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क़र्ज़ विरासत के
चुकाने से चुक गये


























Film Review
क़र्ज़ विरासत के :चुकाने से चुक गये


भोजपुरी फिल्म समीक्षा

कर्ज विरासत के
चुकाने से चुक गये

 

कथा पटकथा और संवाद    :     अरविन्द कुमार

गीत                     :     अरविन्द तिवारी व प्यारेलाल यादव

निर्माता – निर्देशक         :     अनिल सिनकर

संगीत                   :     मधुकर आनन्द

कलाकार                 :     पवन सिंह, प्रियंका पंडित,सुशील सिंह, विनोद मिश्रा,
                                    रोहित सिंह मटरू, ब्रजेश त्रिपाठी, शकीला मजीद और नीलिमा सिंह

सालों बाद ऎसी फिल्म देखने को मिली है, जिसमें कहानी कहने की कोशिश है. हालाँकि फिल्म की शुरुआत भोजपुरी फिल्मों के आम ढर्रे से ही होती है, लेकिन बाद में फिल्म कहानी का ट्रैक पकड़ लेती है. काशी (पवन सिंह) एक लड़की (प्रियंका) से प्यार करता है. लेकिन काशी उसके प्रति अपना प्यार नहीं दर्शाता, क्योंकि उसका मिशन कुछ और है. पार्श्व में एक कहानी है, जो वह अपने भीतर छुपाए हुए है. प्रेमिका के उकसाने पर वह अपने गाँव आता है, जहाँ उसे पता चलता है कि उसके पिता की मृत्यु हो गई है. माँ नौकरानी बनकर काम कर रही है. बहन गरीब शराबी से ब्याह दी गई है, चाय की दुकान चलाकर अपना गुजारा करती है. और इन सब का जिम्मेदार है उसी का बड़ा भाई सुशील सिंह, जिसकी वजह से बचपन में ही उसपर झूठा इल्जाम लगा था और उसे पिता ने घर से निकाल दिया था. बड़ा भाई बदमाश आदमी है. गाँव का मुखिया है और उसकी बदमाश सास उसको अब विधायक बनाना चाहती है. काशी उसके खिलाफ अपनी बहन को चुनाव लड़ाता है. सुशील सिंह जीतने के लिए कई चालें चलता है, लेकिन हर चाल में काशी उसे मात दे देता है और अंततः सुशील चुनाव हार जाता है. उसकी बहन चुनाव जीतती है. सुशील काशी को मारने के लिए आता है. काशी अपने बड़े भाई से मार खाता है, लेकिन माँ पर वह हमला बर्दाश्त नहीं कर पाता है और फिर भाई को मारता है. इसबीच सुशील सिंह की सास (नीलिमा) भी उससे बदला लेने आ जाती है. काशी अपने भाई को बचाता है और कहानी का सुखांत होता है.

कहानी में भोजपुरीपन है. सारे भावनात्मक तार इससे जुड़े हैं, लेकिन कहानी का विस्तार और पटकथा लचर है. कहानी के विस्तार में जिस विश्वसनीयता की जरूरत थी, लेखक अरविंद कुमार उसे रच नहीं पाए हैं. बड़े ही फिल्मी तरीके से कहानी का निबटारा कर दिया है. बड़े भाई यानी सुशील सिंह के चरित्र पर मेहनत किए जाने की जरूरत थी कि वह वैसा क्यों बना...? पिता के चरित्र की गढ़न भी बेहद कमजोर है. हीरोइन का पिता अपनी बेटी की शादी के लिए जैसे लड़के ( धामा वर्मा) का चुनाव करता है, वह भी गड़बड़ है. भोजपुरी समाज में बेटी की शादी बाप की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी गई है. याद कीजिए भोजपुरी की पहली फिल्म “गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो” और नजीर हुसैन का किरदार. हालाँकि भिखारी ठाकुर ने अपने नाटक ‘बेटी बेचवा’ में बाप का खल रूप भी प्रकट किया है, लेकिन इस फिल्म में हीरोइन के पिता के सामने ऎसी कोई मजबूरी भी नहीं थी. सास नीलिमा सिंह भी सुशील को विधायक क्यों बनवाना चाहती है, इसकी भी कोई ठोस वजह नहीं है. बहरहाल पटकथा पर अगर सही तरीके से काम किया जाता, तो यह अच्छी कमर्शियल फिल्म बन सकती थी. संवाद में अरविंद ने भोजपुरी समाज का ख्याल रखा है.

फिल्म में नौ गीत हैं, लेकिन कोई भी गीत असर नहीं जगा पाते. मधुकर संगीत में भोजपुरी रस पैदा करने में असफल रहे हैं.         

निर्माता निर्देशक अनिल सिनकर भोजपुरी भाषी नहीं हैं शायद, मगर निर्देशक के तौर पर दर्शकों को बाँधने में कामयाब रहे हैं. पटकथा अच्छी होती तो और मजा आता.  

पवन सिंह पूर्व की तरह ही हैं. लेकिन सुशील सिंह उम्दा अभिनेता के तौर पर प्रभाव पैदा करते हैं. परदे पर उनकी उपस्थिति और उनका अभिनय दोनों फिल्म को ऊँचाई देता है. और पवन सिंह पर हर जगह भारी पड़ते हैं. सास के किरदार में नीलिमा सिंह ज्यादा लाउड हो गई हैं. जिस तरह का उनका चरित्र दिखाया गया है, उसका सही विस्तार भी नहीं मिल पाया है. कॉमेडी चरित्रों में विनोद मिश्रा और रोहित सिंह मटरू दोनों ने उत्तम काम किया है. विनोद मिश्रा के अभिनय ने चरित्र को इतना सहज और जीवंत बना दिया है कि लगता है किसी अभिनेता को नहीं, वास्तविक चरित्र को ही देख रहे हैं. काश इसी तरह लेखक अन्य मुख्य चरित्रों को भी गढ़ा होता.  

धनंजय कुमार

 

     



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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