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बाजीराव मस्तानी
दास्तान-ए-प्रेम


संजय लीला भंसाली
कथा - निर्देशन


प्रकाश कपाडिया
पटकथा


























Movie Review
बाजीराव मस्तानी:दास्तान-ए-प्रेम


भंसाली ने ‘बाजीराव मस्तानी’ से मोहब्बत की है...

 

निर्देशक-संगीत : संजय लीला भंसाली 
निर्माता : किशोर लुल्ला, संजय लीला भंसाली
पटकथा : प्रकाश कपाडि़या, संजय लीला भंसाली, मल्लिका दत्त घारड़े 

 

बाजीराव ने मस्तानी से मोहब्बत की है, अय्याशी नहीं… यह संवाद फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली पर भी लागू होती है। संजय ने भी सिर्फ एक फिल्म नहीं बनाई, बल्कि सिनेमा के प्रति अपने बेइंतहा मोहब्बत को बहुत सलीके से पर्दे पर उतारा है। इस फिल्म के बारे में संजय ने एक साक्षात्कार में कहा था कि यह महज फिल्म नहीं है, यह एक तपस्या है। फिल्म के 158 मिनट जब आंखों के सामने से गुजरते हैं तब वाकई यह लगता है कि हम 18वीं सदी में चले गए है। महाराष्ट्रीय संस्कृति आकर्षक रंगों में पर्दे पर उभरने लगती है। बाजीराव मस्तानी का विशाल सेट, सजीव सिनेमेटोग्राफी, काव्यात्मकता संवाद और इतिहास के रंगों में रंगे किरदार इतने शानदार हैं कि आप विस्मित हुए बिना नहीं रह सकते। इसे देख कर लगता है कि भंसाली अपनी पिछली फिल्मों से काफी आगे निकल आए हैं। इतिहास, परंपरा और प्रेम को बिना किसी छेड़-छाड़ और बनावटीपन के एक कहानी में पिरोना और फिर उस पटकथा को कैमरे की खुबसूरत नजर देना....किसी करिश्मे में कम नहीं है। इतिहास के पन्नों से सैकड़ों साल पुरानी कहानी को प्रेम कहानी बनाने में भंसाली ने बड़ी ही बारीकी से काम किया है। फिल्म के सेट मसलन वाड़ा, महल,युद्ध के मैदान का निर्माण और फिल्मांकन प्रभावित करती है। पेशावकालिन वास्‍तुकला, युद्धकला, वेशभूषा, सामाजिक आचरण, व्‍यवहार, राजनीति और पारिवारिक मर्यादाओं को कहानी में बखूबी शामिल किया गया है। सबसे बड़ी बात इनके फिल्मांकन में वास्तविकता और भव्यता के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की कोशिश की गई है। यही वजह है कि इस भव्यता के बीच भी एक सादगी नजर आती है। तड़कता-भड़कता कुछ भी नजर नहीं आता। बस यही बात आंखों को सुकून देती है।  

        फिल्म की पटकथा इतिहास में लिपटी एक ऐसी प्रेमकथा पर टिकी है  जो धर्म या मजहब की दीवार से टकराती है और इसी टकराहट से षड़यंत्र जन्म लेता है। कहानी अठारहवीं सदी की भारतीय राजनीति के अपराजेय मराठा नायक बाजीराव पेशवा और मस्‍तानी के इर्द-गिर्द घूमती है। युद्ध के दौरान बाजीराव और बुंदेलखंड की बहादुर राजकुमारी मस्‍तानी के बीच इश्‍क हो जाता है। बाजीराव अपनी कटार मस्‍तानी को भेंट करता है। बुंदेलखंड की परंपरा में कटार देने का मतलब शादी करना होता है। पर बाजीराव अपने बचपन की दोस्‍त काशीबाई के साथ शादी कर चुके हैं। मस्‍तानी की वजह से बाजीराव की मां नाखुश होती है। वह मस्‍तानी का तिरस्‍कार और अपमान करती हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह उसका मुसलमान होना होता है। इन सब के बीच बाजीराव मस्तानी को पत्नी का दर्जा देना चाहते हैं।  रिश्‍तों के इस कशमकश में तत्कालीन समाज और सोच दिखती है। फिल्म प्रेम के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक रीतियों पर प्रहार भी करती है। और फिर यहीं से एक द्वंद्व शुरू होता है जिसका असर कई जिंदगियों पर पड़ता है। कहानी के दोनों किनारों पर दो महिलाएं है और बीच में एक पुरुष है- बाजीराव, मस्तानी और काशी। बाजीराव ने मस्तानी को चाहा है और वो भी बाजीराव को उसी जज्बे से चाहती है। और काशी… वह क्या करे? वह भी बाजीराव से प्रेम करती है पर मस्तानी से कैसा संबंध ऱखे? उसे स्वीकार करे या अस्वीकार? अस्वीकार किया नहीं जा सकता और स्वीकार करना कठिन है। काशी दोनों के बीच झूलती है। इन्हीं और ऐसे ही कई जज़बाती किनारो को छूती बाजीराव मस्तानी मानवीय भावनाओं के कई पहलुओं को दिखाती है।  

फिल्म के मुख्‍य कलाकार प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह ने अपने किरदारों को बखूबी जिया है। निर्देशक की सूझबूझ से हर किरदार में आवश्‍यक गहराई और गंभीरता है। युद्ध के मैदान में रनवीर की ऊर्जा देखने को मिलती है। उनकी घुड़सवारी, तलवारबाजी और आक्रामकता में जरा भी बनावटीपन नजर नहीं आता है। सेनापति के रूप में उन्होंने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। उनकी सराहना इस रोल को स्वीकार करने के लिए भी की जानी चाहिये। फिर भी कुछेक बातों जो फिल्म में खटकती हैं, वो भी रनवीर से ही ताल्लुक रखती हैं। जैसे कई बार उनका अभिनय काफी नियंत्रित लगता है और कई जगह वह अपने चरित्र से हटते भी दिखाई देते हैं। प्रियंका चोपड़ा की भूमिका संयमित है। कुंठा, गुस्से और हताशा के भाव में वह दिख कर भी छिप-सी जाती हैं। इसकी वजह यह है कि प्रियंका चोपड़ा के किरदार काशीबाई के लिए अधिक स्‍पेस नहीं है। पर अपनी सीमित उपस्थिति में ही प्रियंका प्रभावित करती हैं। दीपिका पादुकोण ने इस फिल्म में अपने को साबित किया है। वीरांगना और माशूका के भावों को उन्होंने खूबसूरती के साथ पेश किया है। जब मस्‍तानी अपने बच्‍चे को साथ लेकर युद्ध करती है तब किसी शेरनी की तरह लगती है और जब बाजीराव से मोहब्बत करती है तब खूबसूरती और नजाकत की देवी लगती है।         

 सबसे बड़ी बात यह है कि फिल्म इतनी खूबसूरत और शानदार है कि कमियां नजर आती ही नहीं है। पर कुछ बाते खटकती हैं। जैसे इंटरवल के बाद कहानी में कोई खास बदलाव नहीं होने की वजह से यह कहीं-कहीं कुछ पलों के लिए थोड़ी बोर भी होने लगती है। एक और बात सवाल पैदा करती है कि लगातार चालीस लड़ाइयां जीतने वाले महान योद्धा की वीरता दिखाने के लिए सिर्फ एक युद्ध का फिल्मांकन क्यों ? निर्देशक के पास इन सबके लिए कई मौके भी थे। प्रतिनिधि (आदित्य पंचोली) की चालें क्या केवल दो ही दृश्यों तक सीमित रहनी चाहिये थीं? क्योंकि किसी भी राज-पाट में षणयंत्रों-चालों की पूरी-पूरी गुंजाइश होती है। बावजूद इसके 158 मिनटों में भंसाली ने अपने दर्शकों को पर्दे पर जो जादू दिखाया है उसे देखकर यही कहना सही होगा कि भंसाली ने फिल्म नहीं बनाई बल्कि ‘बाजीराव मस्तानी’ से मोहब्बत की है।  



   रुद्रभानु प्रताप स

रूद्र भानु दैनिक भास्कर में कुछ साल पत्रकार और समीक्षक रह चुके हैं और आजकल मुंबई के प्रिंट media में सक्रीय हैं .

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