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प्रेम रतन धन पायो
ऊंची दुकान, फीके पकवान


सूरज बडजात्या
लेखक - निर्देशक


























Film Review
प्रेम रतन धन पायो :ऊंची दुकान, फीके पकवान


‘प्रेम रतन धन पायो’

निर्माता-अजित कुमार बड़जात्या, कमल कुमार बड़जात्या, राजकुमार बड़जात्या

निर्देशक कहानी-पटकथा : सूरज बड़जात्या

संगीत : हिमेश रेशमिया

कलाकार : सलमान खान, सोनम कपूर, नील नितिन मुकेश, अरमान कोहली, अनुपम खेर, स्वरा भास्कर, दीपक डोब्रियाल

अमूमन सूरज बड़जात्या या राजश्री की अपनी एक अलग दुनिया होती। इस दुनिया में एक खुशियों से भरा परिवार होता है। सीधे-सच्चे लोग होते हैं और सिल्वर स्क्रीन पर मध्यमवर्गीय परिवार के परंपरा और संस्कार की गूंज सुनाई देती है। पर ‘प्रेम रतन धन पायो’ का परिवेश काफी अलग है। इस बार कहानी एक राजघराने की है। जिसमें राजकुमार है, राज-पाट संभालने वाले दीवान साहब हैं, साज़िश करने वाला भाई और सौतेली बहनें हैं, एक प्रेमिका है और दो सलमान हैं । एक सलमान का नाम प्रेम है, जो अयोध्या से आया है। यह राजश्री के सपनों का प्रेम है... बिलकुल निश्छल और दिलदार। दूसरा एक अरबपति राजकुमार विजय है.... मूछों वाला… । राजकुमार के साथ उसके छोटे भाई अजय (नील नितिन मुकेश), दो सौतेली बहनें और एस्टेट के सीईओ चिराग (अरमान कोहली) रहते हैं। दीवान साहब (अनुपम खेर) भी|

कहानी है अयोध्या में रहने वाला प्रेम की। प्रेम रामलीला से जुड़ा है और  राजकुमारी मैथिली (सोनम कपूर) की उदारता का प्रशंसक है। वह मैथिली से मिलने के लिए अपने दोस्त कन्हैया (दीपक डोब्रियाल) के साथ  प्रीतमपुर जाने का फैसला करता है जहां राजकुमारी अपने मंगेतर विजय सिंह (सलमान खान) के राजतिलक में हिस्सा लेने जाने वाली है। विजय सिंह के साथ षड्यंत्र होता है। एक जानलेवा हमले में वह खाई में गिर जाता है, लेकिन उसका विश्वासपात्र दीवान (अनुपम खेर) उसे बचा लेता है। घायल विजय की जगह दीवान केवल चार दिनों के लिए प्रेम को विजय सिंह बना कर पेश कर देता है। प्रेम को पता चलता है कि विजय सिंह और उसकी सौतेली बहनों के रिश्ते में खटास है। इसे वह अपने सुमधुर व्यवहार से मिठास में बदल देता है। विजय सिंह और मैथिली एक-दूसरे को नापसंद करते हैं, लेकिन मैथिली के नजदीक रह कर प्रेम उसका दिल जीत लेता है। प्रेम कहानी में तब मोड़ तब आता है जब विजय सिंह ठीक होकर वापस आता है। मैथिली-प्रेम की प्रेम कहानी का क्या होगा? क्या होगा जब मैथिली को असलियत पता चलेगी? विजय सिंह की जान लेने वाले लोग कौन हैं? इन प्रश्नों के जवाब थोड़े-बहुत उतार-चढ़ाव के साथ लगभग तीन घंटे की फिल्म में मिलते हैं। फिल्म की कहानी बस इतनी सी ही है पर इसी काशमकश में फिल्म कभी थ्रिलर, कभी फैमिली शो तो कभी लव स्टोरी बनने की कोशिश में खो सी जाती है।

पूरे फिल्म या तो सलमान नजर आते हैं या फिर राजमहल और राजसी ठाठबाठ का भव्य सेट।  ‘प्रेम रतन धन पायो’ का सेट बहुत भव्‍य और आकर्षक है। निर्देशक सूरज बड़जात्या ने एक बड़े कैनवास की फिल्म बनाई है। बहुत ही विशाल सेट, जिसे राज महल की तरह दिखाया गया है। सुंदर और अद्भुत दृश्य हैं, शानदार लाइटिंग, बेहतरीन लोकेशन और अच्छी सिनेमेटोग्राफी है। इन सबके बीच से गुजरती हुई कहानी में कहीं-कहीं हल्के-फुल्के हंसाने वाले दृश्य हैं। कुछ बेहतरीन इमोशनल सीन हैं और साथ में कुछ एक्शन भी। कुछ अच्छे अभिनय भी हैं। सूरज बड़जात्‍या ने अपने हर किरदारों को भव्यता देने की पूरी कोशिश की है। अपनी परंपरा को निभाते हुए पारिवारिक मूल्यों, रिश्ते और प्यार निभाने को लेकर लंबे-लंबे संवाद और सीन भी फिल्माएं हैं। फिल्म के कुछ किरदार नकारात्मक भी हैं। बावजूद इसके फिल्म की कहानी और स्क्रिप्ट किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करती। अगर फिल्म के दूसरे पहलू पर रोशनी डालें तो यह जरूरत से ज्यादा लंबी है। जरूरत से ज्यादा गाने हैं। कुछ ऐसे दृश्य हैं, जो कुछ ज्यादा ड्रामेटिक हैं जिन्हें देखकर बगल झांकने का मन करता है। आज के दौर में आमतौर पर ऐसे सीन को दर्शक कम ही पसंद करते हैं। फिल्म देखने के बाद कई ऐसे तर्क और सवाल उठते हैं जिसका जवाब अंत तक नहीं मिलता है। सूरज बड़जात्या जैसे लेखक और निर्देशक ने स्क्रिप्ट की कुछ कमियों पर ध्यान नहीं दिया जो कि आश्चर्य की बात है। विजय खाई में गिरता है, लेकिन पीठ के सिवाय उसे शरीर में कही भी खरोंच तक नहीं आती। गंभीर हालत में उसे अस्पताल ले जाने के बजाय उसका इलाज एक तहखाने में किया जाता है, जो किसी आश्चर्य से कम नहीं है। खलनायक इतने मूर्ख हैं कि राज की बातें अजनबियों के सामने करते हैं।  इसके अलावा प्रेम का मैथिली का दिल जीतना, विजय के भाई-बहनों से संबंध सुधारना, विजय सिंह का ठीक हो जाना, ये तमाम घटनाएं मात्र चार दिन में ही घटित हो जाती हैं जो कि अविश्वसनीय है। 

 फिल्म की कहानी काल्पनिक और पारिवारिक रिश्तों की बुनियाद पर बनाई गई है। लेकिन आज के युग में इतनी पुरानी कल्पना हजम नहीं हो पाती। भव्य सेट्स और बड़े कलाकारों के मौजूद होने के बाद भी स्क्रिप्ट फीकी है । इंटरवल से पहले बना हुआ माहौल इंटरवल के बाद बिखरने लगता है। फिल्म की धीमी रफ्तार एक समय पर उबन और थकान पैदा कर देता है। शायद यही फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है।  स्क्रिप्ट और भी ज्यादा कसी जा सकती थी। निर्देशक ने कुछ सीन अच्छे रचे हैं जो दर्शकों को भावुक कर देते हैं, जैसे प्रेम (विजय) द्वारा अपनी बहन चंद्रिका को जायदाद में हिस्सा देना और बहन का भाई को तिलक लगाना। सोनम कपूर और सलमान खान के बीच एक रोमांटिक सीन भी जबरदस्त है जिसमें विजय सिंह बना प्रेम हद लांघने में संकोच करता है। कहानी को ठीक से समेटने में सूरज लड़खड़ा गए हैं और शीश महल में फाइटिंग सीक्वेंस बोरियत पैदा करता है। वे फिल्म को बहुत ज्यादा मनोरंजक नहीं बना पाए। दोहरी भूमिका में सलमान का काम अपने दोनों किरदारों के साथ न्यायसंगत है वहीं फिल्म के बाकी कलाकारों जैसे सोनम कपूर, स्वरा भास्कर, अनुपम खेर, नील नितिन मुकेश, अरमान कोहली , दीपक डोबरियाल, संजय मिश्रा ,दीपराज राणा ने भी सहज भूमिका निभाई है।  



   रूद्र भानु प्रताप

रूद्र भानु दैनिक भास्कर में कुछ साल पत्रकार और समीक्षक रह चुके हैं और आजकल मुंबई के प्रिंट media में सक्रीय हैं .

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