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लाल रंग
में लिपटे प्रेम रंग


सयेद अहमद अफज़ल
निर्देशक-लेखक


पंकज मत्ता
लेखक


























Movie Review
लाल रंग: लाल रंग में लिपटे प्रेमरंग


लाल रंग

किसी फिल्म को देखते समय हमारी धारणा कुछ और हो पर फिल्म का अंत कुछ और हो जाए तो झटका लगता है लेकिन लाल रंग का अंत जोर का झटका धीरे से देता है । जो दर्शक के मन में फिल्म देखने से पहले की सारी धारणाओं और खून खराबे को मिटा प्रेम की इबारत लिखता है। लेखक पंकज मट्टा और निर्देशक सैयद अहमद अफजल ने निंश्चित ही एक अच्छी फिल्म बनाने का पूरा प्रयास किया है।

 फिल्म की कहानी है शंकर नामक एक ऐसे इंसान की जो मस्ती में रहता है और खून के धंधे से पैसे बनाता है। लाल रंग के धंधे में लगा हुआ शंकर अपने साथ में मेडिकल स्टूडेंट राजेश धीमन (अक्षय ओबराय) को जोड़ लेता है। जीवन में खुलेपन के अभाव से ग्रस्त युवा राजेश भी शंकर से मिले प्यार को जीवन की एक बड़ी उपलब्धि मान कब उसके साथ कब उसके गलत कामों में हिस्सेदार हो जाता है, उसे खुद ही पता नहीं चलता।  राजेश अपने साथ में अध्ययनरत एक लड़की पूनम (पिया बाजपेयी) से प्रेम करने लगता है। शंकर उनके प्रेम को और हवा देता है। इधर शंकर भी डाक्टरी की पढाई कर रही राशि (मीनाक्षी दीक्षित) से प्रेम करता है। लेकिन वो शंकर को अपने परिवार वालों के चलते उतना प्यार नहीं करती है। क्योंकि वो शंकर के कारनामों के बारे में जानती है।  इस पीडा के साथ शंकर अपने धंधे में खुद को बेतरतीबी के साथ लिप्त रखता है। लेकिन एक दिन सब कुछ गड़बड़ाने लगता है। उनके खून के धँधे पर पुलिस की नजर पड़ती है। शंकर का एक साथी पकड़ा जाता है लेकिन उस समय शंकर के प्रशासन में रसूख के चलते सभी बच जाते हैं।

  लेकिन कहते हैं ना अधर्म का पैसा लालच पैदा करता है। यही होता भी है। यह लालच गैंग को बहुत बड़ी मुसीबत में डाल देता है और कैसे फिर उससे लड़ने के लिए क्या कुछ संघर्ष और बलिदान करना पड़ता है, यही लाल रंग की कहानी है. दरअसल लाल रंग, कहानी से ज्यादा किरदारों की फिल्म है। किरदारों का चयन लेखक-निर्देशक ने पृष्ठभूमि में गहनता के साथ किया है।

मसलन नायक शंकर जो पूरी फिल्म में खून से पैसे बनाता हुआ निर्मम दिखता है लेकिन अंत में जेलरूपी विष स्वयं पीकर अपने शंकर नाम के मायने को सच साबित कर देता है। वो एच आई वी से पीढित फकीर जो अचानक प्रकट होता है। लेकिन क्लाइमेक्स को प्रभावित करता है। खासकर यामाहा एक्स हंड्रेड को किरदार की भांति पेशकर पीरियड लहजे से निर्देशक ने अलहदा असर छोड़ा है। लेकिन इस किरदारों की कड़ी में शंकर की प्रेमिका रााशि (मीनाक्षी दीक्षित) का किरदार बेजान साबित हुआ।  दो चार सीन में दिखने वाली नायिका या तो फिल्म में होती नहींं और अगर थी तो उसे कहानी के साथ गहराई से जोड़ने की कमी लेखक निर्देशक से रह गई।

इसके साथ ही फिल्म की कहानी क्लाइमेक्स में जाकर ठहर जाती है। शंकर की गैंग के डै्रकुला के पकड़े जाने पर कथा तेज घटनाक्रम की ओर जाने वाली थी पर लेखक निर्देशक ने अपने किरदारों तक ही अपने कथ्य को सीमित कर दिया हैं। हालांकि निर्देशक सैयद अहमद अफजल की किरदारों पर पकड़ होने के कारण वो दृष्य ऊब तो पैदा नहंीं करते पर फिल्म के समेकित प्रभाव को कमजोर बना देते हैं। फिल्म के कुछ दृष्यों को संपादन की जरूरत थी। 

फिल्म लाल रंग के गीत संगीत की बात करें तो कौशर मुनीर द्वारा रचित सूफियाना ‘अलख जगाता खुदा खुद को तुझसे मिलाने चला मैं प्रभावित करता है’, वहीं दुष्यंत रचित गीत ‘बावड़ी बूच’ भी फिल्म देखते समय हरियाणा की भाषायी संस्कृति के साथ वैचारिक प्रेम से जोड़ देता है। 

 खून के काले धंधे पर प्रस्तुत किसी विशेष कथा को ध्यान में रखकर गए दर्शकों को ये फिल्म निराश कर सकती है लेकिन जो दर्शक हिंदी सिनेमा की असली ताकत, इमोशन से परिचित हैं वो इस फिल्म को देखकर खुद को ठगा हुआ महसूस नहीं करेंगे।

                         धर्मेंद्र उपाध्याय     



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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