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मिलाप झवेरी
कथा - संवाद


मुश्ताक शेख
कथा - संवाद


उमेश घाडगे
निर्देशक


























Movie Review
Kya Kool Hai Hum 3:Kya Fool Hai Hum?


                   

फूहड़ संवादों का शामियाना
क्या कूल हैं हम 3

फिल्म को सेंसर बोर्ड किसी भी सर्टिफिकेट से नवाजे पर लेकिन एक अच्छी कथा -पटकथा की जरूरत तो हर फिल्म को ही होती है। लेकिन इन दिनों देखने में आ रहा है कि एडल्ट् कॉमेडी के नाम से बनने वाली फिल्मों से कथा-पटकथा तो बिल्कुल गायब होती है, बस उसकी जगह फूहड़ संवादों को सितारा बनाकर प्रस्तुत किया जाता हैं। कुछ ऐसी ही भावना मन में उठने लगती है। जब इस शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म क्या कूल हैं हम-3 देखते हैं।

बालाजी मोशन पिक्चर्स की फिल्म क्या कूल है हम-3 की स्टोरी की लकीर पर चलने वाले दो किरदार हैं, जिनसे बहुत सारे किरदार टकराते हैं और फिर फूहड़ संवादों के जरिए हंसाने का सिलसिला शुरू होता है। एक-दो बार हंसी आती है। लेकिन ज्यादा बार आपको बोरियत महसूस होती है। क्योंकि केला, लेती हूं, देती हूं, पोपट जैसे संवादों का दोहन लेखक मिलाप जावेरी अपनी कई फिल्मों में पहले भी कर चुके हैं। ।

स्टोरी लाइन के मुताबिक कन्हैया(तुषार कपूर) और रॉकी (आफताब शिबदासानी) दो दोस्त हैं जिन्हें निर्देशक उमेश घाटगे लंगोटिया मित्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं। रॉकी जहां प्ले बॉय है,  वहीं कन्हैया लड़कियों से दूर रहता है और अपने लिए एक परफेक्ट जीवन संगिनी की चाहत दिल में बनाए हुई है, पर अपने फैशन डिजाइनंग के व्यवसाय में अच्छा कुछ ना कर पाने की वजह से उसे पिता की फटकार सुननी पड़ती हैं।

ऐसे में अचानक उन दौनों को एक दिन अपने पुराने दोस्त मिकी (कृष्णा अभिषेक) का बैंकॉक आने का आमंत्रण मिलता है। दोनों दोस्त व्यवसाय में कुछ नया करने के लिए बैंकॉक चले जाते हैं।  यहां पर उनके दोस्त मिकी का व्यवसाय है पॉर्न फिल्म बनाने का, जिनका प्रस्तुतिकरण हिंदी फिल्मों के सींस और किरदारों की  थीम पर होता है। उनका करीबी मित्र मिकी उन दोनों की काम दक्षता से वाकिफ है, इसलिए उन्हें अपनी पॉर्न फिल्मों में हीरो बनाकर पेश करना चाहता हैं। वे दोनों भी इस काम में लग जाते हैं।

  इन्हीं हालातों में कन्हैया को अपनी स्वप्न सुंदरी शालू (मंदना करीमी) मिल जाती हैं। उन दोनों में थोड़ी गलतफहमियों के बाद प्यार होता है तो कन्हैया उससे शादी करना चाहता है। मुसीबत यहां आती है, जब नायिका के पिता सूर्या करजात्या (दर्शन जरीवाला) कन्हैया की फैमिली से मिलना चाहते हैं। ऐसे में सभी पॉर्न फिल्मों के कलाकार कन्हैया के पारिवारिक सदस्यों का अभिनय करते हैं। और इसी गफलत में घिसी पिटी सी स्टोरी लाइन, आगे बड़ते हुए फिल्मी फार्मूला स्टाइल में खत्म होती है।

फूहड़ और द्विअर्थी संवादों पर बिना सोचे समझ ठहाके मारने वाले दर्शकों को छोड़ दें तो थोड़ा भी समझदार दर्शक सोचने पर विवश हो जाता है कि फैशन डिजाइनिंग से जुड़े खानदानी परिवार का एक लडक़ा कन्हैया आखिर अपने मित्र के बुलावे पर बैंकॉक में पॉर्न फिल्मों का नायक क्यों बन जाता है। जबकि लेखक-निर्देशक फिल्म के नायक कन्हैया के शुरुआती चरित्र चित्रण में उसे ना केवल खानदानी रईस बल्कि चरित्रवान लडक़ा भी दिखाते हैं।

 लेखक मिलाप जावेरी और मुस्ताक शेख ने हिंदी के फिल्मों के संवाद और सींस के पॉर्न अंदाज को ठीक पकड़ा है, क्योंकि इस तरह की एडल्ट फिल्मों का मार्केट है।  लेकिन वे इस पृष्ठभूमिको पटकथा में एडल्ट् कॉमेडी के लिहाज से भी निभा नहीं पाते हैं।  वे अपने अधिकतर सींस में बॉलीवुड की तमाम फिल्म हस्तियों का भद्दा मजाक बनाते हुए ही दिखते हैं।

जब कहानी और किरदार ही सही ढंग से नहीं लिखे गए हों तो ऐसे में फिल्म के गीत संगीत से भी ज्यादा आशा नहीं की जा सकती हैं। यहां पर भी कुछ ऐसा ही है। साजिद वाजिद के संगीत से सजे गीत बेअसर हैं। छायांकन के नाम पर सिर्फ समुद्र के बीच और बिकनी ही कैमरे के पॉइंट पर दिखती हैं। इसके अलावा एक बड़े महलनुमा घर का सेट जहां पर फिल्म का अधिकांश हिस्सा शूट कर लिया गया है। 

अगर फिल्म में कहीं थोड़ी बहुत स्वाभाविक हंसी आती है तो वो क्लाउडिया के बहिन बनने के रिहर्सल और मेघना नायडू के पर्दे पर आते ही ‘कलियों का चमन जब खिलता है’ गाने से। इसके अलावा फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं हैं जिसे थोड़े दिन भी याद रखा जा सके। ।

फिल्म के क्लाइमेक्स में मेहमान भूमिका में दिखे रितेश देशमुख एक संवाद के जरिए फिल्म के चौथे पार्ट की भी भूमिका बनाते हैं, पर इतने घिसे पिटे कंटेट के साथ क्या कूल हैं हम-3 की सफलता उम्मीद कम ही दिख रही है।    

अगर आप फैमिली दर्शक हैं तो फिल्म देखने भले ही ना जाएं। लेकिन इससे उलट आप नमकीन जोक पसंद करते हैं,  इस तरह का मसाला अपने पास और जुटाना चाहते हैं तो आप फिल्म देखना जा सकते हैं।

                  धर्मेंद्र उपाध्याय

 



   धर्मेंद्र उपाध्या

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। .

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