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लव शुदा
लव से जुदा


वैभव मिश्रा
लेखक - निर्देशक


हुसैन दलाल
संवाद


























Movie Review
लव शुदा :लव से जुदा


दिल से जुदा हो गई 'लवशुदा'

 

निर्देशक-लेखक-पटकथा : वैभव  मिश्रा                                                                      
संवाद : हुसैन दलाल                            

सितारे : गिरीश कुमार, नवनीत कौर ढिल्लन, टिस्का चोपड़ा

निर्माता : विजय गलानी

संगीत : मिथुन, परिचय

गीत : सईद कादरी, कुमार, मनोज यादव, परिचय

वैलेंटाइन डे के सीजन में बॉलीवुड के सिलवर स्क्रीन पर इश्क़ की खुमारी छाई हुई है। मोहब्बत के लिबास में लिपटी प्रेम कहानियां बसंत के मौसम को रूमानी बनाने की पूरी कोशिश कर रही हैं। 'सनम तेरी कसम', 'सनम रे',‘फितूर’ , 'इश्क फोरएवर', 'डायरेक्ट इश्क', 'लव शगुन' और ‘लखनवी इश्क़’ के बाद रिलीज हुई 'लवशुदा'  इसी बहार की एक बेला है। पर क्या ये बहार बॉलीवुड की फुलवारी को फूलों से चहक महक करने में सफल रही? क्योंकि इतनी बड़ी तादात में रिलीज होने के बावजूद अब तक कोई भी लव स्टोरी दर्शकों के जेहन में अपनी छाप नहीं छोड़ पाई है। फिल्म रिलीज के समय दर्शकों की जुबान पर मोहब्बत के गाने तो चढ़ते हैं पर कहानी दिल को नहीं छू पा रही है। 'लवशुदा' भी इसी सिलसिले की एक कड़ी नज़र आ रही है।

अमूमन एक बॉलीवुडिया प्रेम कहानी ‘ना ना करते प्यार हाय मैं कर गई’ के फार्मूले पर आगे बढ़ती है। 'लवशुदा' भी इसी सूत्र को अपनाती हुई चलती है। इंटरवल के पहले हीरो अपने वास्तविक प्यार को लेकर असमंजस है और ना ना करते-करते हुए हां कहता है और इंटरवल के बाद हीरोइन। फिल्म की कहानी एक वन नाइट स्टैंड से शुरू होती है। एक बैचलर पार्टी में गौरव (गिरीश कुमार) की पूजा (नवनीत कौर ढिल्लन) एक बिस्तर पर से मुलाकात होती है। अगले दिन जब गौरव की आंख खुलती है तो बगल में बिस्तर पर लेटी इस लड़की के बारे में उसे कुछ भी याद नहीं है। बीती रात क्या हुआ उसे कुछ नहीं पता। वह कुछ सोच समझ पाए, इससे पहले दरवाजे पर दस्तक होती है। गौरव आनन-फानन में उस लड़की को वहां से भगा देता है। जाते-जाते वह लड़की गौरव की एक शर्ट पहन कर चली जाती है। बाद में गौरव को अहसास होता है कि वो शर्ट तो उसकी होने वाली सास ने उसके लिए भेजी भी। उसे हर हाल में वो शर्ट चाहिये।

अपने दोस्तों के साथ वह उस लड़की को ढूंढने निकल पड़ता है। काफी मशक्कत के बाद उन्हें वो लड़की मिल जाती है। पूजा से दोबारा मिलते ही गौरव को कुछ अलग-सा अहससा होता है। लेकिन ये अहसास प्यार में नहीं बदल पाता। गौरव की शादी उसकी मंगेतर वंदना से हो जाती है और कुछ समय बाद उनका तलाक भी हो जाता है। चार साल बाद एक दिन अचानक गौरव की मुलाकात पूजा से होती है। वह पूजा को अपने दिल की बात बताता है, लेकिन अब पूजा की भी शादी होने वाली है। पूजा खुद को उसी मोड़ पर पाती है, जहां कुछ साल पहले गौरव खड़ा था। और फिर कभी हां, कभी ना करते-करते कहानी अपने अंजाम तक पहुंचती है।

फिल्म में मोटे तौर पर दो-तीन बातें कहने की कोशिश की गयी है। पहली तो ये कि सबको खुश रखने के चक्कर में कई बार इंसान जीवनभर दुखी रहता है। वो अपने दिल की कभी सुन ही नहीं पाता। एक बात ये भी कि जब जो पल अपने प्यार के अहसास के लिए आवाज दे तो उस पल को जी लेना चाहिये। दिल की आवाज सुनने में बिल्कुल भी देर नहीं करनी चाहिए नहीं।

फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले खुद डायरेक्टर वैभव मिश्रा ने ही लिखी  है। इंटरवल से पहले तक तो फिल्म में सब कुछ ठीकठाक-सा नजर आ रहा था लेकिन एक वक्त के बाद जबरदस्ती और कहानी खिंचती दिखाई देने लगती है। मिलना, बिछड़ना, फिर मिलना और फिर टिपिकल हिंदी फिल्मों के जैसे इश्क का पनपना। इतना लव ड्रामा पचा पाना काफी मुश्किल है। फिल्म की कहानी पर अंग्रेजी फिल्म का 'हैंगओवर'  दिखाई देता है। ऐसा कई बार लगता है कि फिल्म उसी लीग पर चल रही है पर कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है यह भ्रम भी टूट जाता है। क्योंकि फिल्म के संवाद और पटकथा दोनों ही प्रभावित नहीं करते हैं। अमूमन हर प्रेम कहानी कुछ ही बातों से घिरी रहती है। तो फिल्म 'लवशुदा' इनसे अलग कैसे हुई। बेशक, इस फिल्म में कोई नयी  बात नहीं है। कुछ अलग-सा दिखने वाला भी नहीं है। युवाओं के लिए बनाई गई इस फिल्म में दिखाने की कोशिश की गई है कि दिल की सुनो, अपने लिए भी जियो। लेकिन फिल्म के साथ प्रॉब्लम इतनी है कि इसके इमोशनल सीन दिल को नहीं छू पाते, जबकि लव स्टोरी की जान होते हैं इमोशनल सीन। या फिर यूं कहें की जज्बाती करने वाले दृश्यों पर कलाकार खरे नहीं उतरे। गिरीश कुमार की सकुचाती एक्टिंग कहीं-कहीं ठीक लगती है। लेकिन एक मुक्कमल कलाकार के तौर पर उभरने में उन्हें काफी वक्त लगेगा। गिरीश के सामने नए अभिनेता नवीन कस्तूरिया ने काफी अच्छा अभिनय किया है। कुनाल का उनका किरदार फिल्म को लाइट बनाने में सहायक नजर आता है। सचिन खेडेकर ने पिता के रूप में अच्छा काम किया है। नवनीत कौर ढिल्लन आकर्षक हैं, लेकिन उनके साथ भी वही अभिनय वाली दिक्कत है। इसके अलावा फिल्म की सबसे अहम बात यह है कि इसकी कहानी सुनने में तो अच्छी लगती है, इसका कॉन्सेप्ट भी अपील करता है, लेकिन परदे पर यह केवल एक चमक-दमक वाली कहानी लगती है, जिसे क्लब-पार्टी सॉन्ग्स से सजाकर पेश किया गया है। पार्टी के एक जैसे दिखने वाले तीन गीतों ने फिल्म को अनावश्यक ही लंबा बना दिया है।

कुल मिलाकर लवशुदा लव से, भावनाओं से जुदा लगती है.



   रुद्रभानु प्रताप स

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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