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घायल Once Again
इलाज़ की ज़रूरत


संजय मासूम
पटकथा


सागर पंड्या
कथा


























Movie Review
Ghayal Once Again:Rx ट्रीटमेंट सही कराइए


 

घायल Once Again
जख्म पुराने ट्रीटमेंट फ़िल्मी 
  

More Credits
Story - Shaktiman Talwar
Screenplay - Vishal Vijay Kumar
Director - Sunny Deol

इस बार अजय घायल नहीं है मानसिक तौर पर बीमार है। दरअसल अपने परिवार की मौत और अपने आप पर लगे दाग़ का बदला लेने के लिए बलवंत राय को मौत के घाट उतारने और चैदह साल जेल की सज़ा काटने के बाद भी उसके मानस पर लगे घाव भर नहीं पाए हैं। अब वह एक अख़बार चलाता है जो भ्रष्ट राजनीति, व्यापारी और पुलिस तंत्र को नंगा करती है और पीडि़तों को इंसाफ दिलाती है। इसके लिए अजय मेहरा के पास स्टिंग Operation और आधुनिक तकनीक के साथ-साथ अपना ढाई किलो का हाथ भी है। 

घायल वन्स अगेन बॉलीवुड का खालिस स्क्विल है जिसकी कहानी वहीं से आगे बढ़ती है जहां पर 1990 में घायल की खत्म हुई थी। 14 साल जेल काटने के बाद आज अजय मेहरा ‘सत्यकाम’ अख़बार का संपादक है जिसमें उसका साथ रिटायर्ड पुलिस अफसर एवं आरटीआई एक्टिविस्ट (ओम पूरी) और उसके कुछ दोस्त देते हैं। अतीत की छाप अजय को आज भी तंग करती है. अपने नर्व-सिस्टम को संतुलित रखने के लिए उसे दवा लेनी पड़ती है और उसे यह दवा देने के लिए हर पल उसके साथ उसकी डॉक्टर (सोहा अली ख़ान) रहती है। लोगों को न्याय दिलाने के अपने अंदाज़ की वजह से अजय मेहरा युवाओं और आम लोगों का हीरो है। कहानी में मोड़ तब आता है जब उसके चार युवा फैन रोहन (शिवम पाटिल), अनुष्का (आंचल मुंजाल), वरूण (ऋषभ अरोड़ा) और ज़ोया (डायना ख़ान) ताकतवर बिजनेसमैन राज बंसल (नरेंद्र झा) के बेटे के हाथों हुए कत्ल के ना सिर्फ चश्मदीद गवाह बन जाते हैं, बल्कि उसका सुबूत भी उनके कैमरे में रिकार्ड हो जाता है। चारों अपने हीरो अजय मेहरा तक सुबूत पहुंचाने के लिए निकलते हैं, लेकिन हाईटैक राज बंसल अपने आलीशान गगनचुंबी बंगले में बैठा अपनी हैकिंग टीम और विदेशी गुंडों के ज़रिए उन्हें रस्ते में ही सुबूत सहित खत्म करने की कोशिश करता है। भागमभाग में अजय मुश्किल से सुबूत तो हासिल करता है पर राज बंसल चारों युवाओं को किडनैप कर लेता है। अजय मेहरा के सामने अब एक ही सवाल है कि सुबूत दिखाकर बंसल और गृह मंत्री को एक्सपोज़ करे या युवाओं की जान बचाए। तभी उसके अतीत का एक भावुक सच भी अचानक उसके सामने आकर खड़ा हो जाता है। अब यह लड़ाई सिर्फ नेकी और बदी की नहीं, उसके अपनी जि़ंदगी से जुड़े एक अहम रिश्ते को बचाने की भी बन जाती है।

कहानी बेहद प्रडिक्टेब्ल होने के बावजूद तीनों लेखकों ने कहानी में ऐसे रहस्य डाले हैं कि उनके खुलने पर दर्शक एक बार तो चकित होता ही है। समस्या एग्ज़ीक्यूशन की है, बतौर निर्देशक सन्नी दयोल इतनी ज़्यादा सिनेमैटिक आज़ादी ले जाते हैं कि रियलिस्टिक होते हुए भी कहानी फिल्मी और स्तरीय लगने लगती है। न चाहते हुए भी घायल वन्स अगेन की तुलना घायल से करने से बचा नहीं जा सकता। 1990 में घायल सफल रही थी क्योंकि तब जो मसले प्रासंगिक लगते थे। और आज हाईटैक दौर का दर्शक उन्हें अलग नज़रिए से देखता-समझता है। साथ ही घायल में मनोरंजन का हर रस रोमांस, कॉमेडी, ट्रेजडी, एक्शन, ड्रामा मौजूद था। घायल वन्स अगेन में तकनीक से नई रंगत तो दी गई है बावजूद इसके कहानी में नयापन बिल्कुल नहीं है। बलात्कार के बाद पत्रकार युवती के परिवार का इज्ज़त की खातिर खुदकुशी कर लेना 21वीं सदी में किसी के गले नहीं उतरता। Action सीन्स में भी बहुत ज्यादा cinematic liberty ली गयी है जो हज़म नहीं होती.  बावजूद इन सब के घायल वन्स अगेन की कहानी में रफ्तार बनी रहती है और पलक झपकने का मौका नहीं मिलता।

इसका श्रेय डायरेक्टर सन्नी दयोल और हॉलीवुड एक्शन कोर्डिनेटर व फिल्म सैकेंड यूनिट डायरेक्टर डैन ब्रेडले को जाता है, जिन्होंने एक से बढ़कर एक एक्शन सीक्वेंस फिल्मायें है जो लगातार दर्शक को सीट के कोने पर चिपके रहने के लिए मजबूर करता है। अलावा इनके पटकथा बहुत सारे अनसुलझे सवाल भी छोड़ जाती हैं जैसे सोहा अली ख़ान अगर केवल सन्नी दयोल की डॉक्टर हैं तो वह हर पल यहां तक कि उसके घर में भी उसके साथ क्यों रहती है। अगर वह प्रेमिका / पत्नी है तो वह उसकी बीमारी या काम के सिवा कभी कोई और बात क्यों नहीं करते। पहले हिस्से के अतीत के एक किरदार के बारे में एक बुज़ुर्ग द्वारा सन्नी दयोल को नहीं बताया जाता, लेकिन सोहा अली ख़ान को भी क्या उस किरदार के बारे मे कुछ पता नहीं होता जबकि पूरे इलाज के दौरान सन्नी दयोल उसका नाम चिल्लाता रहता है। यहां तक कि उसके मानसिक रोग में उस किरदार की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन उसकी मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टर इलाज के दौरान उस किरदार को पूरी तरह नज़रअंदाज़ क्यों कर देती है। जब एक मोड़ पर आकर वर्तमान में उस अतीत के किरदार की कड़ी सन्नी दयोल से जुड़ती है तब भी सोहा अली ख़ान कोई प्रतिक्रिया नहीं देती। अगर सन्नी की जि़ंदगी में आने वाले उतार चढ़ाव से सोहा को कोई फर्क पड़ता ही नही तो वह हर जगह क्या सिर्फ उसे उसकी दवा याद करवाने के लिए साथ रहती हैं? सन्नी दयोल की एंट्री वाला दृश्य उनकी अब तक की सबसे भद्दी एंट्री के तौर पर याद किया जाएगा।

एक्टिंग के मामले में सन्नी दयोल अपने चिर-परिचित अंदाज़ में ख़ूब जमे हैं। उन्होंने अपने घायल, जीत, जिद्दी और सलाखें सरीखे किरदारों को एक बार फिर से जीवंत करने की कोशिश की है, लेकिन अफसोस कि दर्शक अब केवल ढाई किलो के हाथ से बहुत आगे निकल चुका है. पहले कह चुके हैं सोहा अली ख़ान के पास करने के लिए कुछ था ही नहीं। चारो युवा लड़के-लड़कियों ने अपने किरदारों को अच्छे से जिया है, बावजूद इसके के उन्हें भी केवल एक प्रापर्टी के तौर पर ही प्रयोग किया गया। टिस्का चोपड़ा ने पुत्र और पति प्रेम में झूलती महिला के हाव-भाव को पर्दे पर उतराने की भरकस कोशिश की है, लेकिन उन्हें भी ज़्यादा मौका नहीं मिला है। नादिरा बब्बर के हिस्से भी केवल एक दृश्य आया है जिसे वह पूरी ईमानदारी से निभा गई हैं। पूरी फिल्म में हमेशा की तरह सन्नी दयोल वन मैन आर्मी की तरह छाए रहते हैं। चालाक बिजनैसमैन, बिगड़ैल बेटे के बाप और डोमिनेटिंग पति और बेटे के अलग-अलग शेड्स वाले किरदार के रूप में नरेंद्र झा अपनी छाप छोड़ते हैं। डरपोक, कमीने और चापलूस नेता के किरदार को मनोज जोशी भी बखूबी निभा गए हैं। लेकिन दोनों मिल कर भी अमरीश पूरी के बलवंत राय की कमी पूरी नहीं कर सकते।

संगीत के मामले में भी घायल वन्स अगेन दर्शकों को निराश ही करता है और कहा जा सकता है कि खुश भी करता है क्योंकि फिल्म में गानो के लिए कोई जगह थी ही नहीं। सन्नी ने गाने ना रख कर खाहमखाह फिल्म की लंबाई बढ़ने से बचा लिया है। विपिन मिश्रा का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के रोमांच को बनाए रखता है। 

दमदार एक्शन, सन्नी दयोल के दमदार किरदार, सन्नी दयोल स्टाईल स्टिरियोटाइप मसाला मनोरंजन और सामाजिक मसलों के गिर्द बुनी गई कहानी के लिए फिल्म को ढाई स्टार तो दिए ही जा सकते हैं। अगर आप सन्नी दयोल के डाई हार्ड फैन हैं तो आप फिल्म देख सकते हैं बस याद रखिएगा ये फ़िल्म डाई हार्ड नहीं है!

-दीप जगदीप सिंह

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   Deep Jagdeep Singh

दीप जगदीप सिंह स्‍वतंत्र पत्रकार, पटकथा लेखक व गीतकार हैं.

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