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निल बटे सन्नाटा
कहानी सपनों की


अश्विनी अय्यर
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
निल बटे सन्नाटा:कहानी सपनों की


लेखक : अश्विनी अय्यर तिवारी, नितेश तिवारी, नीरज सिंह, प्रांजल चौधरी

कलाकार : स्वरा भास्कर, पंकज त्रिपाठी, रत्ना पाठक शाह, रिया शुक्ला

पाश की एक मशहूर कविता है “सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना”। क्या इंसान बिना सपनों के जिंदा रह सकता है? मेरे ख़याल से बिलकुल भी नहीं। क्योंकि कई सपने भले ही पूरे नहीं होते पर वे हमेशा आगे बढ़ने और कुछ करने की उम्मीद तो देते ही हैं। शायद इसीलिए पाश सपनों के मर जाने को सबसे खतरनाक मानते हैं और इसकी तुलना पुलिस की मार, गद्दारी और लोभ जैसी चीजों से करते हैं। निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी की फिल्म ‘निल बटे सन्नाटा’ भी ऐसे ही एक सपने की कहानी है, जिसे एक माँ मरने नहीं देती। किस्मत और मेहनत के संघर्ष के बीच भी वह एक सपने के लिए जीती है। फिल्म के एक दृश्य में चंदा (स्वरा भास्कर) से दीदी (रत्ना शाह पाठक) कहती है, इस दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं...एक किस्मत वाले और दूसरे मेहनत करने वाले। फिर चंदा कहती है, किस्मत तो गरीब के पास होती नहीं...अब बची मेहनत...। एक दूसरे दृश्य में चंदा अपनी बेटी लाली (रिया शुक्ला) से पुछती है ‘बड़ी होकर तू क्या बनाना चाहती है?’ लीला कहती है ‘जब एक इंजीनियर का बेटा इंजीनियर बनाता और डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, तो बाई की बेटी क्या बनेगी?’ यानि फिल्म में एक तरफ किस्मत-संयोग है तो दूसरी मेहनत, उम्मीद और सपना है। 100 मिनट में यह फिल्म एक मां-बेटी, मालिकन-नौकरानी और एक स्कूल के प्रिंसिपल के बहाने हिन्दी समाज के यथार्थ की बात करती है।    

   आगरा में रह रहीं एक मां-बेटी की इस कहानी में गरीबी और गंदी गलियां तो हैं पर उम्मीद और मेहनत के रंग में वो कहीं नजर नहीं आते। चंदा की बेटी लाली  (रिया शुक्ला) पढ़ाई में बेहद कमजोर है और गणित में तो उसका डब्बा पूरी तरह से गोल है। उसका मन भी पढ़ाई में बिलकुल भी नहीं लगता। बेटी मदद करने के लिए चंदा दीदी की सलाह पर लाली के ही स्कूल में दसवीं कक्षा में दाखिला ले लेती है। स्कूल में लाली का सामना होता है गणित के अध्यापक एवं स्कूल प्रिंसिपल (पंकज त्रिपाठी) से। अपनी मां का स्कूल में दाखिला लेना लाली को जरा भी पसंद नहीं आता और मां की यही कोशिश दोनों के बीच तनाव का कारण बन जाती है। कहानी आगे बढ़ती है और देखते ही देखते यह कोशिश एक चुनौती में तब्दील हो जाती है। लाली, चंदा को चुनौती देती है कि वो गणित में उससे ज्यादा नंबर लाकर दिखाएगी तो चंदा स्कूल जाना छोड़ देगी। होता भी कुछ ऐसा ही है, लेकिन चुनौती जीतने के बाद लाली पढ़ाई फिर से छोड़ देती है और विद्रोही हो जाती है।

फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि निर्देशक ने कई मुश्किल बातों को बड़ी आसानी दिखा दिया है। बेटी को प्रेरित करने के लिए खुद मां का विद्यार्थी बनना... और फिर अपनी ही बेटी से चुनौती लेना... इन दृश्यों को फिल्म जिस सहजता और सच्चे अंदाज में फिल्माती है वह काबिल-ए-तारीफ है। मां-बेटी दोनों का गणित से डरना और फिर लाली के एक दोस्त का उन्हें गणित से दोस्ती करने की सलाह देना...दर्शकों को अनायास ही उनके बचपन की याद दिलाने लगता है। गणित समझने, रटने की आदत को बदलने और आम जीवन के नुस्खों का गणित के फॉर्मूले के रूप में उपयोग करने के बहाने फिल्म शिक्षा जगत की जटिलताओं की बात तो करती ही है, पर गणित जैसे नीरस विषय को केंद्र में रखने के बावजूद फिल्म की रोचकता कहीं से कम नहीं होती। कई मौकों पर शांत रहते हुए भी फिल्म के कुछ दृश्य आँखों में आंसू दे जाते हैं।  बात चाहें भाषा की हो या फिर आर्ट की, फिल्म की डीटेलिंग हर जगह अपील करती है। कठिन और गंभीर बातों को परी-कथा के अंदाज इतनी सहजता से कहना स्क्रिप्ट की खूबसूरती को दर्शाता है। हां कई जगह पर एक ही बात को बार-बार दोहराया गया है और इससे थोड़ी-सी उबन भी पैदा होती है पर इतनी नहीं कि इसका असर दर्शक की उत्सुकता पर पड़े। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है तो कई बार मन यह सोंच आशंकित हो जाता है कि कहीं इतनी खूबसूरत कहानी का अंत जादुई तो नहीं हो जाएगा? पर लेखक और निर्देशक इसलिए भी बधाई के पात्र हैं कि सिनेमेटिक फील देने के चक्कर में उन्होंने न तो कहीं कोई अनावश्यक जादुई किरदार गढ़े हैं न ही दृश्यों के साथ कोई समझौता किया है। 

 फिल्म बदलते समाज के इस ट्रेंड को भी बखूबी साधती है जिसमें घर का काम करने वाली बाइयां आजकल अपनी बच्चियों को अपने काम से हरसंभव दूर रखने की कोशिश करती हैं, और इसके लिए खुद को बुढ़ापे तक काम में झोंके रखती हैं। फिल्म यह भी खूब समझती है कि बावजूद इन कोशिशों के उनकी लड़कियां ब्यूटी पार्लरों में नौकरी पाने तक ही सीमित रह जाती हैं इसलिए ‘निल बटे सन्नाटा’ यथार्थवादी रहते हुए उन्हें शिक्षा का हाथ कसकर पकड़ने की सलाह देती है। 

बावजूद इसके कई बातें खटकती भी हैं, जो फिल्म के शिल्प से जुड़ी हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि एक फिकरमंद और जुझारू मां के इस किरदार को स्वरा ने बड़ी मेहनत से अदा किया है। फीके-से कपड़े, बिखरे बाल और बेढंगी चाल से उन्होंने कामवाली बाई के चरित्र को भी खूब जीया है। पर कहीं कहीं उनकी बोली उनका साथ नहीं दे पाती। खासतौर से झल्लाने वाले दृश्यों में। लेकिन दूसरी तरफ यही बात लाली के किरदार में एक साकारात्मक पहलू बनकर उभरती है। लाली जरूरत से ज्यादा मुंहफट और हठी है। यह अजीब लगता है कि वह अपनी मां को बेहद कम समय के लिए मां समझती है। उसे खुद को लगता है कि उसकी मां एक कामवाली बाई ही है। अपनी मां के लिए उसकी आंखों में प्यार कम झल्लाहट ज्यादा झलकती है। आदर का अभाव भी दिखता है। ये कुछ बातें इस फिल्म के संदेश को थोड़ा कमजोर तो बनाती ही हैं। बावजूद इसके अश्विनी अय्यर तिवारी की यह फिल्म ‘फील गुड’ अहसास कराती है। क्योंकि इसमें न केवल शिक्षा, बल्कि समाज के बीच पनपने वाली कुछ अच्छाईयों की तरफ भी इशारा किया है।

   फिल्म में स्वरा भास्कर का अभिनय प्रभावित करता हैं। पर वे लाली की मां कम बड़ी बहन ज्यादा नजर आती हैं। स्वरा ने अपने अभिनय से इस गैप को भरने की पूरी कोशिश की है और काफी हद तक वह कामयाब भी हुई हैं। यही वजह है कि दोनों की उम्र में कम फर्क होने के बावजूद यह बात दर्शकों को नहीं खटकती। स्वरा पूरी फिल्म में समर्पित अभिनय करती हैं और जबरदस्त तरीके से देसी बोली पकड़ती हैं। उत्तर प्रदेश की बोली पर उनकी पकड़ उनकी मेहनत को बयां करती है। लाली के रोल में बेहद नेचुरल रिया शुक्ला अपने अभिनय में एक भी गलती नहीं करतीं। उनके और स्वरा के बीच के कुछ दृश्य बेहद प्यारे लगते हैं और उनके हिस्से में फिल्म के ज्यादातर मजेदार संवाद भी आते हैं। लाली के सहपाठी बने बच्चे भी केवल रिक्त स्थान नहीं भरते बल्कि महीन लिखे किरदारों को सलीके से निभाते हैं। दूसरे ओर पंकज त्रिपाठी और रत्ना शाह पाठक के किरदार भी बेहद मजेदार और दिलचस्प हैं। पंकज की सहजता देखकर फिर से गांव वाले गुरु जी की याद आ जाती है।



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं.

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