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लव गेम्स
लव नेम्स सेक्स गेम्स


विक्रम भट्ट
निर्देशक-लेखक


























Movie Review
लव गेम्स :लव नेम्स सेक्स गेम्स


 सिनेमाई दुनिया में महिलाओं और सेक्स पर दाव लगाने में भट्ट कैंप हमेशा से अव्वल रहा है। इस कैंप के हर सिनेमा पर महेश भट्ट की छाप और तर्क देखने को मिलती है। मसलन महिलाओं के पक्ष में आवाज बुलंद करना और उन्हें और ज्यादा से ज्यादा आधुनिक तथा आत्मनिर्भर बना के पेश करना। लेकिन इ अत्याधुनिकता की अनिवार्य शर्त होती है सेक्स। यही वजह है कि भट्ट कैंप महिला और सेक्स से जुड़े किसी भी विषय पर फिल्म बनाने से नहीं चुकता है। महेश भट्ट भी अक्सर अपने साक्षात्कार में कहते रहते हैं कि मेरी फिल्में समाज के दोहरे मापदण्डों को उजागर करती हैं। हम दुनिया को दिखाते हैं कि है पेज थ्री पार्टियों में मशगूल रहने वाली हाई सोसाइटी के दोनों चेहरे कितने अलग-अलग और कुरूप होते हैं।  

इस बार भट्ट कैंप के फोकस में है वाइफ स्वैपिंग यानी बीवीयों (या भट्ट साहब की भाषा में कहिये तो पतियों) की अदला-बदली। वैसे तो दशकों से मेट्रो सिटीज में फ़ैली इस बीमारी का ज़िक्र होता आ रहा है लेकिन यह  चलन कितना वास्तविक और कितना काल्पनिक है ये कहना कठिन हैलेकिन धुँआ उठ रहा है तो..

वाइस स्वैपिंग
पर आधारित फिल्म 'लव गेम्स' में वो सब कुछ है जिसकी तलाश भट्ट कैंप को रहती है... यानि औरत, अवैध संबंध, हाई सोसाइटी और भरपूर ड्रामा। फिल्म रिलीज होने से पहले कैंप की तरफ से बहुत सारे दावे और वादे किए गए थे। कैंप का दावा है कि यह अब तक की सबसे बोल्ड, उत्तेजक और हॉट प्रेम कहानी है, जो लोगों के होश उड़ा देगी। फिल्म सभ्य समाज की परतें उधेड़ देगी, जिसे देख कर लोग स्तब्ध रह जाएंगे। लेकिन क्या किसी फिल्म में दर्जभर किसिंग सीन डाल देने भर से यह सब साबित हो जाता है? क्या किसी फिल्म को बोल्ड बनाने के नाम पर केवल फूहड़ अंग प्रदर्शन दिखा देने से सोसाइटी की धज्जियां उड़ाई जा सकती हैं?  

सच्चाई यह है कि समाज के बदलते चेहरे को दिखाने का दावा करने वाले भट्ट कैंप की यह एक और कमजोर, कच्ची और कई मायनों में कमतर फिल्म है। फिल्म एक ऐसी सोसाइटी की कहानी कहती है, जहां के लोग गरीबी, रोजगार और रोज की मुश्किलों से बहुत ऊपर उठ चुके हैं। जिन्हें न तो भविष्य की फिकर हैं न समाज की। ये बहुत सक्षम लोग हैं और कुछ भी कर सकते हैं। रमोना रायचंद (पत्रलेखा) भी ऐसी महिला है। हाल में उसके पति का निधन हुआ है। पति की मौत का शक भी रमोना पर ही है, लेकिन कुछ साबित नहीं होता। रोमाना खुल के जीना चाहती है... बिलकुल आजाद...उन्मुक्त। पति की मौत के बाद रमोना सभी बंधनों से मुक्त हो जाती है। ऐसे में उसकी मुलाक़ात होती है सैम (गौरव अरोड़ा) से... एक अमीर बाप का एकलौता बेटा। सैम अदंर से मनोवैज्ञानिक रूप से बड़ा परेशान रहता है। रमोना और सैम का एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं। रोमाना सैम की मानसिक परेशानी को दूर करने के लिए एक खेल का आइडिया देती है। ये खेल है लव गेम्स का। दोनों मिल कर पेज 3 पार्टीज में जाने लगते हैं और वहां आये शादी-शुदा जोड़ों को अपने प्यार के जाल में फंसाते हैं। दरअसल, ये प्यार नहीं बल्कि सेक्स का जाल है, जिसके जरिये ये दोनों अपने तन की प्यास बुझाते हैं और हार-जीत की बाजी भी लगाते हैं।

सैम किसी ग्लैमरस-सी महिली को पटाता है और रमोना उस महिला के पति को। फिर दोनों इन कपल्स के साथ हम बिस्तर होते हैं...दोनों को इस काम में मजा आने लगता है, लेकिन जब एक दिन ऐसे ही लव गेम्स के जरिये सैम की मुलाकात अलीशा अस्थाना (तारा अलीशा बेरी) से होती है तो उसकी जिंदगी बदल जाती है। अलीशा पेशे से एक डॉक्टर है और उसका पति गौरव अस्थाना (हुसैन क्वाजरवाला) एक नामी क्रिमिनल लॉयर। गौरव, अलीशा संग आये दिन मार पीट करता है। उसे परेशान करता है, सबके सामने उसकी बेइज्जती करता है। सैम की अलीशा के प्रति हमदर्दी उसे उसके और करीब लाती, जो रमोना को बर्दाश्त नहीं होती। सैम, रमोना को छोड़ना चाहता है, लेकिन रमोना उसे उसके अतीत को लेकर ब्लैकमैल करने लगती है। आगे की कहानी इसी और ऐसेही उधेड़ बुन गुत्थियों की तर्ज़ पर बढ़ती है.. जिसे लिखा है विक्रम भट्ट ने..

सेक्स और अवैध सम्बन्धों को आधार बनाकर विक्रम ने पूरी कोशिश की है कि फ़िल्म को आकर्षक और दिलचस्प बनाया जा सके पर किसी मोड पर कहानी प्रभावित नहीं कर पाती है। इंटरवल से पहले तक की कहानी पर ज्यादा जोर देने की जरूरत नहीं पड़ती। दर्शक बड़ी आसानी से अंदाजा लगा लेते हैं कि आगे क्या होने वाला है। रमोना जैसी लड़की से अगर कोई दूर जाने लगेगा तो वह क्या करेगी, इसका अंदाजा लगाना आसान है। ढेरों फिल्मों में इससे पहले ऐसे किरदार देखे जा चुके हैं। सस्पेंश और थ्रिलर बनाने के नाम पर केवल twist के लिए ठूंसे हुए shockers अटपटा से लगते है। कभी convenient और बहुतर predictable । 

निर्देशक ने अपना पूरा ध्यान पत्रलेखा को एक्सपोज करने में ही लगाया है ऐसा लगता है। रोमाना का एक्सपोजर दिखाने के चक्कर में विक्रम यह भूल गए हैं कि कानून और पुलिस नाम की चीज भी इस देश में मौजूद है। खून करना और उससे बच निकलना विक्रम के किरदारों के लिए बच्चों का खेल है। कुल मिलकर यही कह सकते हैं कि दिमाग केवल सैम और रमोना के पास है, बाकी तो सब बेवकूफ हैं। पूरी फिल्म में स्टाइलिश अंग्रेजी गालियों की भरमार है, जो दर्शकों को आकर्षित करने में नाकाम रही हैं।   

रमोना वही पत्रलेखा हैं जो दो साल पहले भट्ट कैंप की ही फिल्म 'सिटिलाईट्स' में एक नॉन ग्लैमरस रोल में नजर आयी थीं। उस समय पत्रलेखा के किरदार की और अभिनय दोनों की जमकर तारीफ हुई थी। पर यहां पूरी फिल्म में रमोना का बस एक ही काम है, सैम पर लदे रहना। इस फिल्म में उसका ये ग्लैमर चौंकाता है अपील नहीं करता। ठीक इसी तरह से सैम का किरदार भी है, जिसे गौरव अरोडम ने बस निभाने भर की कोशिश-सी ही की है, कोई खास प्रयास नहीं किया है। हां, इस बीच अलीशा के किरदार में तारा अलिशा बेरी ने जरूर कुछ अच्छे दृश्य दिये हैं। उनका अभिनय बीच-बीच में जरूर बांधता है। अभिनय के लिहाज से फिल्म बेहद कमजोर लगती है।   



   Rudra Bhanu

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं।.

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