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मांझी दी माउंटेन म��
खोदा पहाड़ ....


महेंद्र जाखर
लेखक


केतन मेहता
निर्देशक


























Film Review
Manjhi The Mountain-Man:खोदा पहाड़ ...


माँझी द माउंटेनमैन
खोदा पहाड़.....

पटकथा      :     केतन मेहता एवं जाखर महेन्दर

पटकथा परामर्श     :     अंजुम रजब’अली

शोध व संवाद       :     शहजाद अहमद और वरादराज स्वामी

संवाद परामर्श       :     शैवाल

गीत         :     दीपक रमोला

निर्देशक      :     केतन मेहता

निर्माता      :     नीना लाथ गुप्ता और दीपा साही

संगीत       :     संदेश शांडिल्य.

कलाकार     :     नवाजुद्दीन सिद्दिकी, राधिका आप्टे, पंकज त्रिपाठी, अशर्फुल हक़,

तिग्मांशु धुलिया, गौरव द्विवेदी, पंकज नारायण, सुरेश कुमार हज्जु.  

फिल्म का पहला दृश्य ही फिल्म के नायक दशरथ माँझी के चट्टानी इरादे को बयान कर देता है. बहुत ही प्रभावशाली लगती है शुरुआत, लेकिन उसके बाद के दृश्य वास्तविक दशरथ माँझी के जीवन, उनके समाज और संघर्ष से उतरकर सिनेमाई पटकथा को आगे बढ़ाने में जुट जाते हैं. फिल्म दृश्य दर दृश्य रोचक लगती है, लेकिन छूटता चला जाता है असली दशरथ माँझी. दशरथ माँझी और उसकी पत्नी सह प्रेमिका के प्रणय दृश्य ज्यादा रोमानी और सपनीले लगते हैं. दशरथ माँझी जिस कालवधि और समाज में पले बढ़े, उसमें इस तरह के स्वप्न संभव नहीं. जहाँ दो वक्त की रोटी, तन पर कपड़ा और इंसान होने का सम्मान मिलना दूभर हो, वहाँ ऎसे स्वप्न..,!

ये सपनीले दृश्य फिल्म के दर्शकों को मनोरंजन जरूर देते हैं, वास्तविक दशरथ माँझी के संघर्ष को हल्का बना देते हैं. दशरथ माँझी की जिद के पीछे सिर्फ पत्नी का प्रेम और उसके बिछुड़ने का बिछोह नहीं हो सकता, क्योंकि जिस समाज में दशरथ माँझी जी रहे थे, वहाँ स्त्री के प्रति ऎसे प्रेम की कल्पना भी संभव नहीं है. जीवन को अभिशाप की तरह झेल रहे इंसान के पास प्रेम की फुर्सत कहाँ...?! प्रेम से ज्यादा उनके लिए उत्प्रेरक रहा होगा, समाज की विषमताओं और सामंतवाद के खिलाफ अवचेतन में घुटता विद्रोह...! फिल्म में उनका यह विद्रोही तेवर एक दृश्य में दिखाने की कोशिश है, लेकिन वह बड़ा ही मुखर और फिल्मी है. पटकथा में सामाजिक विषमताओं और सामंतवाद को दिखाया भी गया है, लेकिन सतही और चर्चा भर के तौर पर है. अलग ट्रैक की तरह चलता है और निष्प्रभावी है. यह न तो दशरथ माँझी के काल के समाज को सामने ला पाने में कामयाब है और न ही फिल्म को रोचक बनाने में योगदान कर पाता है.

फिल्म का दूसरा भाग दशरथ माँझी के थोड़ा करीब लगता है, लेकिन मुखिया, उसका बेटा, वीडियो और वन विभाग के कर्मचारी, सूखे की वजह से गाँव छोड़कर भागते लोग फिल्मी ज्यादा लगते हैं. जिस समाज के नायक की कहानी परदे पर दिखाई जा रही है, वह समाज का गणित ज्यादा अमानवीय है.

दशरथ माँझी को पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री ने सही सम्मान दिया था, जब उन्हें पटना बुलाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया था और बिहार का गौरव कहा था. फिल्म में यह दृश्य गुम है. इसके राजनीतिक कारण हो सकते हैं, फिर भी अधूरा सा लगता है, क्योंकि दशरथ माँझी बिहार के सबसे दबे कुचले समाज से आते हैं. अन्दाजा इसी बात से लगाइए उस जाति की पहचान ही चूहे से जुड़ी है. मुसहर यानी वह जाति जो फसल कटने के बाद खेतों में चूहे मारता है और उसके बिल में जमा अनाज को जमा करता है. एक कहावत भी उस अंचल में प्रसिद्ध है-‘ एक लमना धान पर मुसहर नितरैलय.’ मतलब किलो दो किलो धान जमा करके भी वह खुश हो जाता है. दशरथ माँझी उस जाति और समाज के नायक हैं. बाद में बिहार के मुख्यमंत्री बने जीतनराम माँझी उनकी तुलना में बेहद छोटे हैं. दशरथ माँझी पर केतन मेहता जी के मन में फिल्म बनाने की प्रेरणा जगी, तो उसकी वजह भी कहीं न कहीं दशरथ माँझी की संघर्ष कथा रही होगी, जो वास्तविक होकर भी किंवदंती की तरह सामने आती है. फिल्म में वह दशरथ माँझी रुपायित नहीं हो पाये हैं.

फिल्म का संवाद पक्ष बहुत असहज है. वह अंचल मगध का हृदय है, इस नाते संवाद में जो मगहीपन होना चाहिए था, वह नहीं है. नायिका राधिका आप्टे तो छोड़िये नवाजुद्दीन भी सही से नहीं बोल पाए हैं. हालाँकि संवाद में परामर्शदाता के तौर पर चर्चित कथाकार शैवाल जी का नाम टाइटिल में है, शैवाल जी मगहीभाषी भी है, लेकिन उनका प्रभाव नहीं दिखता. ‘दामुल’ याद कीजिए अगर देखी हो तो. प्रकाश झा इस फिल्म को बनाने से कैसे चूक गये, मालूम नहीं.

बहरहाल, अगर आप रीयल दशरथ माँझी के इलाके से नहीं हैं, तो रील में जीते दशरथ माँझी आपका मनोरंजन करते हैं. रीयल दशरथ माँझी के जीवन भर का संघर्ष 2 घंटे की फिल्म में सिमटकर आपका मनोरंजन कर देता है, तो ये सफलता है उस दशरथ माँझी की. वास्तविक दशरथ माँझी अपने इलाके और समाज का मिथ बन चुका है. और यह उसके जीवन की महान उपलब्धि है.

नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने अभिनेता के तौर पर बेजोड़ काम किया है, लेकिन पता नहीं क्यों, मुझे बार बार मनोज वाजपेयी याद आते रहे...! राधिका सुन्दर लगी है और अभिनेत्री के तौर पर भी दिलकश है. मंगरू के रोल में अशर्फुल प्रभावित करते हैं. उसका टोन स्थानीय है. पंकज त्रिपाठी, कई दृश्यों में हैं, लेकिन करने को कुछ खास मिला नहीं है.

संदेश शाडिल्य का संगीत अच्छा है, लेकिन स्थानीय लोकसंगीत को पकड़ने की पता नहीं क्यों कोशिश नहीं की. ‘तीसरी कसम’ याद कीजिए.

धनंजय कुमार

 

 

 

         



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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