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बिजॉय नाम्बियार
निर्देशक


अभिजात जोशी
पटकथा


अभिजीत देशपांडे
संवाद


























Movie Review
वज़ीर:शतरंज की बिसात संग रिश्तों का रसायन


 
भारत में शतरंज के खेल को सिर्फ खेल ही नहीं आपसी प्रतिद्वदिंता,  जीवन संग्राम के लिहाज से भी देखा जाता है। जब भी मानव जीवन में हम सजग रहकर अपने लक्ष्य पर ध्यान रखना चाहते हैं तो हमारे मानस पटल पर एक शतरंज की बिसात जमी होती है। शतरंज की इसी खेल भावना को मानवीय रिश्तों के धागे से बुनकर विधु विनोद चौपड़ा ने लेखक अभिजात जोशी के साथ अपनी कहानी को विस्तार दिया है।

अमिताभ की आवाज में प्रस्तुत, खेल खेल में, खेल खेलके, खेल-खेल ये आ जाएगा संवाद को ध्यान में रख, अगर फिल्म वजीर को देखा जाए तो इस संवाद में ही फिल्म का सारा सच नजर जाता हैं।  चाहे फिल्म अपने नाम से दर्शकों को कुछ अलग अहसास कराती हो पर कहानी में एक्शन और संस्पेंस के साथ  अनजाने रिश्तों के रसायन को अनुभूति की तीव्रता के साथ प्रस्तुत किया है। 

खेल के लिहाज से ही इसे प्रकट किया जाए तो फिल्म में दिखाया गया है कि एक छोटा सा प्यादा भी वजीर को आगे रखकर बादशाह को मात दे सकता है। लेकिन किरदारों के लिहाज और उनके आपसी रिश्तों के नजरिए से फिल्म को देखा जाए तो यह फिल्म एक बाप के अपनी मासूम बेटी से बिछडऩे, एक पत्नी की अपनी पति से नाराजी और एक पिता का अपनी बेटी के हत्यारे को खत्म करने के लिए खुद को फना करने की कहानी है।

एक अजनबी बूढ़े काश्मीरी पंडित ओकांरनाथ धर का यूं एक पुलिस अफसर दानिश से इतना जल्द घुल मिल कर इतना अपनापन देना कि वह उसके मन में घुट रहे सच को अपनी ताकत और हिममत से इंसाफ दिला सके। फिल्म की यह बात दिखाती है कि जरूरी नहीं कि खून के रिश्ते ही हमारे लिए कुछ असंभव कर सकते हैं, अगर रिश्तों में सच्चाई प्रेम और अपनापन हो तो अजनबी भी हमारे लिए जान की बाजी लगा सकते हैं।     

कश्मीरी पंडित ओंकारनाथ धर के किरदार में अमिताभ बच्चन एक बार फिर दर्शकों पर अपने अभिनय की छाप छोड़ते नजर आते हैं। वजीर को देखते समय उनके अभिनय की विविधता से मानो साक्षात होता है, मसलन  जब वे वैलफेयर मिनिस्टर पर जूता फेकते हैं तो एँग्रीयंगमैन की छवि को अपने आप में फिर से जिंदा कर देते हैं लेकिन जब वे पति पत्नी के रिश्तों के तनाव को खत्म करने की कोशिश करते हैं तो वे बुजुर्गीयत को पूरी तरह से जीते नजर आते हैं। 

वजीर फिल्म के निर्देशक विजय नॉंबियार इससे पहले अनुराग कश्यप के लिए शैतान और नील नितिन मुकेश के साथ डेविड बना चुके हैं। उनके रिश्तों के ध्यान रखते हुए फिल्म में दर्शकों के लिए थोड़ा सस्पेंस पैदा करने के लिए वे वजीर के छोटे से रोल में आते हैं पर बाद में उनके किरदार का लोप हो जाना थोड़ा तो अखरता है। इस किरदार को दिखाए बिना भी निर्देशक विजय अपनी कथ्य को कह सकते थे।  उन्हें अमिताभ और फरहान जैसे दो सितारा कलाकार मिले हैं लेकिन फिर भी अपने कथ्य को कहने में वे भाषा से ज्यादा तकनीक का सहारा लेते हैं। अमिताभ चूँकि एक वरिष्ठ कलाकार हैं और युवा निर्देशकों के साथ उनकी भाषायी नासमझमी को भी अपनी करिशमाई सोच और अंदाज से बेहतर बना देते हैं , लेकिन फरहान भाषा के मामले में चूकते हैं।  फिल्म के प्रारंभिक दृष्यों में उनकी जुबान से निकला पंडितजी शब्द अटका हुआ सा प्रतीत होता है।

फिल्म में याजिद कुरैशी के किरदार में अभिनेता मानव कौल को यूं तो कोई बड़ा स्पेस नहीं मिला है, फिर भी वो अपने निंश्चित समय में ही दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाने का पूरा प्रयास करते हैं। सिटीलाइट्स के बाद लगातार मुखयधारा की फिल्मों में देखते हुए आम दर्शक भी उन्हें जानने लगे हैं। इन दिनों ना केवल उन्हें ठीकठाक भूमिकाएं मिल रही है बल्कि वे खुद को निरंतर बेहतर बनाते जा रहे हैं।

अदिति राव हैदरी के हिस्से में भले ही कुछ ज्यादा करने के लिए नहीं आया हो पर वजीर देखने आए दर्शक उनकी उपस्थिति को नजरअंदाज भी नहीं कर पाते हैं। 

गीत संगीत के लिहाज से फिल्म का एक गाना तेरे बिन सिनेमाघर से निकलने पर भी दर्शकों को याद रहता है। इस गीत की मैलोडियस धुन और संगीत संयोजन के साथ इसके बोल भी मन को छूते हैं। इसके साथ ही एक पुराने गीत आओ हुजूर तुमको बहारों में ले चलूं का किरदारनुमा प्रयोग भी अच्छा लगता है। 

तकनीकी टीम में रंगनाथ रवि का साउंड असर छोड़ता है, खासकर बारिश के दृश्यों में ध्वनि प्रभाव बेहद मौलिक लगता है । फिल्म के समुचित एक्शन में जावेद एजाज दर्शकों का ध्यान खींचते हैं। जब पंडित ओंकारनाथ धर को काश्मीर जाने से रोकने के लिए उनकी गाड़ी के पीछे बाइक से भाग रहा दानिश एक कार के गेट के अचानक खुल जाने से बाइक के साथ सडक़ पर कई पलटियां खा जाता है।

पारिवारिक दर्शकों के साथ एक्शन और सस्पेंस को प्रेम करने वाले दर्शक फिल्म को देखने बेहिचक जा सकते हैं। वजीर कोई बड़ी सिनेमाई कृति तो नहीं पर लेखक- निर्माता विधु विनोद चौपड़ा के अपने अंदाज की कहानी कहने और उनके अमिताभ प्रेम को दर्शाने वाली फिल्म के रूप में जरूर दर्ज होगी।

  



   धर्मेन्द्र उपाध्य

पिछले सात साल से पिंकसिटी जयपुर के पत्रकारिता जगत के साथ रंगमंच और राजस्थानी सिनेमा में सक्रिय रहे युवा पत्रकार धर्मेंद्र उपाध्याय बतौर फिल्म पत्रकार काम करते हुए कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन-निर्देशन कर चुके हैं। .

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