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तेरा सुरुर
हिमेशमिया फ़िल्म


शॉन अराना
निर्देशक


नम्रता रामसे
लेखक


























Movie Review
तेरा सुरुर:Music to Ears not to Eyes


तेरा सुरुर

ओ हुजूर, कब उतरेगा, अभिनय का सुरूर 

अपने संगीत के दम पर नायक बनने की चाह में हिमेश रेशमिया निरंतर फिल्में बना रहे हैं। उनके फैंस उनकी फिल्में देखने भी पहुंचते हैं शायद इसलिए ये सिलसिला चल रहा है। संगीत के मामले में उनके आधे अधूरे जानकार फैंस उनकी हौसलाफजाई भी कर देते हैं लेकिन हिमेश को ये नहीं भूलना चाहिए कि वे सिनेमा के सुधि दर्शकों पर खुद को लगातार थोप रहे हैं।

इस शुक्रवार को रिलीज हुई उनकी फिल्म तेरा सुरूर भी उनकी एक ऐसी ही कोशिश का नतीजा है। नम्रता रामसे लिखित और शॉन अराना निर्देशित फिल्म तेरा सुरूर का ट्रेलर यूं तो फिल्म को सटीक सस्पेंसिव फिल्म की तरह पेश कर रहा था लेकिन सस्पेंस की वजह बचकानी हो तो बोरियत होने लगती है।

फिल्म के कथानक के अनुसार राघवेंद्र शर्मा उर्फ रघु (हिमेश रेशमिया) एक गैंगस्टर है जो तारा वाडिया (फरहा करीमी) से बेहद प्रेम करता है। दौनों शादी करने वाले हैं लेकिन एक रात अचानक रघु फरहा को बताता है कि कल रात उसने अपने प्रेम को धोखा दे दिया है और वह किसी और लड़की के आगोश में चला गया । बस इसे सुनकर तारा विदेश चली जाती है, लेकिन यहां पर वह ड्रग के साथ पकड़ी जाती है । इस पर नायक रघु अपनी प्रेमिका को लेने डबलिन शहर जा पहुंचता हैं। यहां पर शेखर कपूर की इंट्री होती है जो एक किरदार के रूप में नजर आते हैं। लेकिन तुरंत कैमरा फिर से हिमेश पर ही जा चिपकता है। 

रघु अपनी प्रेयसी को सीधे तौर पर रिहा होते ना देख जेल से उसे भगाने का प्लान रचता है और इस प्लान को बनाने के लिए वह सहारा लेता है एक बड़े अपराधी सैंटीनो (नसीरुद्दीन शाह) का। फिल्म में सैंटीनो के शुरूआती प्रस्तुतिकरण से दर्शकों को लगता है कि अब फिल्म में कुछ जान आ सकती है। लेकिन यहां भी नसीर का होना सिर्फ एक फारमैलिटी सी है।  अंत: में प्लानिंग  के अनुसार जेल से अस्पताल पहुंची तारा वाडिया को रघु अस्पताल से लेकर फरार हो जाता हैं। फिल्म का सस्पेंस अंत में खुलता हैं।  जो निहायत ही घटिया है। सौ करोड़ के क्लब में फिल्मों को पहुंचाने वाली युवा पीढी जो हॉलीवुड की फिल्में देखती हैं वह सत्तर के दशक की फिल्मों का सस्पेंस पचा पाएगी मुझे तो नहीं लगता। 

 अपूर्व लाखिया के सहायक रह चुके शॉन अराना इससे पहले एक सस्पेंस फिल्म हाइड एंड सीक बना चुके हैं। फिल्म के ट्रेलर को देखते समय उनसे कुछ आशा तो जगी थी पर फिल्म पूरी तरह से हिमेशमिय होकर रह गई है।  लेखिका नम्रता रामसे अपनी पटकथा को धारदार बताने का प्रयास करती है। लेकिन घटनाक्रमों और किरदारों के साथ पैदा की गई परिस्थितियों में लेखिका की समझदारी उन छुटभैये अपरधियों जैसी लगती है जो घटना के कुछ घंटे बाद सी सी टी वी फुटेज से पुलिस के हत्थे चढ जाते हैं। मसलन नायिका तारा का नायक की छोटी सी गलती पर बिना उसके प्रेम को महसूस किए सीधा अपना फैसला सुना देना फिल्म के कथ्य को कमजोर बनाता है। अनिरुद्ध ब्राहमण नामक किरदार का खुलासा, नायक के अतीत से जोड़ा है। जो मामूली असरदार तो लगता है लेकिन अंत तक आते आते दर्शक हिमेश रेशमियां के सॉग विडियो और लोकशंस देख देख के उकता चुके होते हैं। नायक रघु ने जो सस्पेंस नायिका के सामने अंत में खोला क्या वह अपनी प्रेयसी को इसके बारे में पहले नहीं बता सकता था?    

 फिल्म का गीत-संगीत और मनोहारी लोकशन आंखों को छूते हैं। पर सिनेमा को अच्छी फिल्म के लिए सबसे पहले एक कहानी की जरूरत होती है। फिल्म के गीत संगीत की बात करें तो दो गाने मैं वो चांद, और बेखुदी ठीकठाक हैं। जो पहले ही एफ एम चैनलों पर बार बार कानों में घुसते हुए कथित लोकप्रियता पा चुके हैं।

 फिल्म में नायिका फराह करीमी अपने सौंदर्य से ध्यानाकर्षण कराती हैं लेकिन संवाद अदायगी में चारो खाने चित्त हो जाती है। खैर हिमेश रेशमिया से तो अभिनय की आस नहीं की जा सकती है। पर वे खामोश रहकर अभिनय दिखाने की बेवजह कोशिश करते रहते हैं।  फिल्म में कबीर बेदी, शेखर कपूर के किरदार एडिटिंग टेबिल पर खत्म कर दिए लगते हैं। अगर आप हिमेश रेशमियां के प्रशंसक हैं और उन्हें दो घंटे कर्णो के साथ साथ लोचनों पर भी झेल सकते हैं तो आप फिल्म देखने जा सकते हैं वरना हिमेशजी के कर्णप्रिय गाने तो है ही।

                     धर्मेंद्र उपाध्याय



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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