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अपूर्व असरानी
पटकथा


इशानी बनर्जी
कहानी


हंसल मेहता
निर्देशन


























Movie Review
अलीगढ़:सवाल उठाती फ़िल्म - सवाल पैदा करती पटकथा


चाहे दुनिया का सबसे विवादग्रस्त मुद्दा ले लीजिए, दमदार कलाकार भी ले लीजिए और असलियत के करीब रहने के लिए असली लोकेशन पर जाकर शूट भी कर लीजिए और चाहे आप दुनिया के बड़े से बड़े फिल्म मेले में से सबसे बड़ा अवार्ड भी ले आईए, लेकिन अधपकी सक्रिप्ट से अधपकी फिल्म ही बन सकती है, इस लिए बेहतरीन अदाकारी के बावजूद अलीगढ़ एक गंभीर फिल्म दर्शक को निराश ही करती है। 

अलीगढ़ की कहानी जग जाहिर है, अलीगढ़ युनिवर्सिटी में मराठी के प्रोफैसर श्रीनिवास रामचंद्र सीरस को इस लिए नौकरी से ससपैंड कर दिया गया क्योंकि वह समलिंगी हैं। सहकर्मियों की राजनीति की वजह से उनके अतरंग पलों को न्यूज़ कैमरे में कैद करके उन्हें बदनाम कर दिया जाता है और इसी को आधार बनाकर रिटायरमेंट से सिर्फ छह महीने पहले ना सिर्फ उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा बल्कि आनन-आफन में अपना निवास भी छोड़ना पड़ा।

मनोज वाजपेयी हमेशा की तरह अपने किरदार में एक दम उतर जाते हैं। प्रोफैसर सीरस के किरदार में वह हर भारतीय समलिंगी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्हें गेअ और प्यार जैसे शबदों को हल्के में यूं ही प्रयोग कर लेना नहीं सुहाता। वह कहते हैं कि युवा पीढ़ी हर व्यक्ति को टैग से देखती है। जबकि इंसान को इंसान की तरह देखें तो वह उसके अहसासों को बेहतर समझ सकते हैं। उर्दू यूनिवर्सिटी में मराठी के प्रोफैसर और शादीशुदा लोगों में गैर-शादीशुदा होना उन्हें भीड़ में अलग और तन्हा करता है। यही अलगपन उन्हें अपने सहकर्मियों की साजिशों के निशाने पर ले आता है। उनकी शाम की तन्हाई व्हसकी का ग्लास और लता मंगेश्कर के क्लासिक गीत दूर करते हैं। वह दीपू (राजकुमार राव) को बताते हैं कि गीतों और किताबों से इश्क की वजह से उनकी पत्नी उनका साथ छोड़ कर चली गई। कवि सीरस दीपू को समझाते हैं, “कविता शब्दों में कहां होती, अंतराल में होती है, पॉज में होती है, खाली जगह में होती है।यह सब करते हुए वह एक खुले दिल वाले खिलंदड़ पुरूष की तरह लगते हैं, लेकिन अतरंग सवाल आते ही वह शर्म से लाल हो जाते हैं, लफ्ज़ उनका साथ छोड़ने लगते हैं, वह गहरी चुप्पी में डूब जाते हैं। बेहद कम शब्दों में और कुछ हाव भाव से अपने साथ हुए अन्याय का राज़ खोलते हैं। मनोज वाजपेयी हर दृश्य में सीरस को जीते हुए नज़र आते हैं। 

जो प्रमुख ख़ामी हंसल मेहता की फिल्म सिटी लाइट में थी वही खामी अलीगड़ में भी देखने को मिलती है। वह प्रोफैसेर सीरस का किरदार उभारने पर तो पर ज़ोर देते हैं लेकिन दूसरे प्रमुख किरदार दीपू सब्सेटियन (राजकुमार राव) को अधपका ही छोड़ देते हैं। दीपू और सीरस का मेल जोल तो होता है और यह भी दिखाने की कोशिश की गई है कि वह उनकी मुश्किलें सुलझाने में मदद करना चाहता है जिसके लिए वह उनसे मिलता है, उनसे बात करता है, उनका इंटरव्यू करता है, लेकिन वो करता है, यह कहीं नहीं दिखाया गया है। अंत में जब सीरस केस जीत जाते हैं तो अचानक दीपू को बधाईयां मिलने लगती हैं कि उसने कमाल कर दिया है, तब भी दर्शक सोचने के लिए मजबूर हो जाता है कि आखिर उसने किया क्या है। 

दीपू एक युवा पत्रकार है जो एक प्रमुख राष्ट्रीय अख़बार में प्रोबेशन पर है, उसकी ब्योरो चीफ उसे वह स्टोरीज़ नहीं करने देती जिसमें एक्सीपीरियेंस चाहिए। वह पत्रकारिता के ज़रिए एक प्रोफैसर, जिसके समलिंगी होने की वजह से उससे अन्याय हुआ है, की मदद करना चाहता है, जिसके लिए वह अपनी अख़बार के प्रोटोकॉल से बाहर जाकर कवरेज करने दिल्ली से अलीगढ़ जाता है। एक ईमानदार और मानव हितैषी युवा पत्रकार होने के बावजूद फिल्म में कोई ऐसी ड्राईविंग फोर्स या motivation नहीं है जो दीपू को प्रोटोकॉल से बाहर जाकर यह स्टोरी करने के लिए प्रेरित करती हो। वह ढांचा कैसे उसकी हटके स्टोरी को छापने के लिए तैयार हो जाता है जो उसके इस तरह अलीगढ़ जाने का किराया तक देने के लिए तैयार नहीं है। छापने के लिए तैयार होता कहना भी गलत ही होगा, दीपू क्या नया खुलासा करता है, क्या लिखता है, यह दिखाने की ज़हमत हंसल मेहता ने नहीं उठाई है। बस वह यह दिखाते हैं कि कैसे बड़ी मुश्किल से दीपू प्रोफैसर सीरस को इंटरव्यू देने के लिए मनाता है और अंतरमुखी सीरस कैसे बड़ी मुश्किल से झिझकते और शर्माते हुए अपने अंतरंग पलो और उनके खिलाफ की जा रही राजनीति के बारे में बताते हैं। हंसल यह दर्शक पर छोड़ देते हैं कि वह खुद ही मान ले कि दीपू ने प्रोफैसर को जो इंटरव्यू लिया है वह हूबहू छप गया है। बतौर पत्रकार दीपू उस पर क्या लिखता है और इस कहानी को कैसे पेश करता है जिससे उन्हें न्याय दिलाने में मदद हो फिल्म में यह पूरी तरह से गायब है। हां, इंसानियत के नाते वह कैसे प्रोफैसर से जुड़ता है और उनके प्रति उसकी क्या संवेदना है, वह अंत तक देखने को मिलती है। प्रोफैसर का पहले उसको घर से भगा देना और अंत में उसे अमेरीका चले जानी वाली दिल की वह बात बताना, जिसे उन्होंने किसे से नहीं कहा है, दोनों के रिश्ते में आती गहराई को उभारता है। लेकिन राजकुमार राओ के पत्रकार वाले किरदार को पूरी तरह से उभारने में हंसल चूक गए हैं। पूरी फिल्म वह दीपू की निजी जि़ंदगी का इशारा भर देते हैं, चाहे उसकी कमज़ोर आर्थिक प्रस्थिति की बात हो या उसकी अपने मकान मालकिन से तकरार हो, लेकिन अचानक उसकी बॉस (दिलनाज़ इरानी) उसे छत पर ले जाकर, उसे ड्रिंक पिला कर उसे किस करने क्यों लग जाती है, समझ में नहीं आता। दोनों में किसी किस्म की नज़दीकी हो, इस दृश्य से पहले या उसके बाद, कहीं कोई इशारा तक नहीं दिया गया है।

मीडिया वालों द्वारा सीरस के अतरंग दृश्यों की रिकार्डिंग करने को स्टिंग आप्रेशन कहने से भी मैं सहमत नहीं हूं। जब असल घटनाएं हुई हों तब इसे स्टिंग परेशन की तरह पेश किया गया हो सकता है, लेकिन फिल्म में जब असल सच्चाई बताई जा रही है तो डंडे से पीट कर बनाई जा रही वीडियो को स्टिंग कहना ठीक नहीं लगता। स्टिंग तभी होता है जब किसी की रिकार्डिंग उसे बिना बताए की गई हो। हंसल इसे एक प्लांटेड रिकार्डिंग बताने की कोशिश करते हैं लेकिन टर्मिनॉलजी के विरोधाभास को अनछुआ छोड़ देते हैं। 

यूं तो हर फिल्म के हर दृश्य में लोकेशन का अपना महत्व होता है, लेकिन ऐसी मीनिंगफुल फ़िल्म में लोकेशन की अहमियत और भी बढ़ जाती है जिसमें केवल वैरायटी के लिए लोकेशन का इस्तेमाल किया जाए तो अटपटा लगता है। मुझे समझ में नहीं आया कि हंसल, दीपू और सीरस की एक मुलाकात गंगा में बहती हुई नाव में क्यों करवाते है। जहां प्रोफैसर सीरस अपने ही बैड रूम में केवल दीपू के सामने अपने अतरंग रिश्ते या अपनी निजी जि़ंदगी के बारे में बात करने से झिझकते हैं, वहीं, वह नाविक की उपस्थिति में अपनी पिछली जि़ंदगी, शादी और अपने समलिंगी साथी से अपने आठ साल के रिश्ते के बारे मे बात करते हैं। ऐसा कैसे हो गया, समझ से परे है।

एक बात के लिए हंसल की दाद दी जा सकती है कि वह किरदारों, यूनिवर्सिटी के माहौल और सीरस के एक संवाद के ज़रिए उनकी पहचान बता कर केवल इशारा भर करते हैं कि उनकी इस हालत के लिए उनके ब्राहम्ण होते हुए एक मुसलिम युनिवर्सिटी में होना भी एक कारण हो सकता है, लेकिन वह इसे पूरी तरह से मुस्लिम बनाम हिंदु बनाने के अतिरेकता तक नहीं जाते। वह इमानदारी से यह भी बताते हैं कि सीरस नहीं चाहते थे कि उनका केस गे बनाम यूनिवर्सिटी हो, बल्कि वह अपना केस आम नागरिक के मानवअधिकारों के केस के तौर पर लड़ना चाहते थे। इसके साथ ही हंसल इस बात को भी सफलता से स्थापित करते हैं कि यौन प्रवृति निजता और मानवीय अधिकार के दायरे में आती है ना कि सामूहिक सामाजिक नैतिकता के दायरे में। इस तरह यह प्रोफैसर सीरस के बहाने समलिंगियो के मानव अधिकारों की आवाज़ बुलंद करने का एक बादलील माध्यम बन जाती है। प्रोफैसर सीरस के किरदार की इमानदार प्रस्तुति और मानवधिकारों की इमानदार कोशिश की वजह से इस फिल्म को ढाई स्टार देने में मुझे कोई हर्ज़ नहीं है।



   दीप जगदीप सिंह

दीप जगदीप सिंह स्‍वतंत्र पत्रकार, पटकथा लेखक व गीतकार हैं.

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