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सुधा कोंगरा
लेखक - निर्देशक


साला खडूस
ढ़ीली पटकथा


























Movie Review
साला खडूस:Knock-Out Punch नहीं


साला खडूस
खेल में छुपी प्रेम भावना

लगान की सफलता के बाद एक अच्छी बात हुई कि खेल की थीम से जुडी फ़िल्में भी पहले से बेहतर संख्या में बनाने लगी हैं. अगर फ़िल्में कहीं समाज पर असर करती हो तो ये एक अच्छा चलन है कि खेल में पिछड़े हमारे देश में भी खेल की लोकप्रियता बढ़ेगी.

हालाँकि फ़िल्म की कहानी के लिए एक ठोस भावना की ज़रूरत भी होती है जो कभी हक (लगान), कभी बदला (बॉक्सर, जो जीता..), आत्मसम्मान (चक दे..) कुछ भी हो सकती है. इस शुक्रवार को रिलीज हुई साला खडूस में निर्देशिका सुधा कोगरा ने प्रेम को खेल की चाशनी में डुबो के परोसा है। 

एक खिलाड़ी का अपने गुस्से और दूसरों के षडयंत्रों के चलते करियर स्वाहा होना। लेकिन अपनी असफलताओं का रोना रोने की बजाय गुस्से को पीकर एक आम लड़की में अपनी सफलता खोजना एक साधारण कहानी है। लेकिन सुधा कोंगरा इसे अपने अनुभवों से देखने लायक बना देती हैं। मणिरत्नम का सहायिका रही सुधा अपने गुरु मणिरत्नम की तरह प्रेम को बड़े गहरे अंदाज में प्रस्तुत करती है ।

कहानी के मुताबिक आदि (आर माधवन) एक बॉक्सर है जो अपने मित्र देव (जाकिर हुसैन) से ज्यादा ऊर्जा से भरा बॉक्सर था, पर उसे वो मुकाम नहीं मिल पाया जिसका वो हकदार था। वो लगातार मीडिया के सामने अपनी भड़ास निकालता रहता है । और इसका खामियाजा भुगतने के लिए उसे कोच बनाकर चेन्नई भेज दिया जाता है। जहां पर बॉक्सिंग का कोई ज्यादा स्कोप नहीं। ऐसे में आदि चेन्नई की ही बॉक्सर लक्ष्मी (मुमताज सरकार ) की छोटी बहन मधी (रितिका सिंह) से मिलता है। जो एक बॉक्सिंग मैच के दौरान अपनी बहिन के साथ हुए अन्याय के खिलाफ पंच मारती नजर आती है। चूँकि खुद आदि भी अपने साथ हुए अन्याय  के खिलाफ अंजाम की परवाह किए बिना लड़ता आया है। इसलिए वो उस गुस्सेबाज नवयौवना में अपना अतीत देखता है। और उसे बॉक्सिंग कोचिंग देना शुरू करता है। नायिका मधी पहले तो आदि के इस स्टेप को खेल भावना की बजाय, उसकी कामुक भावना समझती है।  किंतु आगे के दृश्यों में आदि के त्याग को देखकर वो उसे प्यार करने लग जाती है। 

लेकिन यहां पर वह अपनी बड़ी बहिन की ईर्ष्या का शिकार होती है। और अपने हाथ को चोटिल करा बैठती है । वह रिंग में जाती है तो हार जाती है। मधी के हारने और चुप रहने के कारण गुरू-शिष्य के बीच गलतफहमी पैदा होती है। 

कुछ परिस्थितियों में फंसकर नायक-नायिका दौनों एक बार फिर मिलते हैं ।  थोड़े समय में ही जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों से वाकिफ होने के बाद मधी का अपने गुरु के प्रति प्रेम अब अलौकिक हो चुका है और इसे अब वो अपनी कमजोरी के बजाय खेल में ताकत के रूप में प्रदर्शित करती हुई अंत में बॉक्सिंग चैंपियन बनती है।  एक नजर में फिल्म की कहानी सतही लगती है लेकिन सुधा कोंगरा के निर्देशकीय अनुभव उसे जबर्दस्त रंग देते हैं लेकिन काश पटकथा पर भी इतना अच्छा काम हो पाता।

मसलन दिल्ली से अपने दोस्त पर निगाह रख रहा देव आदि को वापिस दिल्ली बुलाना चाहता है लेकिन फिल्म में चोटिल नायिका के हारने पर सिर्फ एक लाइन में ही देव कहता है कि मैं तो दिल्ली जा सकता था पर गया नही। जबकि फिल्म की पटकथा में इस सीन की गुंजाइश थी कि वो दिल्ली वापिस लौटने के मौके को ठोकर मारता। 

हां सुधा कोंगरा ने नारी मन को बड़ी बहिन की ईर्ष्या के माध्यम से अच्छा चित्रित किया है लेकिन इस बड़ी बहिन के छोटी बहिन के चोटिल होकर ही ये कहानी दूसरा रूख भी ले लेती है। इसे लेकर ही पूरी कहानी आगे कही जा सकती थी। बड़ी बहिन की ईर्ष्या हॉल में बैठे दर्शक पर असर छोड़ती है।

इंटरवल के बाद आदि का अचानक स्क्रीन से गायब हो जाना भी दर्शकों को अखरता है। अगर वो अपनी शिष्या के टैलेंट के प्रति आसक्त है तो उसकी खोज खबर क्यों नहीं लेता।

 बेशक फिल्म का अंत कसावट लिए हुए है। जिंदगी भर खुद से कमतर दोस्त का मजाक बनाता रहा आदि अपनी शिष्या के करियर के लिए उससे हार स्वीकार कर लेता है। इधर नायिका भले ही अपने खेल में मजबूत है लेकिन उसे प्रेम के सहारे की जरूरत है। अंत में नायिका का अपने से जबर बॉक्सर से, गुरु की बतकही के दौरान निकले अल्फाजों को ही, गुरूज्ञान बनाकर अपनी जीत सुनिंश्चित करना दर्शकों को लुभाता है। 

 फिल्म के गीतों में स्वानंद किरकिरे ने कई नये अच्छे बोलचाल की भाषा के शब्दों खुन्नस और घोटाला को उकेरा है। फिल्म की पटकथा को और कसा जा सकता था। सिनेमा में भले ही कहानी सतही हो तो भी फिल्म की पटकथा उसे अलहदा रंग दे सकती है।

हां, फिल्म के संवाद कई जगह प्रभावित करते हैं। खासकर कम उम्र वाली नायिका को नायक से आई लव यू बोलने पर, नायक का अपनी उम्र की तुलना नायिका के पिता से करना और नायिका का पलट जवाब कि बहुत से लोग मेरे बाप की उम्र के हैं लेकिन मैंने उनसे तो आई लव यू नहीं बोला। ये संवाद हॉल में प्रेम पगी हंसी की लहर उत्पन्न कर देता है। 

माधवन ने अपने रोल के लिए काफी मेहनत की है और इसका क्रेडिट उन्हें ट्रेलर रिलीज होने के साथ से ही मिल रहा है। मुंबई के कल्याण इलाके की रहने वाली रीअल बॉक्सर रितिका सिंह ने कमाल अभिनय किया है। ऐसा नहीं लगता कि यह उनकी पहली फिल्म है। राजकुमार हीरानी फिल्मस का प्रोडक्ट होने से फिल्म में इमोशन खूब भरे हुए हैं।

 फिल्म देखने वाले दर्शकों से इतना ही कहना चाहूंगा कि इस फिल्म को सिर्फ खेल भावना से देखो तो शायद आपको ये इतनी अच्छी ना लगे।  खेल के समर्पण और जुनून में छुपी, प्रेम भावना को देख पाएंगे तो शायद आपके लिए सुखद अनुभव साबित हो।

                        धर्मेंद्र उपाध्याय 



   Dharmendra Upadhyay

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। .

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