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राजा बाबू
लीग से हटके, लीक तोड़ती


मंजुल ठाकुर
कथा, पटकथा एवं निर्


मनोज के कुशवाहा
संवाद


























Film Review
राजा बाबू :लीग से हटके,लीक तोड़ती


राजा बाबू :
लीक तोड़ती फिल्म

कथा पटकथा एवं निर्देशन : मंजुल ठाकुर

संवाद : मनोज के कुशवाहा

गीत : प्यारे लाल कवि, आजाद सिंह एवें राजेश मिश्रा

संगीत : छोटे बाबा

छायाकंन : फिरोज खान

एडिटर : संतोष  

निर्माता : अंजना अखिलेश सिंह

भोजपुरी फिल्मों की श्रृंखला में इस सप्ताह रिलीज हुई फिल्म “राजा बाबू” डबल मीनिंग गीतों-संवादों और वल्गर पिक्चराइजेशन से बजबजाते और गंधाते भोजपुरी सिनेमा जगत में जबरदस्त आशा का संचार करती है. यह फिल्म न सिर्फ भोजपुरी फिल्मों पर लगे तमाम दागों को धोती है, बल्कि भोजपुरी फिल्म जगत को उस दिशा में लेकर बढ़ती दिखती है, जिधर ले चलने की इच्छा के तहत नजीर हुसैन, रामायण तिवारी, चित्रगुप्त आदि भोजपुरी प्रेमियों ने भोजपुरी सिनेमा की नींव रखी थी.    

हालाँकि इस फिल्म को देखने से पहले “राजा बाबू” नाम को लेकर मेरे जेहन में यही बात घूम रही थी कि यह फिल्म हिन्दी ‘राजा बाबू’ की नकल होगी और वह भी घटिया नकल! क्योंकि पिछले एक-डेढ़ दशक में भोजपुरी फिल्मों का जो स्वरूप बना है, वह यही कि भोजपुरी फिल्में किसी न किसी हिट हिन्दी फिल्म की घटिया नकल होती है. (“राजा बाबू” गोविंदा – करिजमा कपूर स्टारर हिंदी की हिट फिल्म रही है. यह और बात है कि यह फिल्म भी साउथ की एक हिट फिल्म की नकल थी. और इस कथा को लेकर कई साल पहले ‘राजा भोजपुरिया’ नाम से भोजपुरी में भी फिल्म बन चुकी है.) घटिया इसलिए कि भोजपुरी फिल्मों में लेखन का स्तर बहुत ही फूहड़ और अपरिपक्व है. निर्देशक फिल्म मेकिंग में तमाम तरह के समझौते करता है. फिल्म के निर्माता से लेकर वितरक और सिनेमाहॉल के कर्मचारी तक सबका सारा ध्यान डबल मीनिंग गीतों-संवादों और वल्गर दृश्यों के माध्यम से दर्शकों को सिनेमाहॉल में खीच लाने पर होता है. ‘ससुरा बड़ा पैसेवाला’ से लेकर इस फिल्म से पहले तक यानी पिछले डेढ़ दशकों में भोजपुरी फिल्मों की यही छवि बनी थी कि इनके मुख्य दर्शक रिक्शे ठेले वाले आदि मजदूर क्लास के लोग होते हैं, इसलिए अश्लीलता और फूहड़ता से भरे दृश्य और गीत जरूरी हैं. इस तरह इन डेढ़ दशकों की यात्रा में रिलीज हुई भोजपुरी फिल्मों को देखते हुए लोगों की यह मान्यता पुख्ता हो गई थी कि भोजपुरी फिल्मों की स्थिति को सुधारना मुश्किल है. लेकिन इस फिल्म ने डेढ़ दशक में बनी मान्यताओं को धराशायी किया है. फिल्म में डबल मीनिंग गीत और संवाद नहीं हैं. वल्गर आइटम साँग नहीं हैं. और भोजपुरी फिल्मों की जैसी कि पहले मान्यता थी कि भोजपुरी फिल्म अगर चलाना है, तो कहानी में स्त्री का इमोशन जरूरी है, इसलिए कहानी का परिसर फेमिली ड्रामा होना चाहिये और फिल्म साफ सुथरी होनी चाहिये, ताकि महिलायें फिल्म देखने आ सके. इसलिए महिलाओं को ध्यान में रखकर ही फिल्म की स्क्रिप्ट लिखो. सुखद आश्चर्य यह है कि इस फिल्म में वो तमाम पहलू हैं.

इस फिल्म की कथा-पटकथा मंजुल ठाकुर ने लिखी है. मंजुल ही इस फिल्म के निर्देशक भी हैं. पहले कथा पर ही बात करते हैं- फिल्म की कहानी नई और अद्भुत नहीं हैं. कई हिन्दी फिल्मों को मिलाकर बनाई है, लेकिन पटकथा लिखते वक्त मंजुल ने अपनी कुशलता का परिचय दिया है. वह अच्छी और कमर्शियल पटकथा लेखन के गुर जानते हैं. फिल्म का शुरुआती 45 मिनट का भाग तो कमाल बन गया है. बहुत ही चालाकी और सुन्दरता से फिल्म को ऊँचाई देते हैं. फिल्म हीरो के स्वप्न देखने की आदत से शुरू होती है कि वह ‘मैं बनूँगा करोड़पति’ नामक टीवी प्रोग्राम में शामिल होकर 7 करोड़ रुपये जीतने का सपना पाले हुए है. हालाँकि उसके माता पिता सहित तमाम घरवालों को उसका यह सपना महज सपना लगता है, लेकिन हीरो (दिनेश लाल यादव) को यकीन है कि वह जीतेगा. टीवी प्रोग्राम से उसे बुलावा भी आनेवाला है, लेकिन पिता अपने ‘बिगड़ैल’ बेटे को जवाबदेह बनाने के लिए शादी करवा देना चाहते हैं. दिनेश एक महीने का समय माँगता है. लेकिन बुलावा नहीं आता है. उसकी शादी कर दी जाती है, लेकिन शादी संपन्न होते ही मुम्बई से बुलावा आ जाता है. हीरो के पिता (गोपाल राय) उसे पति धर्म निभाने को कहते हैं, किंतु नवविवाहिता पत्नी (आम्रपाली दुबे) उसे जाने की इजाजत दे देती है.

दिनेश मुम्बई आता है और एक आधुनिक लड़की (मोनालिसा) के जाल में फँस जाता है. उसे उस लड़की से शादी करनी पड़ती है. फिर कहानी दो पत्नी के बीच फँसे पति और उससे उपजी सामाजिक पारिवारिक मान्यताओं को ढोने लगती है. दिलचस्प यह है कि कई हिन्दी फिल्मों की कहानियों के हिस्सों को लेकर आगे बढ़ते रहने के बावजूद फिल्म की पकड़ ढीली नहीं पड़ती है. आखिर तक फिल्म दर्शकों को बाँधे रखती है. यह कमाल है अच्छी पटकथा और कुशल एडिटिंग का.

हालाँकि फिल्म शुरुआत के 45 मिनट में धीरे धीरे जिस ऊँचाई पर आ पहुँची थी, उससे लग रहा था कि लेखक-निर्देशक मंजुल ठाकुर को स्क्रिप्ट की गहरी समझ है, ‘मैं बनूँगा करोड़पति’ प्रोग्राम को बहुत ही खूबसूरती के साथ कहानी का रनवे बनाया था, लेकिन मोनालिसा के साथ जिस तरह का हीरो का वैवाहिक प्रसंग गढ़ा, उससे हीरो का चरित्र यकायक क्रैश कर जाता है और कहानी मसाला फिल्म की तरफ बढ़ जाती है. उसके बाद फिल्म लेखक के हाथ से निकल कर निर्देशक के हाथ में चली जाती है. सुखद यह है कि निर्देशक मंजुल ने भी अपना काम बखूबी किया है. और इसमें उसका भरपूर साथ निभाया है कैमरामैन फिरोज खान और एडिटर संतोष ने.

संवाद लेखक के तौर पर मनोज के कुशवाहा ने जबरदस्त योगदान दिया है. भोजपुरी संस्कृति और बोली की विशेषताओं को खूबसूरती से प्रस्तुत किया है. फिल्म को रोचक बनाने में संवाद की गहरी भूमिका है. गीतकारों ने भी अच्छा काम किया है. सस्ते गीतों की जगह सिचुएशन के मुताबिक अर्थपूर्ण गीत लिखे हैं. संगीतकार छोटे बाबा की धुनें हालाँकि मौलिक नहीं हैं, लेकिन चोरी की धुनों की भी अच्छी ब्लेंडिंग की है. फिल्म को कमजोर नहीं बनाती है.                   

दिनेश लाल यादव, गोपाल राय, समर्थ चतुर्वेदी, संजय पांडे, प्रकाश जैस, आम्रपाली दुबे सबने कमाल काम किया है. दिनेश की माँ ने भी अच्छा काम किया है. अभिनय से लेकर संवाद अदायगी तक उम्दा है, सिर्फ मोनालिसा कमजोर लगती है. इसकी बड़ी वजह यह है कि वह भोजपुरी भाषी नहीं है. संजय पांडे और प्रकाश जैस से निर्देशक ने अब तक की फिल्मों से काफी अलग काम लिया है. ‘मैं बनूँगा करोड़पति’ के एंकर के तौर पर गेस्ट एपियरेंस में पधारे रवि किशन भी शानदार और जानदार लगते हैं. सारे चरित्र रीयल लाइफ के लगते हैं. और इसके लिए बधाई के पात्र हैं मंजुल ठाकुर.     

धनंजय कुमार



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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