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वन नाईट स्टैंड
उम्मीदों पर नहीं करती स्टैंड


जैस्मिन डीसूज़ा
निर्देशक


भवानी अय्यर
कहानीकार


























Movie Review
वन नाईट स्टैंड: नहीं करती स्टैंड


 

निर्देशक: जैस्मिन डीसूज़ा

कहानीकार: भवानी अय्यर

कलाकार: सन्नी लियोन, तनुज विरवानी, नरेन्द्र जेठली

फिल्म वन नाईट स्टैंड में दो बातें अच्छी हैं, जो दर्शकों को आकर्षित करती हैं। एक तो सनी लियोनि और दूसरा फिल्म का नाम। बाज़ार की नब्ज पकड़ते हुए निर्माता ने दोनों ही चीजों का प्रयोग बड़ी चालाकी से किया है। फिल्म का नाम ‘वन नाईट स्टैंड’ ही फिल्म की पूरी कहानी कह देता है और बाकी बातों का अंदाजा दर्शक सनी लियोनि को देख कर लगा लेते हैं। सनी को पर्दे पर उतारने का मतलब क्या है यह फिल्म निर्माताओं के साथ दर्शक भी बहुत अच्छी तरह समझते हैं।  इसीलिए शायद निर्माताओं को लगता है कि दोनों किरदारों को एक साथ समेटे सनी जब पर्दे पर आती हैं तो फिल्म को हिट कराने के लिए किसी और चीज की जरूरत नहीं रह जाती। वन नाईट स्टैंड की भी इस ट्रैक पर दौड़ती फिल्म है।

सेलिना (सनी लियोन) और उर्वील (तनुज वीरवानी) की यह कहानी थाइलैंड से शुरू होती है,  जहां उर्वील एक शो ऑर्गनाइज करवा रहा है। इसी बीच फ्रेम में एक लाल दुपट्टे वाली लड़की उर्फ सेलिना उर्फ सनी लियोनी आती है। इसके बाद कट टू कट कई दृश्य आते हैं, जैसे- हीरो के दोस्त लड़की पटाने की शर्त रखते हैं, लड़की इस बात को समझ जाती है, समझने के बाद भी वह आसानी से पट जाती है और फिर वन नाइट स्टैंड होता है। सुबह लड़की अचानक गायब हो जाती है। कोई पता-ठिकाना कुछ नहीं बताती। इसके बाद कहानी थाईलैंड से पुणे आ जाती है। कहानी आगे बढ़ती है और दिन अचानक उर्वील के सामने सेलिना अंबर के रूप में आ जाती है। पर अब वह किसी की बीवी है। दोनों एक दूसरे को देख सन्न रह जाते हैं। उर्विल अपनी पत्नी और नौकरी को ताक पर रख सेलिना को पाना चाहता है, जबकि सेलिना उसे भूल जाना चाहती है। इसी जद्दोजेहद में उर्विल सारी हदें पार कर जाता है। आखिरकार ट्विस्ट और टर्न्स के बीच फिल्म को अंजाम मिलता है। इस फिल्म में सनी की  पहली फिल्मों के मुकाबले उत्तेजक सीन्स बेहद कम हैं। यह देख कर शायद दर्शक को निराशा होती है।         

   फिल्म की कहानी की सोच तो अच्छी है लेकिन उसे परदे पर पाने में निर्देशक विफल रही हैं। भवानी अय्यर की स्क्रिप्ट और बेहतर हो सकती थी। खास तौर पर सेकंड हाफ का हिस्सा। निरंजन अयंगर ने कुछ जगहों पर अच्छे डायलॉग्स भी लिखे हैं और विजुअल के हिसाब से फिल्म काफी रिच है। इसके अलावा एडल्ट कॉन्टेंट भी दिखाने में निर्देशक ने कोई कमी नहीं छोड़ी है। फिर भी फिल्म दर्शकों को बांधे रख पाने में सक्षम नहीं हो पाती। इसकी सबसे बड़ी वजह है कनेक्टिविटी। फिल्म दर्शकों को कनेक्ट ही नहीं कर पाती। निर्देशक जैस्मीन मोजेज-डिसूजा ने फिल्म को कामुक-थ्रिलर के रूप में पेश किया है। लेकिन फिल्म दोनों मापदंडों पर निराश करती है। दृश्य ऐसे नहीं हैं कि दर्शक सीट से न हिलें और रोमांच पूरी तरह से गायब है।  29 बरस के तनुज और 34 बरस की सनी की उम्र का फर्क परदे पर साफ दिखता है। एक रात के संबंध में युवती के प्यार में दीवाने होने वाले हीरो की कहानी इसलिए नहीं बांधती क्योंकि निर्देशक के पास कहने को कुछ रोचक नहीं था। घूम-फिर कर दृश्य हीरो के घर-दफ्तर में तनाव में रहने, उस रात वाली युवती के बारे में सोचने और शराब पीने का ही रचा गया है। सनी जरूर पत्नी तथा एक बच्चे की मां के रूप में अपनी अन्य फिल्मों अलग दिखी हैं लेकिन इस हिस्से में वह इतनी निष्क्रिय हैं कि उनकी मौजदूगी का पता ही नहीं चलता।   

 महानगरों में वायरस की तरह फैल वन नाइट स्टैंड जैसी समस्या को समझाने के लिए लेखक के पास काफी मौका था। पर वे इसके गहराई में नहीं जा पाये हैं। जिंदगी की भागम-भाग, कमजोर पड़ते रिश्ते और टूटती नैतिकता को आधार बनाकर फिल्म की कहानी और मजबूर और बेहतर हो सकती थी।  लेकिन सिर्फ सनी के सहारे फिल्म को सफल बनाने का यह फार्मूला दर्शकों को कितना पसंद आता है यह आने वाला वक्त ही बताएगा। 



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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