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लागी नाही छूटे रामा
पहले जैसी नहीं


के मनोज सिंह
कथा - संवाद


जगदीश शर्मा
पटकथा - निर्देशन


























Film Review
लागी नाहीं छूटे रामा:पहले जैसी नहीं


लागी नाहीं छूटे रामा :
पहले जैसी नहीं

कथा व संवाद : के मनोज सिंह  

पटकथा- निर्देशन : जगदीश शर्मा

गीत : प्यारेलाल कवि और अरविन्द तिवारी

संगीत : घुंघरू

कलाकार : पवन सिंह, प्रियंका पंडित, काव्या, ब्रजेश त्रिपाठी, गोपाल राय, श्रद्धा नवल और कुणाल सिंह आदि

मुम्बई में इस सप्ताह भोजपुरी फिल्म “लागी नाहीं छूटे रामा” रिलीज हुई है. ‘लागी नाहीं छूटे रामा’ नाम से एक फिल्म 1963 में बनी थी. हिन्दी फिल्मों के चरित्र अभिनेता रामायण तिवारी उस फिल्म के निर्माता थे और उन्होंने एक महत्वपूर्ण पात्र भी निभाया था. असीम कुमार और कुमकुम मुख्य नायक-नायिका थे. अन्य महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजीर हुसैन और लीला मिश्रा थे. भोजपुरी सिनेमा की वह दूसरी फिल्म थी. कुन्दन कुमार निर्देशक थे. संगीत चित्रगुप्त ने दिया था और गीतकार थे मजरूह सुल्तानपुरी. फिल्म की कथा बिहार-उत्तरप्रदेश के समाज में गहरे पैठी जाति व्यवस्था और उसकी विसंगतियों पर आधारित थी. ब्राह्मण युवक चमार जाति की लड़की से प्यार करता है. समाज में उसका विरोध होता है, जबकि राजपूत जाति का जमींदार उसी लड़की पर बुरी नजर रखता है और उससे शारीरिक संबंध बनाना चाहता है. भोजपुरी समाज के बहुत ही ज्वलंत विषय पर तीखा प्रहार था उस फिल्म में. कथा, पटकथा और संवाद तीनों जबरदस्त थे. भोजपुरी सिनेमा की आजतक की रिलीज हुई फिल्मों में सबसे अच्छी फिल्म मानता हूँ मैं इस फिल्म को. मजरूह सुल्तानपुरी के गीत और चित्रगुप्त के संगीत ने फिल्म में चार चाँद लगा दिए थे. ‘लाली लाली होठवा से बरसे ललइया’, ‘लागी नाहीं छूटे नहीं रामा’, ‘मोरी कलइया सुकुमार हो’, ‘सज के तो गईली रामा पिया के नगरिया’ आदि कर्णप्रिय गीत आज भी बिहार और यूपी जनमानस में लोकसंगीत बनकर बसे हैं.

इस सप्ताह मुम्बई में रिलीज हुई हमनाम फिल्म ‘लागी नाहीं छूटे रामा’ हर स्तर पर उससे कमजोर है. हालाँकि इस फिल्म की कथा बिहार के ही युवा लेखक के मनोज सिंह ने लिखी है. मनोज सिंह पत्रकार रहे हैं, इसलिए बिहारी समाज और संस्कार की भी गहरी समझ है उनमें, लेकिन फिल्म पर उनकी समझ का असर नहीं दिखता है. मनोज कॉमेडी फिल्म लेखक के तौर पर भोजपुरी फिल्म व टीवी इंडस्ट्री में स्थापित हैं. इस फिल्म की कथा में भी कॉमेडी सुर देने की कोशिश है, लेकिन गड़बड़ पटकथा की वजह से फिल्म न कॉमेडी बन पाई है, न फेमिली ड्रामा और न ही एक्शन. सच कहा जाय तो यह समझ में ही नहीं आता है कि फिल्मकार कैसी फिल्म बनाना चाहता है. हीरो पवन सिंह का टेक कॉमेडी है, जबकि दोनों हीरोइनों का टेक इमोशनल ड्रामा, तो विलेन कुणाल सिंह का टेक एक्शन का है. कहानी की  शुरुआत काफी अच्छी है कि मंडप पर हीरो (पवन सिंह) की शादी हो रही है, तभी उसका दोस्त वहाँ आकर उसे बताता है कि जिस लड़की से उसकी शादी हो रही है, वह बेहद कुरूप है और उसके पिता दहेज के लालच में ऎसा जानबूझकर कर रहे हैं. यह सुनते ही हीरो मंडप से भाग जाता है. लेकिन उसके बाद पटकथा पटरी से उतर जाती है और पटकथाकार फिल्मी फॉर्मूलों को व्यवस्थित करने में जुट जाता है. हीरो भागकर मुम्बई आ जाता है और एक होटल में ठहरता है, वहाँ उसकी मुलाकात एक ऎसी लड़की (प्रियंका पंडित) से होती है, जिसे पुलिस ढूँढ रही है. बाद में लड़की तो भाग जाती है, लेकिन हीरो पुलिस द्वारा पकड़ लिया जाता है. दूसरी तरफ डॉन सह राजनेता (कुणाल सिंह) की बेटी (काव्या) से जिस लड़के की शादी होनेवाली है, वो लड़का भी शादी से बचने के लिए भाग जाता है. कुछ गलतफहमी की वजह से पुलिस लॉकअप में बंद पवन सिंह को पकड़कर मंडप पर ले आया जाता है और काव्या से उसकी शादी करा दी जाती है. शादी के बाद डॉन सह राजनेता को पता चलता है कि यह तो दूसरा लड़का है, तब राजनेता अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए इस शादी को तुड़वाना चाहता है. आगे की पूरी फिल्म इसी भाव भूमि पर चलती है. कहानी का आइडिया अच्छा है, लेकिन पटकथा लेखक कहानी के भाव को बिखेर देता है. पटकथा जगदीश शर्मा ने लिखी है, जो कि फिल्म के निर्देशक भी हैं. वह समझ ही नहीं पाए कि कथा का सुर क्या है. दूसरी बड़ी समस्या यह है कि धटनाओं के हर सिक्वेंस को बड़े ही ऊपरी तौर पर समेटा गया है. इस वजह से दृश्यों का जो समवेत प्रभाव उभरना चाहिये था, वह नहीं उभर पाया है. हीरो एक लड़की को मंडप पर छोड़कर भागता है, दूसरी लड़की से वह होटल में मिलता है और तीसरी लड़की से उसकी जबरन शादी करा दी जाती है. फिर उसकी शादी तुड़वाने के पीछे तीसरी लड़की का बाप पड़ा है, जो कि डॉन है. अच्छी पटकथा निश्चित तौर पर फिल्म को नई ऊँचाई दे सकती थी. लव और रेलिशनशिप के कई आयाम सामने थे, लेकिन पटकथा किसी भी आयाम को सही तरीके से उभार नहीं पाती है. डॉन के किरदार में हिंदी फिल्म ‘गदर’ के अमरीश पुरी के चरित्र को घुसाने की वाहियात कोशिश की है. फिल्म की पटकथा इस वजह से भी भटक जाती है कि पटकथा लेखक सही कैरेक्टराइजेशन करने में असफल रहे. फिर पहली लड़की को बिल्कुल ही गायब रखा है, इस वजह से रूप और कुरूप को समझने-समझाने का अच्छा अवसर खो दिया है, जबकि राजकपूर साहब ने तो इसी विषय पर ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’ नाम की फिल्म बनाई थी. आगे चलकर दो लड़कियाँ हीरो के सामने आती हैं- एक से जबरन उसकी शादी हो जाती है और दूसरी उससे प्रेम करने लगती है. लेकिन प्रेम के किसी भी आयाम को सही विस्तार दे पाने में पटकथा लेखक असफल रहे. इस वजह से संवाद भी असरहीन लगते हैं. गीतों के बोल अच्छे हैं, लेकिन संगीतकार कर्णप्रिय संगीत देने में पूरी तरह असफल रहे.

कुल मिलाकर यह फिल्म आम भोजपुरी फिल्मों जैसी ही है. निर्माता निर्देशक बेहद पारिवारिक कॉन्सेप्ट में भी आइटम साँग डालने के कथित भोजपुरिया दबाव से उबर नहीं पाए हैं. एक आइटम साँग, जो कि गाँव में सुखद पारिवारिक मिलन (हालाँकि बाद में पता चलता है कि यह मिलन डॉन का छल था) के अवसर पर होता है, वह तो बिल्कुल ही बेहूदा है.

चरित्रों के सही चित्रांकन न हो पाने की वजह से कलाकार भी अपना द बेस्ट देने में असफल रहे हैं. यहाँ तक कि कुणाल सिंह का प्रभाव भी फीका लगता है.

धनंजय कुमार                    



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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