प हो गये !     

धनंजय कुमार  



   Dhananjay Kumar

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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