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बंधन
ढीला है


मनोज कुशवाहा
लेखक


























Film Review
बंधन (भोजपुरी):ढीला - ढाला


 

बंधन : ढीला-ढाला

लेखक : मनोज कुशवाहा

गीत : प्यारेलाल यादव, आजाद सिंह आदि

संगीत : ओम झा

निर्देशक : प्रेमांशु सिंह

निर्माता : शिवनारायण सिंह

कलाकार : खेसारी लाल (केसरी लाल यादव), स्मृति सिन्हा, संजय पांडे, अनूप अरोड़ा, ब्रजेश त्रिपाठी आदि

‘बंधन’. इस सप्ताह रिलीज हुई भोजपुरी फिल्म का यही नाम है. इस नाम से कुछ साल पहले सलमान खान की हिंदी फिल्म रिलीज हो चुकी है, लेकिन उसका इस फिल्म पर कोई असर नहीं है. सलमान खान की फिल्म ‘सूर्यवंशी’ और ‘करण अर्जुन’ का थोड़ा बहुत असर जरूर है. फिल्म में पुनर्जन्म है और पिछले जन्म की प्रेमकहानी भी है. लेखक मनोज कुशवाहा हैं. इस फिल्म की अच्छी बात है कि आम भोजपुरी फिल्मों की तरह बेमतलब की कहानी और वल्गरिटी पर फोकस नहीं है. कहानी है और उसे कहने की कोशिश है. यह अलग बात है कि न तो विषय मौलिक है और न ही कहानी.

सूरज (खेसारी लाल) का पुनर्जन्म है. इस जन्म में उसका नाम साजन है और उसकी शादी उसके पिता के दोस्त की बेटी से हो रही है. लड़की साजन से प्यार करती है. लेकिन साजन के पूर्वजन्म की पत्नी इस शादी में विघ्न उपस्थित कर देती है. पूर्वजन्म की कहानी का पन्ना पलटता है तो पता चलता है कि ठाकुर भगवान सिंह (संजय पांडे) का दिल गाँव की एक सुन्दर लड़की कजरी (स्मृति सिन्हा) पर आ जाता है. वह उस लड़की से शादी करना चाहता है, जबकि पहले से ही वह शादी शुदा है और उसकी पत्नी है, लेकिन पंडित बताता है कि लड़की मांगलिक है, इसलिए पहले उसकी शादी किसी और से करवानी होगी. भगवान सिंह को इसके लिए सबसे उपयुक्त युवक दिखता है उसका गुलाम सूरज. सूरज की उस लड़की से शादी करा दी जाती है. भगवान सिंह सूरज को ताकीद करता है कि 21 दिनों तक वह लड़की उसके साथ अमानत के तौर पर रहेगी, बाद में वह शादी करेगा, इसलिए गलती से भी पति वाला रिश्ता मत बनाना. गुलाम सूरज ऎसा ही करता है. 21 वें दिन सूरज भगवान के कहने पर अपनी ब्याहता को मंदिर पर लेकर आता है, जहाँ सूरज भगवान सिंह को सौंपकर चला जाता है. भगवान सिंह कजरी से शादी के लिए उसकी माँग में भरा सिंदूर धोता है. दूसरी तरफ सूरज को कजरी के साथ बिताये प्यार भरे पल याद आते हैं और सूरज भगवान सिंह और उसके गुंडों से भिड़ जाता है, लेकिन इस दौरान सूरज भगवान सिंह के हाथों मारा जाता है. फिर वहीं कजरी भी आत्महत्या कर लेती है. सूरज के मृत शरीर का दाह संस्कार कर दिया जाता है, इसलिए उसकी आत्मा को दूसरा शरीर मिल जाता है, लेकिन कजरी को दफना दिया जाता है, इसलिए उसकी आत्मा भटकती रहती है, सूरज का प्यार पाने के लिए.

कहानी मौलिक नहीं है और उसका विस्तार भी काफी लचर है. अच्छी पटकथा से कहानी को संभाला जा सकता था, लेकिन कमजोर पटकथा कहानी को बेहद धीमी कर देती है. भोजपुरी दर्शक की मानसिकता को ध्यान में रखकर मनोज ने कहानी को भूत और भय का टच दिया है, लेकिन यह फिल्म को रोचक बनाने के बजाय भटकाता है. प्रेम कहानी में भूत का डरावना असर पैदा करने की क्या जरूरत थी! कजरी और सूरज की प्रेमकहानी बेहद स्लो है. क्योंकि दृश्य लंबे हैं और ये दृश्य कहानी की गति को रोक देते हैं. प्रेमकहानी छोटे-छोटे दृश्यों के माध्यम से अवतरित होती और सूरज की वेदना भी दिखाई जाती तो फिल्म की गति बढ़ती और रोमांच पैदा होता. पटकथा जरा भी कंविंसिंग नहीं है. जब जो मोड़ चाहा, लेखक ने बिना उसे तर्क पर कसे, दे दिया है. सूरज और कजरी का पहला गीत भी यहाँ सही नहीं है. देशी टाइप गीत देने के बजाय अच्छा सा रोमांटिक गीत होता, तो दर्शकों को राहत मिलती. वैसे इस गाने में नृत्य निर्देशक ने द बेस्ट काम किया है.

पटकथा वर्क नहीं कर रही है, इसलिए फिल्म के संवाद भी असरहीन हैं. गीत ठीक ठाक हैं. संगीत अलग और हटकर है. संगीतकार ओम झा ने लोकसंगीत और रोमांटिक अंदाज की अच्छी ब्लेंडिंग की है. रूटीन संगीत नहीं है. कथा के साथ पटकथा का और पटकथा का   गीत संगीत के साथ सही सही तालमेल होता तो गाने उम्दा प्रदर्शन करते और फिल्म देखने लायक हो जाती.

निर्देशक ने बहुत ही बुरा काम किया है. निर्देशक का काम फिल्म में नहीं दिखता है.

खेसारी लाल इस फिल्म के किरदार को निभाते वक्त पूरी तरह एक्सपोज हो गये हैं कि उन्हें अभिनय नहीं आता है. इस फिल्म में उन्हें सिर्फ लफंदरी नहीं करनी थी, गंभीर अभिनय करना था, जो वह नहीं कर पाये हैं. स्मृति सिन्हा और संजय पांडे अच्छे अभिनेता हैं, बहुत हद तक सँभालने की कोशिश भी की है, लेकिन....

कुल मिलाकर यह एक कमजोर फिल्म है. दर्शकों को संतुष्ट कर पाने में असफल है.

धनंजय कुमार                  



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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