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दिव्या खोसला कुमार
निर्देशिका


हुसैन दलाल
लेखक


संजीव दत्ता
लेखक


























Movie Review
Sanam Re..:सितम रे


सनम रे           

प्रेम के सच्चे मुहावरे को कहने का असफल प्रयास

प्यार का मतलब पाना ही नहीं, कई बार खुद को प्यार के लिए मिटा देना भी तो सच्चे प्यार की निशानी होती है। निर्देशिका दिव्या खोसला कुमार की फिल्म सनम रे, लेखक संजीव दत्ता की इस स्टोरी लाइन पर बुनी हुई फिल्म है। लेकिन इस कथ्य को अपने कुशल निर्देशन से कस नहीं पाई दिव्या। क्योंकि उनका ध्यान लोकेशन, गीत संगीत के अच्छे प्रस्तुतिकरण में ही सिमट गया। 

मुंबई में कॉर्पोरेट कंपनी में कार्यरत युवा आकाश (पुलकित सम्राट) अपने काम में अच्छा नहीं है। उसे अपने बॉस की डांट खानी पड़ती है क्योंकि वो काफी समय से एक कॉट्रेक्ट नहीं ला पा रहा है। मुंबई की रोजमर्रा की जिंदगी जीते हुए अपने घर से कटा कटा सा रहता है। लेकिन एक दिन अपनी मां से दादा की खराब तबियत का हवाला पाकर  वह अपने घर टनकपुर रवाना होता है। जो लोकशन के लिहाज से बर्फीले इलाके में हैं। यहां पर उनके दादा ऋषि कपूर का कभी फोटो स्टूडियो हुआ करता था जो काफी समय से बंद पड़ा है ।

आकाश अपने कस्बे आता है तो उसे अपने बचपन के दिन याद आने लगते हैं। यहीं से उसके बचपन की झलकियां शुरू होंती हैं। जिनमें उसके दादा उसे प्यार के गुर सिखा रहे हैं। यहां जीवन की आपाधापी में खोए हुए नायक के प्यार को समझने और पाने की चीजें दर्शकों को फिल्म से जोड़ती हैं। यहां दिव्या भी अपने विडियो निर्देशन के अनुभवों से प्रभावित करती हैं। जैसे नायक का नायिका को हंसाना, अपने प्यार को खोजने का चाह में पग गिनते हुए स्टूडियो से निकलना।

लेकिन बॉस (मनोज जोशी) के फोन आते ही मुंबई वापसी और फिर कॉट्रेक्ट हासिल करने के लिए योग शिविर में जा पहुंचना नायक के चरित्र चित्रण को कमजोर बनाता है। और यहीं से फिल्म कमजोर हो जाती है। आगे तो फिर लोकेशन और गीत संगीत से ही दर्शकों को बांधने का प्रयास दिखता है। इसके बाद की दृष्यावली कही भी ये साबित नहीं कर पाती है कि निर्देशिका फिल्म का अंत काव्यात्मक करने वाली है।

फिल्म की कहानी में आगे योग शिविर के दौरान आकाश का बिजनस कॉट्रेक्ट पाने के लिए फिल्म की दूसरी नायिका उवर्शी रौतेला से मिलना और यहीं पर फिल्म की नायिका श्रुति (यामी गौतम) का पैराशूटी आगमन। पहले श्रुति का नायक आकाश को खूब प्रेम देना और फिर उसे तन्हा छोड़ जाना इत्यादि बॉलीवुड के प्रचलित फार्मूलों से आगे फिल्म में कुछ खास पैदा नहीं कर पाता है। फिल्म के लेखक संजीव दत्ता और हुसैन दलाल ने कुछ रुमानी संवाद अच्छे लिखे हैं जो युवा प्रेमियों को निश्चित ही लुभाएंगे।

फिल्म को टी सीरिज ने प्रोड्यूज किया है तो गीत संगीत की चर्चा लाजिमी है। फिल्म का टायटल सॉंग रिलीज से पहले ही हिट हो चुका है । लेकिन अरिजीत सिंह की आवाज और संगीत को हटा दें तो इस गीत के बोल बिल्कुल डमी जैसे साफ दिखते हैं। बेशक मनोज मुंतशिर रचित गीत क्या तुझे अब ये दिल बताए की शब्दावली में कहानी का पूर्ण प्रभाव नजर आता है।

कहानी का दुखांत दर्शकों पर असर तो छोड़ता है पर नायक का अचानक स्क्रीन से गुम हो जाना दशकों में इससे पहले ही कोफत पैदा कर चुका होता है। अंतिम सीन में दिल के धड़कने के प्रभाव से दिव्या खोसला कुमार नायिका के सीने में नायक की उपस्थिति और प्रेम के महान मूल्यों को प्रकट करती हैं। लेकिन अंत को सही ढंग से दर्शकों तक पेश करने में चूक जाती हैं। इससे अच्छा होता कि वो आज की नई पीढी की सोच के हिसाब से फिल्म बनातीं जहां प्यार का मतलब सिर्फ पाने से हैं। मसलन डेट पर जाना और गुलाब का फूल देना, हग करना और सेक्स के बाद ब्रेकअप की घोषणा।  प्यार के पुराने मुहावरे को पुर्नस्थापित करने की ललक में नहीं लगता कि वे यारियां की सफलता को दोहरा पाएंगी। 

वैसे फिल्म में यामी गौतम की खूबसूरती और उर्वशी रौतेला की सेक्स अपील सिर चढकर बोली हैं। अगर आप वीकेंड में खूबसूरत लोकेशन , गीत संगीत के साथ अपने अंदर प्यार के जज्बे को जगाना चाहते हैं तो यह फिल्म देख सकते हैं, बशर्ते कि आप ऐसे दर्शक हों जो निर्देशक की बनाई पगडंडी पर चलता चला जाए। 

                        धर्मेंद्र उपाध्याय

 



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। धर्मेंद्र उपाध्याय इन दिनों मुंबई स्क्रीन राइटर के रूप में सक्रिय हैं। .

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