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कपूर and संस
थोड़ी ख़ुशी थोडा ग़म


शकुन बत्रा
पटकथा एवं निर्देशन


आयेशा देवित्रे
पटकथा


























Movie Review
Kapoor and Sons:थोड़ी ख़ुशी थोडा ग़म


कपूर एंड संस
पारिवारिक रिश्तों में द्वंद की दास्तान

इंसान परिवार के बिना अधूरा है, लेकिन पारिवारिक सदस्यों में एक दूसरे के प्रति मानसिक द्वंद होने लगे तो परिवार को बिखरते देर नहीं लगती है। हमें अपने परिवार को सहेज के रखना है तो परिवार के हर सदस्य को एक दूसरे की कमतरी के साथ एक दूसरे का साथ निभाना पड़ेगा। इस शुक्रवार को रिलीज हुई धर्मा प्रोडक्शन की शकुन बत्रा निर्देशित और आयेशा देवतारे ढिल्लन लिखित फिल्म कपूर एंड संस में शायद लेखक- निर्देशक अपने दर्शकों को यही कहना चाहते हैं।

अपनी पारिवारिक फिल्मों के लिए मशहूर धर्मा प्रोडक्शन ने इस बार विदेश में बसे कपूर परिवार के सदस्यों के जरिए दर्शकों के समक्ष कुछ एसे किरदारों को रखा है जो साधारण सिथितियों में प्रेम भाव खिलंदड़पन के साथ प्रकट होते हैं लेकिन वैचारिक मंथन होते ही एक दूसरे के खिलाफ विष वमन करने से नहीं चूकते हैं।

कहानी हर्षवर्धन कपूर (रजत कपूर) के परिवार की है। इस परिवार में हर्ष के बूढे पिता अमरजीत कपूर (ऋषि कपूर) पत्नी सुनीता (रत्ना पाठक शाह) के अलावा उनके दो जवान बेटे राहुल (फवाद खान) और अर्जुन (सिद्धार्थ मल्होत्रा) हैं। दोनों जवान बेटे सालों से घर से बाहर हैं पर दादा की बीमारी का हाल जानने के लिए दौनों की घर वापसी होती हैं। जहां हर्ष और पत्नी सुनीता के बीच अधेड़ हर्ष के एक महिला से संबधों को लेकर तनाव है, वहीं दौनों भाइयों के बीच भी एक मानसिक टकराव है ।

वजह ये है कि कुछ साल पहले बड़े भाई राहुल का एक उपन्यास प्रकाशित हुआ था। जिसने उसे नाम और दाम दिलवाया लेकिन छोटे भाई अर्जुन को पक्का यकीन है कि राहुल ने उसके अप्रकाशित उपन्यास की पांडुलिपि से सारा मसाला चुरा लिया था। तभी से हर्ष खुद को पेशेवर रूप से स्थापित करने की जद्दोजहद में लगा है। दोनों भाइयों की घर वापसी के साथ हर्ष और सुनीता अपने परिवार को संभालने काप्रयास कर रहे हैं। इधर दादा अमरजीत कपूर अपने पोतों को एक साथ घर में देखकर खुश है । लेकिन नियति और अतीत की कड़वाहट में बंधे इन किरदारों का गुस्सा गाहे बगाहे छलकता रहता है।

इन्ही परिस्थितियों में इन दो भाइयों के बीच आती हैं एक लड़की टिया (आलिया भट्ट) जो दोनों भाइयों से दोस्ताना व्यवहार रखती है लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में भावावेश में आकर वो राहुल को चूम लेती हैं। बाद में वो छोटे भाई अर्जुन से प्यार करने लगती है। इधर पोते अपने दादा के जन्मदिन पर एक पार्टी प्लान करते हैं। लेकिन इस पार्टी में सारा गुड़ गोबर होना शुरू हो जाता है। और कपूर परिवार फिर बिखराब के कगार पर आ जाता है। लेकिन जैसे अक्सर होता है इस फ़िल्म में भी कहानी सुख-दुःख से परिवार के फिर से जुड़ने के साथ ख़त्म होती है ।      

कहना गलत नहीं होगा कि शकुन बत्रा और आयेशा ने दिल से कहानी कहने की कोशिश की है। किरदारों का चयन भी अच्छा है लेकिन किरदारों में भावनाओं का अतिरेक उन्हें कमजोर भी करता है। जैसे दादा अमरजीत कपूर का अपने पोतों के साथ दोस्ताना व्यवहार कई दृष्यों में अतिरेक का शिकार होता है। ये बात सही है कि खिलंदड़ युवा पीढी इस तरह के जिक्र को पसंद करती है लेकिन इन बातों को कहने के लिए माध्यम युवा पीढ़ी को ही बनाया जाए तो सटीक लगता है। मसलन नायिका नायिका के बीच बंकू के साइज को लेकर चर्चा या युवा बॉडी बिल्डर बूबली का अपनी चेस्ट को हल्की सी जुंबिश देना इत्यादि, दर्शकों को गुदगुदाता है।   

 निर्देशक शकुन बत्रा कहानी के लिहाज से कहे जाने वाले कई दृष्यों को पटकथा से गायब कर देते हैं। फिल्म की कहानी की मांग थी बीच में एक छोटे से फलैशबैक की जिसमें दौनों भाइयों के मानसिक द्वंद की वजह को दृष्यावली के जरिए दिखाया जाना जरूरी था।  फिल्म इंटरवल के बाद बोझिल होने लगती है क्योंकि शकुन बत्रा बिना किसी बैंकग्राउंड स्कोर के, दृष्यों को दर्शकों के सामने रखते हैं। जबकि भावनात्मक फिल्मों में पाशर्व संगीत की महत्ता ज्यादा है क्योंकि पाशर्व संगीत ही दृष्यावली का सरलीकरण करता है। हालांकि हर्षवर्धन के एक्सीडेंट के बाद लेखक-निर्देशक फिर से दर्शकों को अपने काबू में कर लेते हैं। फिल्म में शिवकुमार पाणिकर ने अपने संपादन से बर्थडे पार्टी के दृष्य और घर में प्लंबर के आने पर सुनीता और हर्ष का तनाव दिखाने में दृष्यों को असरदार बना दिया है।  

फिल्म के गीत संगीत की चर्चा करें तो एक गीत लड़की ब्यूटीफुल कर गई चुल युवा पीढ़ी के प्रेमोंमाद को दर्शाता हुआ लोकप्रिय हो चुका है। लेकिन फिल्म के अन्य गीतों को निर्देशक शकुन बत्रा सही स्थान नहीं दे पाए हैं। फिल्म देखते समय गाने कब आए, कब गए कुछ पता ही नहीं चलता है। दादा अमरजीत का मंदाकिनी प्रेम फिल्म के हास्य को अलहदा रंग देता है।  कुल मिलाके फिल्म की कहानी और किरदार दर्शकों को अवश्य छूते हैं।  दरअसल ऐसी कहानियों में भारतीय दर्शक खुद को देख पाते हैं शायद इसीलिए इमोशन भारतीय सिनेमा की पहचान बन चुका है। इस लिहाज से फिल्म दर्शनीय है।

 धर्मेंद्र उपाध्याय

 



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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