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सनम तेरी कसम
प्रेम कहानी


राधिका राव, विनय
लेखक - निर्देशक


























Movie Review
सनम तेरी कसम:नयी प्रेम कहानी की भटकती पटकथा


                                    

                                     आधुनिकता और परंपरा के बीच जूझती एक प्रेम कहानी

निर्देशक : राधिका राव, विनय सप्रू

सितारे : हर्षवर्धन राणे, मावरा हॉकेन, मनीष चौधरी, दिव्येता 

निर्माता : दीपक मुकुट, सुनील ए. लुल्ला

संगीत : हिमेश रेशमिया

गीत : समीर, हिमेश रेशमिया, शब्बीर अहमद, सुब्रत सिन्हा

 

परंपरा, संस्कार और मर्यादा के बंधन से बंधी रहने वाली एक सहमी-सी लड़की... पढ़ी-लिखी और अच्छी नौकरी करने के बावजूद यह लड़की बंद गले का कॉटन सूट पहनती है... बिखरे बाल और आँखों पर मोटे फ्रेम का चस्मा...बस यही पहचान है सरस्वती उर्फ सरू पार्थसारथी (मावरा हॉकेन) की। सरू पापा की गुड गर्ल है पर फ्रेंड्स के लिए बहन जी। उसकी अपनी दुनिया है, अलग दायरा है... सरू को अपनी दुनिया कभी गलत नहीं लगती। फिर अचानक यह गुड गर्ल इतनी बुरी बन जाती है कि सरू के पिता (मनीष चौधरी) जीते जी अपनी बेटी का पिंडदान कर देते हैं... आखिर क्यों ...? फिल्म की कहानी इस “क्यों ” के जवाब तलाशने से शुरू होती है। वास्तव में राधिका राव, विनय सप्रू की फिल्म सनम तेरी कसम बाप-बेटी, बाप-बेटा,बहनें के बीच प्रेम, भावना, समर्पण और दुविधाओं का ताना-बना है। फिल्म दो पीढ़ियों के मूल्यों और संस्कारों के अंतर का फिल्मांकन करती है।

          सरू पर एक तरफ से उसके पिता के ब्राह्मणवादी विचारों का दबाव है तो दूसरी तरफ छोटी बहन की शादी में रोड़ा बनने का आरोप। इन दोनों दबावों से जूझती सरू की मुलाक़ात इंदर (हर्षवर्धन राणे) से होती है। उसी सोसाइटी में रहने वाले इंदर दिन-रात शराब पीता है और लड़कियां उसके घर आती-जाती हैं। सीधी-साधी सरू जब इंदर से मिलती है तो सोसाइटी में बवाल हो जाता है। बात इतनी बढ़ जाती है कि जयराम को अपनी बेटी को घर से निकालना पड़ जाता है। बस यही से शुरुआत होती है एक प्रेम कहानी है की। यह कहानी आगे बढ़ती है और अपने अंदर छुपे हुए कई राज खोलती है। इस प्रेम कहानी में प्यार के लिए तड़प, क़ुर्बानी, कशिश और जज्बात है। फिल्म के कुछ दृश्य वाकई जज्बाती बना देते हैं। पर यह जज़्बात परवान नहीं चढ़ता। जैसे-जैसे फिल्म खत्म होती है मोहब्बत का नशा कफूर होने लगता है। अच्छे लोकेशन, सुरीले संगीत और आभिनय के बावजूद फिल्म कमज़ोर पड़ गई। कहानी में नयापन होने के बावजूद फिल्म की पटकथा बहुत ही भटकी हुई है। निर्देशक कई ट्विस्ट एंड टर्न्स के सहारे दर्शकों को बांधने की कोशिश भी करते हैं। यही वजह है कि फिल्म का पहला हिस्सा ठीक-ठाक तरीके से गुजरता है मगर दूसरा भाग बहुत ही कमजोर पड़ जाता है। इमोशन दिखाने के चक्कर में निर्देशक ने ढेर सारा कंफ्यूजन भर दिया है। ढेर सारे ड्रामे भर गए और कई लंबे और गैरज़रूरी सीन डाल दिए हैं जिसकी वजह से फिल्म ज़रूरत से ज़्यादा लंबी और थोड़ी बोरिंग लगने लगती है।

 इस फिल्म के दो अलग-अलग पहलू हैं, जिन्हें लेकर निर्देशक जोड़ी राधिका-विनय ने एक दर्दभरी प्रेम कहानी को स्क्रीन पेश किया है। पहला पक्ष दर्शाता है कि एक लड़की की केवल अपनी सादगी वाली लुक की वजह से शादी नहीं हो पा रही है। शादी-ब्याह के रिश्तों को आईटी और आईआईएम के चश्मे से देखने वाला समाज आज भी घोर रूढ़ीवादी है। दूसरा पक्ष ये कि कोई परिजन अपने बच्चों को लेकर इतने कठोर कैसे हो सकते हैं। इतनी कठोरता आखिर किस कीमत पर। यह दुविधा फिल्मी के अंतिम दृश्यों में बढ़ जाती है। यों लगता है कि निर्देशक अंत सोच ही नहीं पा रहे हैं। थोड़ा यह और थोड़ा वह दिखाने के चक्कार में फिल्मो का मर्म भी खत्म हो जाता है।

 फिल्म की लीड जोड़ी हर्षवर्द्धन राणे और मावरा होकेन की यह लांचिंग फिल्म है। पूरी कोशिश है कि दोनों को परफारमेंस और अपनी खूबियां दिखाने के मौके मिलें। लेखक-निर्देशक ने इस जरूरत को ध्यान में रखते हुए दोनों को खूब मौका दिया है । दोनों कलाकारों ने भी इस मौके को भुनाया है और अच्छी अभिनय करने की पूरी कोशिश की है लेकिन फिल्म असरदार नहीं रह जाती। इंदर का किरदार आक्रोश से भरा है। वह कम बोलता है... धीरे बोलता है। ऐसा लगता है कि उसमें बरसों से कुछ ऊबल रहा है। लेकिन ये ऊबाल अंत में भी शांत नहीं होता। ये इस किरदार के साथ नाइंसाफी-सा लगता है। हर्षवर्धन के लिहाज से यह किरदार उन पर भारी लगता है। इसके लिए कोई मंझा अभिनेता होता तो बेहतर रहता। मावरा, सुदंर हैं। वह पाकिस्तान की एक उभरती नायिका हैं। उनके अनगिनत चाहने वाले हैं। वह अभिनय तो ठीक-ठीक ही करती हैं, लेकिन उनकी आवाज उनका साथ नहीं देती। उनकी भरभराई-सी रहने वाली आवाज पल पल में फरहान अख्तर की याद दिलाती है।  फिल्म का गीत-संगीत अच्छा है। तू खींच मेरी फोटो... सरीखे गीत माहौल में थिरकन पैदा करने वाले हैं। कई अन्य गीत भी पार्श्व में या फिर सीन्स के साथ मैच करते हैं। पर ये सब एक लव स्टोरी के लिए नाकाफी-सा लगता है।  

 



   रुद्रभानु

रूद्र भानु दैनिक भास्कर सहित कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और चैनलों में पत्रकारिता करने के बाद आजकल मुंबई में फिल्म लेखन और निर्देशन में सक्रिय हैं। .

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