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वंस अपॉन ए टाइम इन बिहार



नितिन चन्द्र
लेखक-निर्देशक


























Movie Review
वंस अपॉन ए टाइम इन बिहार:


लेखक-निर्देशक – नितिन चन्द्र

निर्माता- नीत चन्द्र, नितिन चन्द्र और समीर कुमार

कलाकार -क्रांति प्रकाश झा, अजय कुमार, आरती पुरी, पंकज झा, दीपक सिंह और आशीष विद्यार्थी आदि.   

‘वंस अपॉन ए टाइम इन बिहार’ ’ लालू-राबड़ी के शासनकाल के दौरान के बिहार के माहौल को पृष्ठभूमि बना कहानी कहती है. नीतीश कुमार और बीजेपी के गठबंधन की सरकार बनने से पहले बिहार में जंगल राज चल रहा था. विकास की गति कुंद थी और अपरहरण-राहजनी चरम पर था ; रोजगार का रूप ले चुका था. बदमाशों की चाँदी थी और शरीफ आदमी दहशत के साये में जी रहा था. शाम होने से पहले लोग घर आ जाना पसंद करते थे और लड़कियाँ- महिलायें दिन में भी घर के बाहर असुरक्षा महसूस करती थीं. कानून व्यवस्था की हालत बेहद दयनीय थी. आम जनता त्राहिमाम कर रही थी. इस पर सालों राजनीति हुई और 2005 के आखिरी महीनों में नीतीश कुमार और बीजेपी गठबंधन इसी मुद्दे की सवारी कर सत्ता में आये. लालू-राबड़ी के 15 साल के शासन का अंत हुआ. हालाँकि लालू यादव और उनके समर्थक मानते रहे कि बिहार में दरअसल पिछड़ों-दलितों के जागरण का दौर चल रहा था, जिसे अगड़ों ने जंगलराज का नाम दिया. राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप अपनी जगह हैं, लेकिन यह सच्चाई थी कि पिछड़ा और दलित जागरण व उत्थान के नाम पर बिहार में कानून व्यवस्था पर आपराधिक किस्म के लोगों ने अपना कब्जा जमा लिया था. विकास के नाम सिर्फ नेतागिरी और तानाशाहीपूर्ण व्यवहार चल रहा था. सत्ता और प्रशासन लालू जी के घर में सिमट आया था और वहीं से सारी शासन-प्रशासन व्यवस्था चल रही थी. दलितों-पिछड़ों को आजादी पूर्वक बोलने और रहने का माहौल जरूर दिया गया था, लेकिन गुंडा तत्व हर जगह हावी हो गये थे... और आम जनता चाहे वह किसी भी समुदाय का था, परेशानी झेल रहा था.

लेखक नितिन चन्द्रा ने आम आदमी की उसी परेशानी और उससे उपजी कुंठा को अपनी इस फिल्म का विषय बनाने की कोशिश की है. फिल्म का नायक दो पढ़े लिखे युवक हैं. एक (शंकर पांडे) पढ़ा लिखा होने के बावजूद घूस नहीं दे पाने की स्थिति में नौकरी पाने से वंचित होकर ट्रेकर चलाने को मजबूर है, दो दूसरे (राजीव कुमार) के पास टीचर की नौकरी तो है, लेकिन इतनी सेलरी उसकी नहीं है कि वह अपनी बहन की शादी के लिए चार लाख रुपया जमा कर सके. वह ज्यादा पैसे कमाने के लिए पटना के एक कोचिंग सेंटर में टीचर के तौर पर नौकरी ढूँढता है और कुछ महीनों में ही लगभग डेढ़ लाख रुपये जमा कर लेता है. यह पैसा वह बैंक में जमा करने जा रहा होता है, तभी कुछ बदमाश सड़क पर मारपीट कर उससे रुपये छीनकर भाग जाते हैं. इसी तरह शंकर पांडे गोरखपुर की एक चिटफंड कंपनी में छोटी सी नौकरी ज्वाइन करता है, लेकिन तीन महीने काम करने के बाद भी उसे वेतन नहीं मिलता. कंपनी अपना दफ्तर बंद कर फरार हो जाती है. बहरहाल दोनों दोस्त वापस अपने गाँव लौटते हैं. जहाँ उनका साथी बनता है जींस, जो अनपढ़ है और फिल्मी गीतकार बनने के सपने देखता है. कुंठा का शिकार राजीव कुमार एक दिन तय करता है कि वह भी राज्य में उद्योग का रूप ले चुके अपहरण में अपना हाथ आजमायेगा और जरूरत के पैसे निकालेगा. इसमें वह शंकर पांडॆ और जींस दोनों को शामिल करता है और तीनों मिलकर एक हॉटेल मालिक को किडनैप करने का प्लान बनाते हैं और उसे अमली जामा पहनाने में जुट जाते हैं. इस क्रम में वह हॉटेल के मालिक की जगह एक बड़े नक्सलवादी नेता (लिंगम) को किडनैप कर लेते हैं. उनलोगों को जब यह पता चलता है, तो वह लिंगम से सवाल जवाब करते हैं कि नक्सलवाद क्यों? लिंगम अपने तर्क देता है और कहता है उसे वह आंध्र की सीमा तक पहुँचा दे, बदले में वह जरूरत के पैसे देगा. तीनों आंध्र की सीमा में छोड़ने के लिए निकलते हैं. जहाँ पुलिस से उनकी भिड़ंत हो जाती है, जींस मारा जाता और दोनों किसी तरफ बचकर भागते हैं. राजीव अपनी बहन को पैसे देता है, जहाँ उसे पता चलता है कि शंकर पांडे अरेस्ट हो चुका है. राजीव कुमार अपने आप को सरेंडर करता है. और दोनों सरकारी गुंडगर्डी से त्रस्त जनता के नायक बन जाते हैं.

कहानी में गंभीरता कम उतावलापन और खीझ ज्यादा है. इसलिए कहानी कहीं भी दर्शक पर अपनी पकड़ नहीं बना पाती है. नितिन ने बिहार में चल रहे ‘जंगलराज’ को जिस तरह से दिखाया है, वह बेहद आम और बचकाना है. सालों पहले आई ‘अंकुश’ फिल्म में भी बेरोजगार युवकों की यही परेशानी और कुंठा थी. सड़क पर रुपये छीन लिया जाना, देश में कहीं भी आम घटना है. इसी तरह चिटफंड कंपनी का घोटाला हर राज्य में चलता रहता है. बिहार में लालू-राबड़ी राज में अलग क्या हो रहा था, लेखक यह दिखाने में पूरी तरह असफल रहे. सिर्फ संवाद से कहानी नहीं बनती, उस तरह की कुछ खास घटनाओं का उल्लेख जरूरी था, जिसमें लालू-राबड़ी राज का कथित जंगल राज दिखता.

कुंठा का शिकार नायक भी वही रास्ता चुनता है, जिस रास्ते अपराधी चल रहे थे, फिर नायक होने का मतलब क्या? फिर अनावश्यक तौर पर कहानी में नक्सलवाद को जोड़ दिया गया. इस तरह ढेर सारे विषयों को लेखक ने छू तो दिया है, लेकिन किसी भी विषय के साथ न्याय नहीं कर पाया है और न ही समाज को किसी प्रकार का मैसेज दे पाने में कामयाब हो पाया है.        

लेखन इस फिल्म का सबसे माइनस प्वाइंट है. मनोरंजन नहीं है. बोझिल है. कैमरामैन ने अच्छा काम किया है. सभी कलाकारों ने भी अपना द बेस्ट दिया है. यही दोनों फिल्म का प्लस प्वाइंट है.

2011 में यह फिल्म भोजपुरी में ‘देशवा’ नाम से यह रिलीज की जा चुकी है.



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं.. .

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