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रमन राघव 2.0
जब कातिल से प्यार हो जाए


अनुराग कश्यप
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
रमन राघव 2.0:जब कातिल से प्यार हो जाए


निर्देशक : अनुराग कश्यप

निर्माता : मधु मंटेना, अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवाने

संगीत : राम सम्पत

कलाकार : नवाजुद्दीन सिद्दीकी, विकी कौशल, शोभिता धुलिपाला

मुंबई बरसात में भीग रही थी और बाइस्कोप बाबा दबा के भाजिया खा रहे थे। आस-पास बैठे अंटर-पंटर बाबा के ज्ञान से आई बाढ़ में तैर रहे थे। वैसे मुंबई और बाइस्कोप बाबा में यही तो समानता है। जरा-सी बारिश हुई नहीं की मुंबई में बाढ़ आ जाती है और बाबा ने मुंह खोला नहीं कि भक्त गोता लगाने लगते हैं.....बाबा के ज्ञान की दुकान में माहौल बना हुआ था। मैं सामने से गुजर ही रहा था कि बाबा कि नजर अचानक मुझ पर पड़ी।

“कहाँ जा रहे हो बालक ”

मैंने कहा “बाबा चलो रमन राघव 2.0 दिखा लाते हैं।”  

 बाबा- “नहीं बालक तुम अकेले ही जाओ। इस रोमांटिक मौसम में अनुराग कश्यप की मूवी देख कर मिजाज की ऐसी की तैसी नहीं करनी है।”

बाबा का बेरुखी भरा जवाब सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने पलट कर जवाब दिया “आप अनुराग के बारे में ऐसे कैसे बोल सकते हैं। वह आज के दौर के सबसे बड़े रियलिस्टिक फिल्म मेकर हैं”

“भाग भो....(गाली)" 

बाबा के मुंह से अचानक राग आग सुन कर मैं ताव में आ गया। कुछ बोलता इसके पहले ही बाबा बोल उठे-

“यही रियाल्टी तुम 250 रुपये देखते, मैंने फ्री में दिखा दी।"

बाबा की बात सुनकर अंटर-पंटर ज्ञान के बाढ़ से बाहर निकालकर दांत चियार के हंसने लगे। गुस्सा तो खूब आया पर मैं बिना कुछ बोले निकल गया।

      फिल्म देख कर जब वापस आया तो महफिल वैसे ही जमी हुई थी। मुझे देखते ही बाबा ने गब्बर वाला डायलॉग मार दिया - "कितने आदमी थे"

मैं- "बाबा थिएटर पूरा भरा हुआ था"

बाबा- "पानी से की आदमी से"

मैं- ''बाबा ये अनुराग की फिल्म है। अनुपम खैर की नहीं"

बाबा- "बालक बॉम्बे वेलवेट भी उसी की फिल्म थी"

मैं- "पर बाबा दोनों में बहुत अंतर है"

बाबा - "क्या इस फिल्म में तरह-तरह की गालियां नहीं हैं। बिना बात के हिंसा और जरूरत से ज्यादा ड्रार्कनेस नहीं है। बेटा कुल मिला के अनुराग अपनी खुजली मिटाने के लिए ये सब करता है और तुम जैसे अज्ञानी लोग इसे रियलिस्टिक सिनेमा कहने लगते हो।"

मैं-  “बाबा इसमें भी वो सब है मसलन कई तरह की गालियां है.... तंग बस्तियों की गलियां हैं, खस्ताहाल बिल्डिंग्स, कीचड़ और सड़क पर पसरी गंदगी है और इन सब के बीच एक वहशी कातिल है। जिसे कत्ल करने में मज़ा आता है। या यूं कहें तो कत्ल करने के पीछे उसका अपना तर्क है। वह कहता है- ‘आदमी जैसे खाना खाता है, हगता है, वैसे ही क्राइम भी करना चाहता है।’ यह कातिल इतना वास्तविक है कि बिना चीखे, बिना किसी बनावटी अभिनय के पर्दे पर डर पैदा कर देता है। अनुराग इस डर के बहाने जिंदगी के अंधेरे को दिखते हैं। यहां कोई उम्मीद नहीं है....कोई संदेश नहीं है सिर्फ एक कातिल है.... मानसिक रूप से बीमार कातिल। यह कातिल भगवान से बातें करता है और जब चलता है तब उसे सड़क पर शतरंज के सफेद और काले खाने दिखाई देते हैं। वह सिर्फ काले पर चलता है। सफेद पर पैर रख दिया तो आउट। यदि काले पर कोई आदमी बैठा या लेटा हो तो वह उसकी हत्या करने में जरा भी संकोच नहीं करता। बिलकुल जानवरों जैसी प्रवृत्ति....दरिंदा इतना कि बहन का भी बलात्कार करता है और उसके परिवार को भी मौत के घाट उतार देता है।”

बाबा- “मतलब इसमें भी वही सब है जो अनुराग की बाकी फिल्मों में रहता है। बालक जब फिल्म कोई संदेश ही नहीं देती...पूरी स्क्रिप्ट खून से लतफत है...कहानी के नाम पर एक कातिल है जिसके बारे में पहले से पता है। खुद  अनुराग कश्यप ने रमन के किरदार के बारे में पहले ही साफ कर दिया है कि फिल्म कुख्यात हुए सीरियल किलर रमन की जिंदगी से प्रेरित है, जिसने 41हत्याएं की थीं। फिर नया क्या है इसमें?”

मैं- “बहुत कुछ। फिल्म सिर्फ रमन के किरदार से प्रेरित है। उस पर आधारित नहीं है। इस फिल्म को वासन बाला और अनुराग कश्यप ने लिखा है। रमन के साथ राघव के किरदार को काल्पनिक रूप से गढ़ा गया है। एक तरह से दोनों की तुलना करने की कोशिश है। दोनों हिंसक हैं... दोनों खूनी हैं...एक वर्दी दोनों में फर्क करती है पर यह कहना बहुत कठिन है कि  रमन ज्यादा क्रूर है या राघव। रमन हत्या करते समय न धर्म की आड़ लेता है न दंगों की। उसे हत्या करने में एक मजा मिलता है। दूसरी ओर राघव का मिजाज भी पाशविक किस्म का है, लेकिन वह जिन लोगों को मारता है उसमें उसका स्वार्थ है। फिल्म की शुरुआत में इन दोनों में काफी अंतर दिखाई देता है, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है दोनों के बीच धुंधला पड़ने लगता है और अंत में रमन और राघव एक हो जाते हैं।”

बाबा- “बलाक तुम्हारी बातों से तो फिल्म बदलापुर की याद आ रही है। कहीं मामला टीपने का तो नहीं है। क्योंकि बदलापुर में भी एक राघव (वरुण धवन) था?”

मैं- “नहीं बदलापुर और रमन राघव 2.0 हर तरह से अलग है। किरदार के स्तर पर भी। दोनों किरदारों का मनोविज्ञान बिलकुल अलग-अलग है। हाँ फिल्म देख कर एक बात तो लगती है कि अनुराग पर अभी भी क्वेंटिन टेरेंटिनो की फिल्मों का जादू छाया हुआ है। वह उनकी असर से निकाल ही नहीं पा रहे हैं।”

बाबा- “बालक अब सही लाइन पर आए हो। देखो तुम्हारे खूनी फिल्मी दर्शन के चक्कर में मेरे कितने पंटर रफूचक्कर हो गए। अब ये बताओ कि तुम्हारी नजर में फिल्म की कमियाँ क्या-क्या हैं?”

मैं- “कहानी का तो आपको पता चल ही गया होगा। कहानी बहुत लंबी नहीं है इसलिए पूरी फिल्म नवाज के अभिनय पर टिकी है। जिस अंदाज में वह कत्ल करता है, उसे देख कर एक बार तो कातिल से ही प्यार हो जाता है। हां लेखन के मामले में फिल्म कई जगह कमजोर पड़ती है। कुछ ऐसी गलतियां भी हैं जो फिल्म का मज़ा किरकिरा कर देती हैं। जैसे पुलिस और कातिल को पकड़ने में थ्रिल पैदा करने के बजाय निर्देशक रमन और राघव को दिखाने में जरूरत से ज्यादा सिनेमैटिक लिबर्टिज़ ले लेते हैं। पर अनुराग ने लेखन की इस कमी को अपने निर्देशन से पूरा किया है। फिल्म में कई शॉट्स दिखाए हैं जो रमन की मानसिकता स्थापित करते हैं। निर्देशक ने हिंसा के बहुत सारे दृश्यों को दर्शकों की कल्पना पर छोड़ दिया है। जैसे वह कभी परछाई के सहारे रमन को हत्या करते हुए दिखाते हैं तो कभी फर्श पर पसरा खून और पांच दिन पुरानी लाश देख कर दी दर्शक दहल उठते हैं। फर्स्ट हाफ तक तो फिल्म का तेजी से चलती है, लेकिन इसके बाद फिल्म खींची हुई लगाने लगती है। स्क्रीनप्ले के हिसाब से भी फिल्म फीकी ही पड़ जाती है। नवाज पूरी फिल्म में अपने अभिनय की बदौलत रंग जमाते हैं। विकी कौशल ने भी अच्छा काम किया है पर नवाज के आगे कुछ और दिखाता ही नहीं है।”

बाबा- “बालक मुझे तो लगा था कि ‘बॉम्बे वेलवेट' की लुटिया डूब जाने के बाद अनुराग अपने फिल्म की स्क्रिप्ट और लम्बाई जरूर कम करेगा। पर उसका दिल तो मानता ही नहीं। लगता है कि वह हर फिल्म को खींच कर वासेपुर बना देगा”

यह कह कर बाबा बड़ी तेजी से खड़े हुए और अपने एक पंटर को ज़ोर-ज़ोर से गाली देने लगे। मैंने पूछा “ क्या हुआ बाबा। आलोक नाथ से आप अचानक अमरीश पूरी क्यों बन गए”

बाबा मुस्कुराते हुए बोले – “अन्यथा न लो बालक मैं भी रियलिस्टिक सिनेमा बनाने की तैयारी कर रहा हूं ”          



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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