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गंगापुत्र
वही पुराना सूत्र


विनय बिहारी
लेखक


























Film Review
गंगापुत्र:वही पुराना सूत्र


गंगापुत्र 
वही पुराना सूत्र

लेखक व गीतकार : विनय बिहारी

संगीतकार : राजेश गुप्ता

निर्देशक : बाली

निर्माता : राधे श्याम दूबे और आशुतोष पांडे

कलाकार : पवन सिंह, मोनालिसा, राधेश्याम रसिया, प्रिया सिंह आनन्द मोहन, मेहनाज और उत्तम झा

मुम्बई में इस सप्ताह रिलीज हुई फिल्म का नाम है ‘गंगापुत्र’. फिल्म पुरानी है, लेकिन रिलीज अब हुई है. फिल्म की कहानी नई नहीं है. गाँव में ठाकुर (उत्तम झा) का आतंक है. एक किसान (विनय बिहारी) विरोध करता है. ठाकुर उसकी हत्या करवा देता है. फिर उसकी पत्नी के साथ रेप करता है और उल्टा उसे ही एक आदमी की हत्या के जुर्म में जेल भिजवा देता है. अदालत उसे 14 साल की सजा देती है. इस काम में ठाकुर के तीन साथी और हैं, डॉक्टर, वकील और दारोगा. उसपर आफत यह कि उस स्त्री यानी गंगा (मेहनाज) के बेटे को बचपन में भी कुछ जोगी धोखे से उठा ले जाते हैं.

14 साल बाद गंगा छूटकर गाँव आती है. दूसरी तरफ गंगा का बेटा ओम (पवन सिंह) भी बड़ा हो चुका है. ओम का गुरू उससे कहता है कि जाओ माँ से भिक्षा माँगकर ले आओ, साधना पूरी हो जायेगी. ओम गाँव आता है माँ से भिक्षा माँगने, लेकिन माँ की हालत देखकर वह रो पड़ता है. ठाकुर ने गाँव वालों से कह रखा है कि गंगा को कोई भोजन पानी न दे. ओम माँ की सेवा करता है. हालाँकि गंगा को यह पता नहीं है कि वह जोगी ही उसका बेटा है. लेकिन उसकी प्रेमिका (मोनालिसा), जो कि ठाकुर की बेटी है, को यह पता चल जाता है कि जोगी उसका बचपन का साथी है. गाँव की एक और लड़की (प्रिया सिंह) भी जोगी के हाथ में ‘ऊँ’ गोदना देखकर पहचान जाती है कि जोगी कोई और नहीं बल्कि, ओम है. वह यह बात अपने पिता (आनन्द मोहन) और प्रेमी (राधेश्याम रसिया) को बताती है. सब जोगी को बतलाते हैं कि तुम्हारी माँ को इस हालत में पहुँचानेवाला, तुम्हारे पिता को मारनेवाला कोई और नहीं, बल्कि ठाकुर और उसके तीन साथी हैं. हीरो उसके बाद हीरोइन के साथ गाना गाता है,  ठाकुर आइटम साँग देखता है और हीरो बारी बारी से ठाकुर और उसके साथियों को मौत के घाट उतार देता है.

जोगी का ट्रैक बदले की इस कहानी में नयापन का रंग भर सकता था, लेकिन कहानीकार विनय बिहारी उस ट्रैक को न तो कंविंसिंग तरीके से उभार सके और न ही जोगी कैसे बदला लेगा, इस पर कुछ अलग सोच सके. कहानी का विस्तार बड़ा ही चलताऊ है और उससे भी चलताऊ है पटकथा. किसी भी चरित्र की गढ़ाई सही तरीके से नहीं की गई है. ऎसा लगता है, जैसे कहानीकार अपनी कहानी नहीं कह रहा है, बल्कि सुनी सुनाई बातों को जैसे तैसे परदे पर रख दे रहा है. बिहार में पहले बच्चों को जोगी द्वारा उठा ले जाने की कहानी आम हुआ करती थी. काफी साल बाद बच्चा युवा जोगी बनकर गाँव माँ से भिक्षा माँगने आता है. जोगी भरथरी की कहानी और सारंगी पर भरथरी के गीत पहले गाँव के लिए मिथक और अभिन्न अंग हुआ करते थे. विनय बिहारी ने बिहारी समाज में रचे बसे भरथरी के गीत और ट्रैक को कहानी में उठाया तो है, लेकिन उसका निर्वाह नहीं कर पाए. न वास्तविक धरातल दे पाए और न ही कल्पना की उड़ान. जबकि कहानी में कई एसे मोड़ आते हैं, जब लेखक कहानी को रोचक विस्तार दे सकता था. जोगी भरथरी के गीत, जोगी और उसकी प्रेमिका की प्रेम कहानी और जोगी किस तरह अपने परिवार के साथ हुए जुल्म का बदला लेता है, ये फिल्म के लिए बड़े की सुन्दर, रोचक और स्तरीय प्रसंग हो सकते थे. लेखक ने उसका सही इस्तेमाल नहीं किया और कहानी पुराने फिल्मी फॉर्मूलों में उलझ कर रह जाती है. इसलिए संवाद भी अच्छे बन नहीं पाए हैं . गीत लेखन में भी गीतकार विनय बिहारी ने चलताऊ अप्रोच ही लिया है, लिहाजा कोई भी गीत आनन्द विभोर नहीं कर पाता, यहाँ तक कि जोगी का गीत भी मुग्ध नहीं कर पाता. संगीतकार राजेश गुप्ता भी मुख्य चरित्र के रनवे और उड़ान को समझ नहीं पाए, लिहाजा सारंगी से मधुर संगीत निकालने के बजाय शोर शराबे वाले संगीत को ही परोसा है.

फिल्म के निर्देशक बाली हैं, निर्देशक की कल्पनाशीलता शून्य है. न वह विषय को समझ पाये और न ही निर्देशक होने के मतलब को. आम भोजपुरी फिल्म की तरह किसी तरह छाप दिया है पटकथा को, इसलिए कोई भी अभिनेता अपना असर नहीं छोड़ पाता है. जोगी होने का मतलब होता है चेहरे पर दिव्यता का भाव, उसकी बोली में मधुरता और मुग्धता का भाव, जबकि पवन सिंह हमेशा रोनी सूरत लिए रहे. मोनालिसा और प्रिया सिंह के चरित्रों को वल्गर सेक्स दिखाने का माध्यम मानकर विस्तार दिया गया है. कहानी के संस्कार से उसका कोई लेना देना नहीं है. आनंद मोहन निराश करते हैं. राधेश्याम रसिया का कोई काम नहीं है. ठाकुर के रोल में उत्तम झा ने अच्छा काम किया है. ये उत्तम की अपनी मेहनत दिखती है.

कुल मिलाकर गंगापुत्र बहुत ही हल्के तरीक से बनाई गई बुरी फिल्म है.          



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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