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जय गंगाजल
जय हो !


प्रकाश झा
लेखक - निर्देशक


























Movie Review
जय गंगाजल :दो अक्षर ही नहीं दो कदम आगे


जय गंगाजल

'गंगाजल' से दो अक्षर ही नहीं दो मील भी आगे

लेखक : प्रकाश झा

निर्देशक : प्रकाश झा

कलाकार : प्रियंका चोपड़ा, प्रकाश झा, मानव कौल, निनाद कामत, शक्ति सिन्हा, राहुल भट्ट, मुरली शर्मा,

जय गंगाजल सिर्फ फिल्म नहीं है, बल्कि यह हमारी मौजूदा व्यवस्था का दस्तावेज है. आम आदमी के बीच हर तरफ निराशा है. राजनीतिज्ञों ने हमारे लोकतंत्र पर इतनी मजबूत पकड़ बना ली है कि ईमानदार अफसर से लेकर आम आदमी तक कराह रहा है. हमारी पूरी व्यवस्था राजनीतिज्ञों के इशारे पर चल रही है. पुलिस व्यवस्था हो या न्याय व्यवस्था आम आदमी सबसे निराश है. कहीं कोई उम्मीद नहीं दिखती. ऎसे में बेचारा आम आदमी क्या करे... कई बार देश के अलग अलग हिस्सों में आम आदमी का गुस्सा भीड़तंत्र बनकर फूटा है... और फूटता रहता है. जबतब हम सुनते रहते हैं कि भीड़ ने कानून को अपने हाथ में ले लिया और अपराधी को पीट पीट कर मार दिया. जय गंगाजल में भी यही तस्वीर है.

बबलू पांडे (मानव कौल) बाहुबली विधायक है. सरकार उसके समर्थन से चलती है इसलिए मंत्री भी उसके इशारे पर चलने को तैयार है. और इसी का लाभ उठाकर बबलू पांडे का छोटा भाई डबलू पांडे (निनाद कामत) गुंडागर्दी की हर दहलीज को पार करता जाता है. खुद बबलू पांडे पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं, लेकिन पुलिस ऑफीसर बी एन सिंह (प्रकाश झा)  चूँकि उसका खास पालतू है, इसलिए हर मामले से उसे बचाये हुए है और वह बबलू पांडे के हर बुरे काम में खुलकर साथ देता है. सामंता ग्रुप उस इलाके में बहुत बड़ा बिजली प्लांट लगाना चाहता है. इसके लिए उसे सैकड़ों एकड़ जमीन चाहिए. डबलू पांडे जमीन उपलब्ध कराने का ठेका लेता है और येन केन प्रकारेण किसानों से जमीनें छीनने की कोशिशें करता है. जिले का एस पी उसकी राह में बाधा बनने लगता है, तब बबलू पांडे उस एसपी का तबादला करवा देता है. एस पी के तौर पर मंत्री अपने एक स्वर्गीय मित्र की आइपीएस बेटी आभा माथुर (प्रियंका चोपड़ा) की पोस्टिंग करवाता है, लेकिन एस पी आभा माथुर भी ईमानदार अफसर निकलती है. वह न सिर्फ बबलू पांडे की बादशाहत के आड़े आती है, बल्कि बबलू पांडे के पालतू पुलिस अफसरों के सोये जमीर को भी जगाती है. और फिर बबलू पांडे का खास सिपहसालार पुलिस अधिकारी बी एन सिंह ही उसकी ताबूत में कीलें ठोक देता है.

कहने को यह फिल्म 2003 में आई गंगाजल का सिक्वेल है, इंटरवल के बाद स्क्रिप्ट उस रास्ते जाते दिखती भी है, लेकिन सही मायने में यह फिल्म गंगाजल से कई मायनों में अच्छी है और वैचारिकी रखती आगे बढती है. गंगाजल बिहार के मशहूर आँखफोड़बा कांड से प्रेरित थी, जबकि यह फिल्म पूरे देश की तस्वीर को सामने रखती है. भाषा के स्तर पर फिल्म जरूर गंगाजल को छूती है, लेकिन कथन के स्तर पर उससे काफी ऊपर है. गंगाजल में अजय देवगन फ्रस्ट्रेटेड और मजबूर दिखते हैं, जबकि जय गंगाजल की आभा माथुर यानी प्रियंका चोपड़ा शालीन लेकिन मजबूत दिखती है. उसे खुद पर भरोसा है और वह धीरे धीरे बबलू पांडॆ से लेकर मंत्री तक की नकेल कस देती है. इस क्रम में चुनाव आचार संहिता उसकी ढाल बनती है. विकास के नाम पर किसानों की जमीन किस बेरहमी और जोर जबरदस्ती से छीनी जाती है, इसका काला चिट्ठा प्रकाश झा ने खूब बढ़िया तरीके से खोला है. किसानों की आत्महत्या के प्रसंग को भी खूब जबरदस्त तरीके से उठाया है. यह फिल्म सिनेमा के मूल धर्म मनोरंजन के फलक से उठकर मजबूती से व्यवस्था पर चोट करती है. उसे बेनकाब करती है, तार तार करती है और यह भरोसा भी जताती है कि व्यवस्था चाहे कितनी भी दारुण क्यों न हो जाये, इंसानियत को खत्म नहीं कर सकती.  

पटकथा में जबरदस्त पकड़ है और इस बार प्रकाश झा ने कहीं भी पटकथा को कथ्य से भटकने नहीं दिया है. पटकथा सच्चाई के बिल्कुल करीब से आगे बढ़ती है और बड़ी ही खूबसूरती के साथ आम आदमी के भरोसे और चाहत को जीत दिलाती है. संवाद गंगाजल जैसे चुटीले नहीं हैं. यह कमजोरी है. प्रियंका चोपड़ा ने बेशक अच्छा काम किया है. अजय देवगण की कमी महसूस नहीं होने देती. प्रकाश झा ने पहली बार अभिनेता के तौर पर काम किया है और क्या खूब काम किया है ! बी एन सिंह के कई शेड्स हैं, वह बेईमान पुलिस अफसर है, फिर वह गैरतमंद संवेदनशील इंसान में परिणत होता है और फिर हीरो के तौर भी प्रकट होता है. प्रकाश झा ने तीनों ट्रांजीशन को बखूबी रुपायित किया है. कमाल ! फिल्म में गीत नहीं है, लेकिन सलमान सुलेमान का संगीत है... खूब अच्छी संगत है संगीत की. निनाद कामत ने अपने चयन को बेहद सटीक साबित किया है. बबलू पांडे के रूप में मानव कौल भी कुछ दृश्य में छाप छोड़ते हैं.

धनंजय कुमार

     



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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