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ग्लोबल बाबा
बाबागिरी की कहानी


मनोज तिवारी
निर्देशक


सूर्य कुमार
कहानीकार


























Movie Review
ग्लोबल बाबा:शानदार कहानी का कमजोर अंत


सितारे : अभिमन्यु सिंह, संदीपा धर, पंकज त्रिपाठी, रवि किशन, संजय मिश्रा,  

निर्देशक : मनोज तिवारी

कहानी : सूर्य कुमार उपाध्याय

 हिन्दी के मशहूर कवि अंशु मालवीय ने अपनी एक कविता में लिखा है  “आदमी के डर ने बनाया है ईश्वर और उसके साहस ने बनाई है दोस्ती।” दरअसल यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है। जिसे समय-समय पर विभिन्न माध्यमों से समाज के सामने लाया जाता रहा है। धार्मिक आडंबर और डर को लेकर बॉलीवुड में भी काफी प्रयास हुए हैं। ओएमजी, पीके और धर्म संकट में जैसी फिल्में को हम इसी कोशिश के रूप में देख सकते हैं। फिल्म ग्लोबल बाबा भी इस इसी लीक पर बनी है। पर कुछ बातें ऐसी हैं जो इस फिल्म को बाकी फिल्मों में अलग करती हैं। फिल्म की कहानी पेशे से पत्रकार रहे सूर्य कुमार उपाध्याय ने लिखी है। फिल्म पर भी एक पत्रकार के अनुभवों का पूरा असर दिखता है। एक पत्रकार की रिपोर्ट में हमेशा समाज और राजनीति के अंतरसंबंधों का विश्लेषण देखने को मिलता है। यह फिल्म भी धर्म, राजनीति, मीडिया और समाज के कई पहलुओं का फिल्मांकन करती है। नए निर्देशक मनोज तिवारी ने बाबाओं और उनके गोरखधंधे पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। ग्लोबल बाबा की पूरी पृष्ठभूमि उत्तर प्रदेश की है। फिल्म की कहानी चिलम पहलवान (अभिमन्यु सिंह) नामक एक बदमाश और एक इंस्पेक्टर पीसी जैकब (रवि किशन) के बीच वार्तालाप से शुरू होती है। जैकब ने पहलवान का एंकाउंटर करने की तैयारी कर रखी है। उसे प्रदेश की एक नेता भानुमति से हुक्म प्राप्त हुआ कि वह पहलवान को ठिकाने लगा दे। जैकब की गोलियां खा कर पहलवान दरिया में कूद जाता है और बचते-बचाते कुछ साधुओं के हाथ लग जाता है। साधु उसकी जान बचा लेते हैं। बस यही से पहलवान के जीवन की एक नई गाथा शुरू होती है। संगम के तट पर उसकी मुलाकात एक मौनी बाबा उर्फ डमरू (पंकज त्रिपाठी) से होती है। डमरू, उसे बाबागिरी के धंधे के बारे में बताता है और सलाह देता है कि वह भी गुंडागर्दी छोड़कर यह धंधा अपना ले। एक अंजान कस्बे में दोनों यह धंधा शुरू कर देते हैं और देखते ही देखते पहलवान, ग्लोबल बाबा के नाम से मशहूर होने लगता है। डमरू भी अब मौनी बाबा से डमरू बाबा बन जाता है और ग्लोबल बाबा का सारा कामकाज देखते लगता है।

         अपने आश्रम के लिए ग्लोबल बाबा आदिवासियों के लिए आबंटित एक जमीन हथिया लेता है, जिसके खिलाफ इलाके के एक समाजसेवी भोला पंडित (संजय मिश्रा) संघर्ष करते हैं। कहानी आगे बढ़ती है और देखते ही देखते जिले में ग्लोबल बाबा का वर्चस्व बढ़ने लगता है और वह स्थानीय नेता दल्लू यादव (अखिलेन्द्र मिश्रा) के लिए खतरा बन जाता है। आने वाले खतरे को भांप दल्लू यादव अपने चैनल की एक रिपोर्टर भावना शर्मा (संदीपा धर) को ग्लोबल बाबा के आश्रम की पोल-पट्टी खोलने के लिए भेजता है और फिर शुरू होता है धर्म, राजनीति, मीडिया और सत्ता का खेल। फिल्म में मनोज तिवारी की ईमानदार कोशिश से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने बाबाओं के ट्रेंड को समझा है और बारीकी से पर्दे पर उतारने की कोशिश की है। फिल्म में घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदलते हैं। एक हिस्ट्रीशीटर बदमाश के प्रसिद्ध बाबा बनने की कहानी कई जगहों पर अपील भी करती है और पल-पल रोमांच पैदा करती है। लेकिन इन तमाम बातों के बावजूद ये कहानी कोई बहुत चौंकाने वाला काम नहीं करती। कुछेक बाबाओं के आश्रम में क्या काला सफेद होता होगा, इससे आज आम जनता अच्छी तरह नहीं तो थोड़ी बहुत तो वाकिफ है ही। आश्रम के लिए जमीन हथिया लेना, फिर नेताओं के दबाव से अनाधिकृत से अधिकृत बनाना, चंदे में आने वाले लाखों-करोड़ों रु. नेताओं से मिलीभगत और रासलीलाएं तथा आबंडर आदि के बारे में अब तक बहुत कुछ लिखा और देखा जा चुका है पर सूर्य कुमार उपाध्याय की ये कहानी कुछ है जो बांधे रखती है। कोई बहुत नई बात न होने के बावजूद कहानी की रफ्तार इसकी रोचकता को बरकरार रखती है। ग्लोबल बाबा छोटे बजट और सीमित संसाधनों से बनी फिल्म है। इसका असर फिल्म पर पूरी तरह दिखाई पड़ता है। कई जगह दृश्य उभर कर नहीं आ पाते।

निर्देशक ने पूरी कोशिश की है कि इस फिल्म को देशी कलेवर दिया जाय। कई जगह वे सफल भी हुए हैं पर अपनी कल्पना और फिल्मांकन के बीच तालमेल नहीं बैठा पाए हैं शायद इसी वजह से कस्बों को न समझने वाले लोगों को इसमें कुछ अटपटा लग सकता है। इसके पीछे वजह भी है।  समान्यतः फिल्मों में गांवों और छोटे कस्बों की जो तस्वीर पेश की जाती है उसका वास्तविक गांवों से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं होता। वह छवि पूरी तरह से काल्पनिक होती है। पर जैसा कि पहले ही जिक्र किया जा चुका है कि लेखक ने एक पत्रकार के नजरिए से कहानी को गढ़ा है इसलिए ग्लोबल बाबा के कस्बों में देशीपन नजर आता है। लेखक-निर्देशक ने अनेक मुद्दों को समेटने का प्रयास तो किया है, पर एक साथ कई समस्याओं को साथ ले चलाने की वजह से वे किसी को ज्यादा विस्तार नहीं दे पाए हैं।  निराशाजनक यह है कि पूरी फिल्म में बाबाओं के आभामंडल को चुनौती देने और खंडित करने की कोशिश करते निर्देशक-कहानीकार अंतः वही नहीं कर पाते जिसके लिए पूरा रायता फैलाया गया है। फिल्म का अंत चौंकाता है। एक समय तो ऐसा लगता है कि फिल्म कला फिल्म के ट्रैक पर चली गई है। अचानक  ट्रैक बदलने से फिल्म कमजोर होती है और आम दर्शक के मन में निराशा पैदा करती है।   

कहानी का सारा दारोमदार इसके किरदारों और कलाकारों के अभिनय पर टिका है। रवि किशन, अभिमन्यु सिंह और पंकज त्रिपाठी जैसे शानदार कलाकारों ने फिल्म के रोमांच को बनाए रखा है। खासतौर से पंकज त्रिपाठी का किरदार डमरू बाबा, जिसने फिल्म को हल्का-फुल्का कामेडी फ्लेवर दिया है। डमरू की तोतली जुबान दर्शकों को खूब हंसाती है। फिल्म का संगीत ऐसा नहीं है कि उसे थिएटर से निकालने के बाद भी जुबान पर चढ़ सके। अंत में बस यही कहा जा सकता है कि ग्लोबल बाबा एक शानदार शुरुआत के कमजोर अंत की कहानी है।   

 



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं।.

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