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धनक
उम्मीदों की सतरंगी कहानी


नागेश कुकुनूर
निर्देशक-लेखक


























Movie Review
धनक:उम्मीदों की सतरंगी कहानी


लेखक-निर्देशकः नागेश कुकुनूर

कलाकार - कृष छाबड़िया, हेतल गाडा

बाइस्कोप बाबा बड़े मूड में थे...रह-रह कर मुस्कुरा रहे थे। कभी अपनी सूरत आईने में निहारते तो कभी आँखें बंद करके दांत निपोरने लगते। उनका रहस्यमयी अंदाज देख कर जब अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया तब मैंने पूछ ही दिया “बाबा बात  क्या है...आँख मूँद के दांत निपोर रहे हो। "फिर से सैराट देख ली क्या?” जवाब में बाबा ने कागज का एक पर्चा आगे बढ़ा दिया। पर्चा क्या था किसी फिल्म का टिकट था। शायद बाइस्कोप बाबा को फिर से कोई फिल्म पसंद आ गई थी। जब तक मैं मामले को समझा बाबा भी मूड में आ गए और ज्ञान देना शुरू कर दिया।

‘हाँ तो बालक कैसी लगी नागेश की धनक। बड़ा अच्छा सिनेमा बनाता है। मैंने तो जब पहली बार हैदराबाद ब्लूज देखी थी तभी समझ गया था कि बालक में प्रतिभा कूट-कूट कर भरी है............’ मैं अब भी बाबा का चेहरा निहार रहा था और बाबा दनादन कुकुनूरपीडिया के पन्ने पलट रहे थे। मैं तो बस इसी इंतजार में था कि हैदराबाद ब्लूज, डोर, इकबाल से शुरू हुआ यह काफिला धनक पर कब पहुँचती है। पर उनके कैमरे की मेमोरी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। बाबा अभी फ्लैश बैक में ही बीजी थी कि मैंने एक सवाल दाग दिया।

‘क्या धनक भी कुकुनूर की बाकी फिल्मों जितनी ही सटीक और शानदार है?’

सवाल सुनकर बाबा ने ऐसा मुंह बनाया जैसे किसी ने उन्हें हाउसफुल-3 दिखा दी हो। फ्लैश बैक से निकालकर वह क्लाइमेक्स में प्रवेश करते हुए बोले- “बेटा तुम नहीं समझ पाओगे। जब सिनेमाई शोरगुल के बीच एक छोटी-सी कहानी दिल को छूती हुई निकल जाए तो उसे धनक कहते हैं। जब फिल्म में दिखने वाला हर दृश अपना-सा लगने लगे तो वह धनक कहलाती है। जब राजस्थानी लोक के साथ वेस्टर्न का फ्यूजन दिलों-दिमाग पर छा जाए तो उसे धनक........’
‘बाबा ये तो मुझे पता चल गया कि धनक किसे कहते हैं? पर आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया? आप भी ‘उड़ता पंजाब’ की तरह पंजाब का सच दिखाने की बजाय कुछ और ही सच दिखाने लग गए? सीधे-सीधे जवाब दीजिए।”          
दुबारा सवाल सुनकर बाबा समानान्तर सिनेमा वाले मोड में चले गए। चेहरे पर गोविंद निहलानी के फिल्मों सी शांति छा गई और मुंह से श्याम बेनेगल जैसे संवाद निकलने लगे- “बेटा नागेश की ‘धनक’ इस दौर की सबसे अच्छी कहानियों में से एक है। धनक पाउलो कोएल्‍हो की अलकेमिस्‍ट की याद दिलाती है। गुम होते रिश्तों के बीच भाई-बहन के प्यार और संघर्ष की कहानी हमें फिल्म से जोड़ती है। निकम्मा चाचा-चुड़ैल जैसी चाची…..नयनाभिराम राजस्थान और शाहरुख़ का बखान। सब कुछ कितना स्वाभाविक लगता है । राजस्थान की लोकगीत पर थिरकते लोग और भाई को आंखें दिलाने के लिए शाहरुख़ को रोज चिट्ठी लिखती एक लड़की..... तुम्हें पता है यह सिर्फ चिट्ठी भर नहीं है.... यह उन करोड़ों भारतीयों का विश्वास है जो फिल्मी सितारों को अपना भगवान मानते हैं। नागेश अपनी फिल्मों में इन्हीं भावनाओं को अपने कैमरे की नजर देते हैं। इसीलिए न तो फिल्म इकबाल का नायक नाउम्मीद होता है न ही डोर फिल्म की नायिका ज़ीनत का विश्वास टूटता है। धनक की परी भी अंत तक संघर्ष करती है और नागेश वह कहने में कामयाब हो जाते हैं जो वह कहना चाहते हैं।”

“बाबा आपकी बातों से एक बात तो साफ है कि आप नागेश से बहुत प्रभावित हैं। पर ये बताइये फिल्म में कहानी कहां है? यथार्थ के रास्ते पर बड़ी सहजता से चल रही कहानी अचानक ट्रैक बदलकर फिक्‍शन के बनावटी रास्ते पर क्यों दौड़ने लगती है? फिल्म में अचानक से किरदार आते हैं और गायब हो जाते हैं ऐसा क्यों? फिल्म के एक दृश्य में बंजारों की जादुई सरदारन की अचानक इंट्री भी ऐसा ही रहस्य है जो दर्शकों की समझ में नहीं आता। फिल्म के सेकेंड हाफ में तो ऐसा लगाने लगता है कहानी रिपिट हो रही है। फिल्म के कई किरदार ऐसे हैं जिन्हें निकाल दें  तब भी कहानी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा और सबसे बड़ी बात आपको नहीं लगता कि बच्चे शाहरुख़ तक पहुंचने में काफी समय लगा देते हैं और ज्यादा समय लगता देख नागेश फटा-फट क्लाइमेक्स को समेट लेते  हैं। आप जिस उम्मीद की बात कर रहे हैं वह उम्मीद यहां चमत्कार में बदल जाती है। आखिर यह धनक इतना चमत्कारी क्यों है ”

सवालों को सुनकर बाबा मुस्कुराने लगे।

“बेटा फिल्म चमत्कारी इसलिए है क्योंकि इसमें बेहतरीन संगीत है, अच्छे संवाद हैं, होंठो पर मुस्कुराहट बिखेरते भाई-बहन के खट्टे-मिट्ठे नोकझोंक हैं। और सबसे बड़ी बात भाई-बहन के रोल में कृष छाबरिया और हेतल गाड़ा जैसे शानदार बाल कलाकार हैं....  और बेटा जब इतनी चीजें एक साथ एक ही फिल्म में समां जाएगी तो फिल्म चमत्कारी कैसे नहीं होगी।”

पता नहीं आप मेरे सवालों और बाइस्कोप बाबा की बातों से कितने संतुष्ट हुए पर मैं तो बाबा के जवाब का कायल हो गया। आरक्षण में तो प्रकाश झा ने इंटरवल के बाद कहानी बदल थी .... पर यहां तो बाबा रे बाबा 



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं।.

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