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ज़ुबान
लड़खड़ाती


मोजेज़ सिंह
लेखक - निर्देशक


























Movie Review
ज़ुबान:लड़खड़ाती पटकथा


                     

संगीत की कमान, प्रेम और अटकती जुबान 

संगीत मनोरंजन का माध्यम बनकर मुखर होता है तो मन को आल्हादित करता है लेकिन कहीं आत्मा में अटक जाए तो तब तक भटकाता है जब तक कि संगीत को हम अपना मुकद्दर ना बना लें। अगर संगीत के संस्कार कम उम्र में मिल जाए तो संगीत जीवन के द्वंद में आत्मध्वनि बनकर प्रकट होता है।  लेखक निर्देशक मोजेज सिंह की फिल्म जुबान को देखते समय ये विचार मानस पटल पर उभरने लगते हैं।

बेशक मोजेज सिंह की कहानी में थोड़ा नयापन है और इससे वे फिल्म को अलहदा जुबान दे सकते थे। फिल्म का ट्रेलर भी कुछ अलग हटके कंटेट का संकेत दे रहा था पर अफसोस वे संपूर्ण प्रभाव वाली फिल्म बनाने से चूके हैं।  

ये कहानी है पंजाब के एकयुवा दिलशेर (विकी कौशल) की जो कुछ बनना चाहता है। और इसके लिए वो पूरी तरह प्रयासरत है। हालांकि उसे बचपन में  अपने पिता से संगीत के संस्कार मिले हैं। लेकिन बचपन से ही जुबान में हकलाहट और पिता के साथ हुए नियति के अन्याय से क्रुद्ध होकर वह संगीत से तौबा कर लेता है।

वह बहुत पैसे वाला बनना चाहता है। इसके लिए उसका आयडियल मैन है उसके गांव का रहने वाला गुरु सिंकद (मनीष चौधरी) जिसके करीब होने के लिए वह नैतिक-अनैतिक रास्ते पार करता हुआ आगे बढता जाता है।

इस दौरान नायिका से करीबी उसे संगीत की ओर खींचती है पर वह अपने कटु अनुभवों को ध्यान में रखते हुए , गाने बजाने से दूर भागता है। अपनी आत्मा की आवाज को मारकर वह, वो काम करना चाहता हं जो उसके संस्कारों में है ही नहंीं। वह अपने आयडियल के करीबी होने में सफल हो जाता है और अपनी मंजिल के करीब होता है, लेकिन उसका जिंदगी के पेचोखम में पड़ना,   नायिका की प्रेम प्राकट्य और आत्मा की अंर्तध्वनि उसे संगीत की ओर ले जाती है।

लेखक निर्देशक मोजेज सिंह ने गुरू सिंकद और दिलशेर के किरदारों पर काफी मेहनत की है। लेकिन एक झटके में उनके चरित्रों का पतन करके उन्हें खुद ही कमजोर किया है। मसलन शुरुआत में दर्शक दिल से नायक दिलशेर से जुड़ने लगते हैं, लेकिन अपनी महत्वाकांक्षाओं में लिपटे दिलशेर का अपने सहकर्मी का पैर तोड़ देना उसके चरित्र का पतन कर देता है।

इसके अलावा ये कहानी बिना संस्पेंस के भी कही जा सकती थी पर उन्होंने फिल्म में सस्पेंस डालकर फिल्म को अलग रंग दे दिया जो सांगीतिक पृष्ठभूमि की फिल्मों में तो बिल्कुल नहीं सुहाता है। दरअसल मोजेज सिंह की कहानी में सांगीतिक पृष्ठभूमि पुरजोर है पर सुमित राय के साथ मिलकर लिखी गई पटकथा में संस्पेंस पर ज्यादा जोर देते हैं।

फिल्म का अंत थोड़ा अटपटा लगता है जहां पर नायक का पता ही नही चल पाता हैं कि वो शबद कीर्तन गायन से जुड़ा या उसने पंजाबी भागड़ा बैंड बनाया। फिल्म का स्क्रीनप्ले जहां से आगे बढना चाहिए था वहीं फिल्म चुपचाप आकर खत्म हो जाती है। फिल्म को थोड़ा और बढाया जा सकता था। जहां पर नायक के जिंदगी में संगीत के दम पर सफल होने के कुछ दृष्य थोड़े ड्रामे के साथ पेश किए जा सकते थे।

हां नायक के पिता की श्रवण शक्ति के क्षीण होने के माहौल को उन्होंने थोड़ी देर में ही बड़े प्रभाव के साथ पेश किया है। अगर ये माहौल दृष्यों संवादों के साथ प्रस्तुत किया जाता तो मूल में छुपी असली कहानी बाहर निकल कर आती।

   फिल्म का गीत संगीत ठीकठाक हैं। फिल्म का एक गीत सानू ओ मिलेआ खूब धूम मचा चुका है पर इस गाने को फिल्म के अंत में दिखाया गया है जो उतना असर नहीं छोड़ पाता है।

फिल्म में नायक विकी कौशल का अभिनय काबिले तारीफ है पर उन्हें मोजेज सिंह पूरा मौका देते हैं लेकिन नायिका सारा को वो सिर्फ गलैमर, नशेबाजी और संगीत की धुन में झूमते दिखाकर छोड़ देते हैं। उनकी अपनी कहानी और संगीत से उनके जुड़ाव पर भी पटकथा में जोर दिया जाता तो शायद स्थितियां और बेहतर हो सकती थीं। लेकिन फिर भी ये फिल्म युवाओं को प्रेरित करने वाली फिल्म है जिसे युवा, दर्शक के रूप में देखकर स्वयं को इस कहानी से जुड़ा हुआ पा सकते है ।

                        धर्मेंद्र उपाध्याय  



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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