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ट्राफिक
रिश्तों की कशमकश


राजेश पिल्लै
निर्देशक


संजय प्रकाश
लेखक


























Movie Review
Traffic:हादसे में रिश्तों की कशमकश


हादसे में रिश्तों की कशमकश है ‘ट्रैफिक’

हादसे इंसान की जिंदगी बिखेर देते हैं, वहीं कई बार हादसों से मिली अंर्तप्रेरणा हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव भी लाती है। जिससे हम कुछ गंवाकर, बहुत कुछ पा लेते हैं। ऐसी ही कई पंक्तियां मन में उमड़ने लगती हैं जब इस शुक्रवार को रिलीज हुई स्वर्गीय राजेश पिल्लई निर्देशित फिल्म ट्रैफिक को हम देखते हैं। एक सत्य घटना से प्रभावित ट्रैफिक देखने जाते समय हम एक हादसा और उससे प्रभावित कुछ किरदारों की बात सोचते हैं लेकिन इन किरदारों के बीच रिश्तों की उलझनें हमें अंदर से पकड़ती है।

बॉबी संजय की कहानी, सुरेश नायर की पटकथा और पियूष मिश्रा के संवादों से सजी फिल्म ट्रैफिक की कहानी के मुताबिक 25 जून 2008 की सुबह एक कार एक बाइक को टक्कर मार देती है। इस टक्कर में बाइक पर पीछे बैठा युवा रेहान (विशाल सिंह) जो  एक समाचार चैनल का ट्रेनी रिपोर्टर है, ऐक्सीडेंट के बाद मरणासन स्थिति में पहुंच जाता है। इसी घटना से थोड़े समय पहले ही दिखाया जाता है कि पुणे के एक अस्पताल में भर्ती अभिनेता देव कपूर (प्रसन्नजीत) की बेटी को हार्ट की जरूरत है । ऐसे में रेहान के माता पिता थोड़ी समझाइस के बाद रेहान का हार्ट अभिनेता देव कपूर की बेटी को देने के लिए राजी हो जाते हैं।

लेकिन उस समय तक वक्त बहुत कम बचा है। ऐसे में सड़क मार्ग से मुंबई से पुणे तक इस हार्ट को पहुंचाने की जिममेदारी मुंबई ट्रैफिक पुलिस का एक कॉस्टेबल गोडबोले (मनोज बाजपेयी) लेता है, जो काफी समय से रिश्वत लेने के मामले में सस्पेंड पड़ा है। और उसी दिन उसने नौकरी फिर से ज्वाइन की है। गोडबोले मुंबई से हार्ट लेकर पुणे के लिए निकलता है। उसे नियत समय में पुणे पहुंचना है।  उसकी मुश्किल यात्रा को अंजाम के साथ कहानी खतम होती है। इस दौरान रिश्तों का रसायन बिखरता है जिसमें एक मां अपने बेटे को गंवाकर दूसरी मां की प्यारी सी बेटी को बचा लेती है। एक पति डॉ एबल (परमब्रत चटर्जी) जो पत्नी की बेवफाई से गुस्से में आकर उसे खत्म कर डालने को तत्पर है, वो अपनी पत्नी के जीवित होने पर अंदर से जी उठता है। एक बाप अपने बेटे को गंवाकर उसके साथ लिव इन में रही लड़की को बेटी मान अपने घर बुला लेता है। एक बेटी जो अपने पिता पर लगे रिश्वतखोरी के दाग से व्यथित है, घटना के बाद वो अपने पिता के हौसले को देख उसे पहचान पाती है। परिस्थितिवश रिश्वतखोर बना एक इंसान जो एक हत्या के आरोपी को सुधरने का अवसर देता है।

 लेकिन निर्देशकीय प्रस्तुति के लिहाज से फिल्म इटंरवल के बाद ढीली हो जाती हैं। और इसमें डॉ एबल और उसकी पत्नी का सस्पेंसिव ट्रैक फिल्म की रफतार को दर्शकों के दिमाग में कमजोर बना देता है। दर्शक डॉ ऑलविन की कहानी के रोमांच में भटकते हैं और इस दौरान दर्शकों के दिमाग को गतिमान बना रही समय सूचक घड़ी का चलना भी बंद हो जाता है।

फिल्म की सबसे कमजोर बात ये रही कि एक एक्सीडेंट से राज्य का पूरा प्रशासन हिल जाता है। लेकिन जिस कार ने इतने बड़े हादसे को अंजाम दिया उसे चला कौन रहा था, उसकी चर्चा फिल्म में कहीं नहीं होती है। फिल्म का गीत संगीत औसत है।  बहरहाल फिल्म ट्रैफिक मनोज बाजपेयी के मनोयोगी अभिनय के साथ एक मैसेज देने वाली कहानी के रूप में दर्शकों का थोड़ा बहुत प्यार जरूर पाएगी।



   Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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