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बॉलीवुड डायरीज
सपनों की कहानी


के डी सत्यम
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
बॉलीवुड डायरीज:रियल से रील लाइफ का सफरनामा


                             रियल लाइफ से रील लाइफ का सफरनामा है बॉलीवुड डायरीज

लेखक-निर्देशक: के डी सत्यम

स्टार कास्ट: आशीष विद्यार्थी, रायमा सेन, सलीम दीवान, करुणा पाण्डेय, विनीत कुमार सिंह

   

देश के कोने-कोने से हर रोज हजारों लोग अपनी किस्मत चमकाने मुंबई आते हैं। इनकी आँखों में एक सपना होता है, जिसकी मंजिल मुंबई होती है। पर बहुत से ऐसे लोग भी हैं जिनकी आँखों में मुंबई जाने का सपना तो होता है लेकिन यह सपना कभी पूरा नहीं हो पाता। अपने शहर में बैठे-बैठे ताउम्र वे इस सपने को जीते हैं, पर मुंबई जाने वाली ट्रेन नहीं पकड़ पाते। बॉलीवुड डायरीज भी इन्हीं सपनों की कहानी है। फिल्म के लेखक-निर्देशक केडी सत्यम ने मुंबई जाने के सपने को बॉलीवुड डायरीज के रूप में पर्दे पर उतारा है। इससे पहले केडी सत्यम ने 'गट्टू' फिल्म बनाई थी, जो कई फिल्म समारोहों में काफी चर्चित हुई थी। 'गट्टू' एक बाल फिल्म थी। लेकिन इस बार सत्यम की कहानी सिनेमा और समाज के रिश्ते की कड़वी सच्चाई पर रौशनी डालती है। अक्सर हमारे समाज में सफलता की मिसाल दी जाती है और असफलता की चर्चा तक नहीं होती। अधिकांश फिल्में भी इसी ट्रैक पर चलती हैं पर सत्यम ने अपनी फिल्म में तीन ऐसे दीवानों को जगह दी है जो अपने सपने को पूरा करने में असफल हो जाते हैं। फिल्म की कहानी तीन किरदारों से शुरू होती है। तीनों तीन अलग-अलग शहरों और अलग-अलग परिवेश से आते हैं, पर इनका सपना एक ही है। इमली (रायमा सेन) कोलकाता के सोनागाछी में अपनी बेटी के साथ रहती है। वेश्यावृति का काम करते हुए भी उसके मन में मुंबई जाने का सपना पलता रहता है। वह बॉलीवुड में जाकर हिरोइन बनना चाहती है।

दूसरा किरदार है विष्णु श्रीवास्तव। विष्णु उम्र के 52 वें पड़ाव पर है और अपने परिवार के साथ छत्तीसगढ़ के भिलाई में रहता है। कॉलेज के दिनों में वह थिएटर करता है और एक्टर बनाना चाहता है, पर जिंदगी की जद्दोजहद में उसे अपने पैशन से समझौता करना पड़ता है। घर-परिवार के खातिर वह नौकरी कर लेते हैं लेकिन उसके अंदर का एक्टर हमेशा जिंदा रहता है। बेटी की शादी के बाद वह फिर से एक्टिंग में हाथ आजमाने की कोशिश करता है। तीसरा किरदार दिल्ली में रहने वाला रोहित है। रोहित को एक्टिंग बिल्कुल भी नहीं आती पर वह हिंदी फिल्मों का दीवाना है.... कॉल सेंटर में काम करते हुए रोहित प्रोडक्ट्स बेचने की जगह मुंबई के प्रोड्यूसर्स से फिल्मों में काम मानता रहता है।

 तीनों हर हाल में मुंबई जाना चाहते हैं, पर उनकी मजबूरियाँ उन्हें रोकती हैं। कहानी आगे बढ़ती है और एक समय ऐसा आता है जब इन्हें लगता है कि उनका सपना अब पूरा होने वाला है। इमली के जीवन में दमन (विनीत कुमार सिंह) नाम का एक असिस्टेंट डायरेक्टर आता है। दमन को एक रियल कहानी की तलाश होती है। इमली की बदौलत दमन को एक सच्ची कहानी मिलती है और इमली को मुंबई जाने की उम्मीद... दूसरी तरफ विष्णु के जीवन में भी एक ऐसा मौका आता है जब उसे लगता है कि वह मुंबई जा सकता है। अपनी बेटी की शादी करने बाद विष्णु नौकरी से वीआरएस ले लेता है और मुंबई जाने की तैयारी में लग जाता है। रोहित को भी एक के टैलेंट हंट में मौका मिलता है और वह टीआरपी की कुरूपता का शिकार होता है। कहानी के अंत में सबकी उम्मीदें एक साथ टूट जाती हैं। इमली को हीरोइन बनाने वाला दमन किस और को लेकर फिल्म बनाने लगता और इमली मुंबई की जगह दुबई की बार में चली जाती है। विष्णु को अंत में पता चलता है कि उसे कैंसर है और वह कुछ ही दिन का मेहमान है और रोहित भी टीवी की टीआरपी खत्म होने के साथ ही शो से बाहर कर दिया जाता है। कहानी अपने अंत में एक दर्द और बहुत सारे सवाल छोड़ जाती है। अचानक से यह अहसास होता है कि सिनेमा और समाज का फासला कितना बड़ा है।

कहानी के प्रभाव को बनाए रहने के लिए सत्यम ने कैमरा मोमेंट और लाइट के साथ जम कर प्रयोग किया है। हर सीन किरदार के दृष्टिकोण से फिल्माया गया है। स्क्रीन पर अधिकांश समय तक डार्कनेस छाई रहती है। इसका प्रयोग संभवत सत्यम ने किरदारों के द्वंद दिखाने के लिए किया है। फिल्म के कई सीन बेहद दार्शनिक अंदाज में प्रस्तुत किए गए हैं। इस जन्म मंक  एक्टिंग न कर पाने की कसक के लिए विष्णु का पुनर्जन्म के लिए प्रयास करना इसी का हिस्सा है। फिल्म का हीरो इसकी कहानी है। यही वजह है कि फिल्म की रफ्तार धीमी होने के बावजूद दर्शकों की रुचि अंत तक बनी रहती है। केड़ी सत्यम ने हर प्लॉट के बीच-बीच में ह्यूमर डालने की भी पूरी कोशिश की है। कई बार उदासी भरे सीन के बावजूद सटीक ह्यूमर होठों पर मुस्कान बिखेर जाते हैं। विष्णु जब किसी स्टार के घर में पुनर्जन्म के लिए अपनी पत्नी से चर्चा करता है तब ऐसा ही ह्यूमर क्रिएट होता है। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसकी स्क्रिप्ट है। इंटरवल के बाद केड़ी सत्यम तीनों कहानियों में समंजस्य नहीं बैठा पाते। तीनों किरदारों की कहानियों को एक साथ पर्दे पर दिखा पाने में वह कमजोर रह गए हैं। इन कहानियों को और बेहतर तालमेल से पर्दे पर उतारा जा सकता था। फिल्म में कहानी के अनुरूप संवादों की कमी भी खलती है यही वजह है कि बेहतरीन कहानी के बाद भी फिल्म थोड़ी फीकी रह गई है। फिल्म में सबसे उम्दा अभिनय आशीष विद्यार्थी ने किया है, 52 साल के विष्णु के किरदार को उन्होंने जीवंत कर दिया है। साथ ही रायमा सेन ने भी दिल में अरमान लिए हुए इमली का किरदार बखूबी  निभाया है। लंबे समय के बाद पर्दे पर लौटी रायमा की खूबसूरती खुल कर सामने आती है। सलीम दीवान ने एक स्ट्रगलिंग एक्टर का किरदार निभाया है जिसे एक्टिंग बिलुकल भी नहीं आती और बात को सलीम अपने अभिनय से सिद्ध कर दिया है। छोटे से रोल में करुणा पाण्डेय और विनीत कुमार सिंह का अभिनय भी दमदार है। कुल मिलकर केडी सत्यम ने एक कलात्मक फिल्म बनाई है, इसमें कई कमियाँ भी हैं लेकिन कहानी इतनी दमदार है कि फिल्म के अंत में सिर्फ वही जेहन में रह जाती है।    

 



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं।.

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