1
 


Jazbaa



























Film Review
jazbaa:जज़्बात से आगे नहीं निकाल पाई जज्बा


 
 थिएटर के बाहर फिल्म ‘जज्बा’ मेरे लिए तीन मायनों में बेहद खास थी। सालों बाद ऐश्‍वर्या राय बच्‍चन की पर्दे पर वापसी…  दक्षिण कोरियाई फिल्‍म ‘सेवन डेज’ के रीमेक का रोमांच और संजय गुप्ता का थ्रिलर अंदाज... लेकिन पर्दे पर कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती गई...जज्बा का थ्रिलर अंदाज भी जज़्बात में बदल गया। एक हाई-प्रोफाइल वकील की भूमिका में ऐश्‍वर्या एक मां की लड़ाई लड़ने की भरपूर कोशिश करती हैं। यह लड़ाई उन्हें अभिनय और किरदार दोनों स्तरों पर लड़नी पड़ती है। पर्दे पर ऐश्‍वर्या का पहला लुक किसी विज्ञापन फिल्म की मॉडल की तरह होता है। माँ बनने और फिल्मों से कमोबेश 5 साल से दूर रहने के बावजूद जब वह पर्दे पर नजर आतीं हैं तो कहीं से यह नहीं लगता कि वह उम्र के 41 वें पड़ाव पर पहुंच गईं है। हां प्रोफेशन के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाने वाली अच्छी माँ बनने के लिए ऐश्‍वर्या को अंत तक मेहनत करना पड़ता हैं। उन्हें दर्शकों को इस बात का यकीन दिलाना पड़ता है कि उनकी बेटी का अपहरण हुआ है। फिल्म की पूरी कहानी इसी जज्बाती माँ और जज्बे वाली वकील अनुराधा वर्मा के इर्द-गिर्द घूमती है। अनुराधा एक ऐसी वकील है जो अपराध का कोई मुकदमा नहीं हारती। पर उसका यह ट्रैक रिकॉर्ड उसके लिए मुसीबत बन जाता है। अनुराधा के बच्ची का अपहरण हो जाता है और बदले में उसे एक बलात्कार के आरोपी की पैरवी करनी पड़ती है।    
  निर्देशक संजय गुप्ता ने कोरियाई फिल्‍म ‘सेवन डेज’ को इंडियन मेलोड्रमिक फिल्म बनाने के लिए पटकथा का भारतीयकरण करने की पूरी कोशिश की है। यही वजह है कि थ्रिलर और सस्पेंस का रोमांच देने वाली फिल्म पर अचानक माँ के  जज़्बात भारी पड़ने लगते हैं। यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता फिल्म के अंत में माँ का जज़्बात सस्पेंस से काफी आगे निकाल जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो संजय गुप्ता ने फिल्म की पटकथा में सस्पेंस व जज़्बात का कॉकटेल तैयार किया है और साथ में प्यार की हल्की फुहार भी डालने की कोशिश की है। पुलिस इंस्पेक्टर योहान की भूमिका में इरफान फिल्म में कभी लव का तड़का डालते हैं तो कभी अपने शेर-ओ-शायरी से सस्पेंस की रफ्तार को ह्यूमर के रंग में रंग देते हैं। फिल्म की पटकथा बड़ी आसानी से दो पाटों में बंट जाती है। पहले भाग में विलेन का शातिर अंदाज दर्शकों को किसी भी नतीजे पर पहुँचने से रोकता है। विलेन को खोजने के लिए दर्शक एक साथ तीन से चार एंगल पर विचार करता है और क्लाईमैक्स से 5 मिनट पहले तक यह कयास लगाना मुश्किल हो जाता है कि इस 'आखिर क्यों' के पीछे कौन है। ये करामात उस कोरियन फिल्म की कही जा सकती है, जिसे निर्देशक ने उत्सुकता के दायरे से बाहर नहीं जाने दिया है। पर कभी-कभी अति नाटकीयता वे कुछ दृश्यों के कारण थ्रिलर वाला तत्व कमजोर हो जाता है। बावजूद इसके संजय गुप्‍ता ने थ्रिलर क्रिएट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्होंने मुंबई को अलग रंगों से दिखाने की पूरी कोशिश की है।
इरफान के किरदार को फिल्म के संवादों ने काफी मजबूती दी है। इरफान के डायलॉग...तो क्या मैं सिंघम बन कर घूमूं...ग्राहक नहीं, उम्मीद आई है...इन संवादों ने इरफान को हीरो के रूप में स्थापित किया है। इन्हीं की वजह से फिल्म में वह सिंघम और चुलबुल पांडे की शैली में दिखते हैं। इरफान के मुंह से निकले संवाद तालियां बटोरते हैं तो कभी कॉफी मग के सहारे जिंदगी के ताने-बाने और अधूरेपन के मायने को बड़ी सहजता से कह देते हैं। जहां-जहां फिल्म कसावट में कमी आई है वहां संवादों ने अपना काम किया है... कभी उम्मीद बन कर तो कभी मोहब्बत के अलफाज बन कर...। फिल्म में कई मायनों में बेशक गहराई कम है पर संवादों की गहराई दर्शकों के समझ में आती है।
 इरफान को किरदार में ढलना आता है इसलिए अंत तक अपने अंदाज और शांत मिजाज से वे फिल्म में कहीं ढीलापन नहीं आने देते। उनकी भूमिका पर जरा भी हैरानी नहीं होती। इंस्पेक्टर योहान ड्यूटी पर नहीं है…वॉरंट निकलने के बावजूद महकमे से भागा हुआ है…फिर भी अपनी बचपन की दोस्त की मदद वह पूरे जी जान से कर रहा है। वह पर्दे पर कभी सस्पेंस क्रिएट करता है तो कभी ह्यूमर। यह किरदार भी इरफान के अभिनय को नया आयाम देता है।    
अभिमन्‍यु सिंह, चंदन रॉय सान्‍याल, सिद्धांतकपूर, अतुल कुलकर्णी, प्रिया बनर्जी और शबाना आजमी ने अपनी भूमिकाओं से फिल्‍म को प्रभावशाली बनाया है। कई दृश्यों में चंदन रॉय सान्‍याल और प्रिया बनर्जी अपना छाप छोड़ते नजर आते हैं।   बड़े दिनों बाद पर्दे पर आईं शबाना आजमी ने गरिमा चौधरी की जटिल भूमिका को अपने अनुभव से सरल कर दिया है। वह उस महिला का किरदार निभाया है जिसकी बेटी के साथ बलात्कार हुआ और जिसकी हत्या हुई है। एक मोड पर आकार कहानी भी इन्हीं दो मांओं के बीच का द्वंद बन जाती है और इस द्वंद में सस्पेंस के जज्बे से माँ का जज़्बात आगे निकाल जाता है।   



   Rudra Bhanu

.

Click here to Top