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मिलाप झवेरी
लेखक - निर्देशक


मुश्ताक शेख
लेखक


मस्तिज़ादे
सस्ती मस्ती


























Movie Review
मस्तिज़ादे:मस्ती कम - बोरियत ज्यादे


मस्तीजादे:
मस्ती-कम;बोरियत-ज्यादे

लेखक-निर्देशकः मिलाप जवेरी

स्टार- सनी लियोन, तुषार कपूर, वीर दास, सनी लियॉन

पिछले कुछ सालों में हिन्दी हास्य सिनेमा के मिजाज और स्वरूप में कई बदलाव हुए हैं। सेक्स कॉमेडी भी इस बदलाव का एक नया रूप बन कर सामने आई है। जब सेक्स कॉमेडी का यह सिलसिला शुरू हुआ तो कुछ फिल्मों को सफलता मिली और देखते ही देखते यह बॉलीवुड का नया जोनर बन गया। इस जोनर के के साथ एक नए किस्म के लेखन और लेखकों का भी विकास हुआ। इन लेखकों में सबसे ऊपर हैं मिलाप जवेरी। सेक्स कॉमेडी के दौर को पहचान दिलाने में एक लेखक के रूप में मिलाप ने बड़ी मेहनत की। एक फिल्म राइटर के तौर पर मिलाप ने मस्ती’, ‘हे बेबी’, ‘ग्रैंड मस्ती और हाल ही में रिलीज 'क्या कूल हैं हम 3' जैसी फिल्में लिखी हैं। 'मस्तीजादे' के साथ पहली बार उन्होंने निर्देशन में हाथ आजमाया है। लेकिन पिछले हफ्ते उनकी लिखी सेक्स कॉमेडी क्या कूल हैं हम-3 को दर्शकों ने जैसे नकार था, ठीक वही हाल मस्तीजादे का भी है।

दरअसल बॉलीवुड की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि यहां लेखक और निर्देशक यह समझने को तैयार ही नहीं है कि सेक्स कॉमेडी का मतलब सिर्फ सेक्स नहीं होता है। मिलाप झवेरी भी शायद इस बात को समझने में नाकाम रहे हैं। यही वजह है कि मिलाप एडल्ट कॉमेडी फिल्मों के पर्याय बन चुके हैं। पिछले हफ्ते रिलीज हुई फिल्म क्या कुल हैं हम 3 फिल्म में भी मिलाप झवेरी का रंग था और इस फिल्म में भी। नयापन के नाम पर फिल्म में कुछ भी नहीं है। दो घंटे लंबी इस फिल्म को देखकर यही कहा जा सकता है कि इस कथित कॉमेडी फिल्म में शायद ही आपको हंसने का मौका मिले। फिल्म में बताई गई कथित मस्तीइतनी सस्ती‍ है कि दर्शकों के हाथ में सिर्फ निराशा लगती है।

लेखक ने अपनी रचनात्मकता का पूरा उपयोग को केले को लेकर अश्लीलल लाइंस और दृश्य‍ लिखने में किया है। फिल्म के कलाकार लेना और देना’, ‘लूंगी और दूंगी’, ‘खड़ा है और बैठा है, जैसे संवादों का इस्तेमाल कर अपने किरदार को निभाने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा, शरीर के खास अंग से सिक्के का उछलना और एक न बताई जा सकने वाली जगह पर उसका जाकर चिपकना इस फिल्म का अहम हिस्सा है। अपने नाम के अनुरूप मस्तीजादे कोई मस्ती नहीं देती। कारण यह कि सेक्स कॉमेडी लिखते और बनाते वक्त मिलाप के जेहन में सिर्फ सेक्स रह गया और कॉमेडी वह भूल गए। इस फिल्म का सबसे कमजोर पक्ष इसकी कहानी है। या यूं कहें तो फिल्म में सिवाय कहानी के सब है। फिल्म में किरदार आते हैं, जाते हैं, जोक्स चलते रहते हैं और कहीं भी फिल्म में कन्टीन्युटी का एहसास नहीं होता। पूरी फिल्म को सिर्फ ढेर सारे जोक्स में समेट दिया गया है जो कहीं-कहीं गुदगुदाते हैं तो कहीं ऊपर से गुजर जाते हैं। कभी-कभी फिल्म के संवाद ह्वाट्स ऐप के घिसे-पिटे लतीफ भी बन जाते हैं।

         मिलाप ने फिल्म के हर दृश्यि में सनी लियोन का बखूबी इस्तेमाल किया है। ज्यादा से ज्यादा दर्शकों को खींचने के लिए सनी को डबल रोल में पेश किया है। फिल्म में कहानी के नाम पर अधकचरे सीन हैं। कहानी दो दोस्तों सनी केले (तुषार कपूर) और आदित्य चोटिया (वीर दास) की है, जो एक एड एजेंसी में काम करते हैं। दोनों सदा ही काम-वासना से भरे रहते हैं और आंखों से सामने आती लड़कियों का एक्स-रे कर लेते हैं। इन दोनों को किन्हीं कारणों से कंपनी से बाहर निकाल दिया जाता है फिर सनी और आदित्य खुद की एड एजेंसी खोलते हैं। कहानी आगे बढ़ती है और एक दिन अचानक उन्हें दो जुड़वां बहनें (सनी लियोनी) मिलती हैं, जिन पर उनकी यह शक्ति काम नहीं करती। युवकों को विश्वास हो जाता है कि यही वे लड़कियां हैं, जो विवाह करने के योग्य हैं। ये लड़कियां सेक्स एडिक्शन का शिकार युवकों की थैरेपी करती हैं। लेकिन खुद इसी समस्या का शिकार हैं। फिर कई सारी कन्फ्यूजन होने लगता है और आखिरकार फिल्म को अंजाम मिलता है। फिल्म के गाने अच्छे हैं लेकिन फिल्मांकन के दौरान कुछ गीतों को कम किया जा सकता था। इन गीतों की वजह से फिल्म की रफ्तार धीमी लगती है।

पूरे फिल्म में सिर्फ सनी लियोन और सिर्फ सनी लियोन ही है। वह जो भी पहनती हैं या नहीं पहनती हैं उनमें कमाल लगती हैं। सनी फिल्म में जान डालती नजर आती हैं और एक्टिंग को छोड़कर जो भी उनके हाथ में है उसकी कोशिश करती हैं। हालांकि कहीं-कहीं उनकी डायलॉग डिलीवरी जरूर तंग करती है। वहीं वीर दास ने तुषार के साथ मिलकर करेक्ट कॉमिक टाइमिंग दिखाई तो है लेकिन वो कमजोर स्क्रिप्ट की वजह से निखर कर सामने नहीं आ पाती। इन तीनों किरदारों के अलावा देशप्रेमी सिंह (शाद रंधावा), असरानी और सुरेश मेनन का भी अहम रोल है।

 फिल्म के दृश्य में वीर दास और तुषार अपने शरीर के एक खास अंग से सिक्का उछालते हैं....निश्चित रूप से निर्देशक इस कोशिश के जरिये दर्शकों को हंसाना चाहते होंगे पर दर्शकों के लिए यह दृश्य अश्लीलता का पर्याय बन जाती है। अपनी रचनात्मकता और सूझबूझ से मिलाप सेक्स कॉमेडी को बगैर अश्लीलता के भी परोस सकते थे और दर्शकों को फूल टू मस्ती का तोहफा दे सकते थे। मगर मिलाप के इस मस्तीजादे में मस्ती कम और बोरियत ज्यादा है।

 



   रूद्र भानु प्रताप

रूद्र भानु दैनिक भास्कर में कुछ साल पत्रकार और समीक्षक रह चुके हैं और आजकल मुंबई के प्रिंट media में सक्रीय हैं .

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