1
 


बीन बजाव सँपेरा
फिर वही पुरानी धुन


मनोज कुशवाह
पटकथा संवाद लेखक


विष्णु शंकर वेलू
निर्देशक


























Film Review
बीन बजाव सँपेरा :फिर वही पुरानी धुन


बीन बजाव सँपेरा  
 
कर्णप्रिय धुन नहीं निकल पाई

कथा पटकथा एवं संवाद : मनोज के कुशवाहा

गीत : आजाद सिंह

निर्देशक : विष्णु शंकर वेलू

निर्माता : ऋतेश कुमार सिंह

कलाकार : पवन सिंह, विष्णु शंकर वेलू, ब्रजेश त्रिपाठी, प्रकाश जैस, नीलम पांडे आदि.

“बीन बजाव सँपेरा” इस सप्ताह मुम्बई में रिलीज हुई है. बिहार में पहले रिलीज हो चुकी है और फिल्म से जुड़े लोग बता रहे हैं कि बिहार में इस फिल्म ने अच्छा बिजनेस किया है. हालाँकि मुम्बई के मयूर सिनेमाहॉल में पहले दिन भी दर्शकों का वैसा कोई उत्साह नजर नहीं आया.

फिल्म इच्छाधारी नाग नागिन की सदियों पुरानी कल्पित कहानी पर आधारित है. मणि को हासिल करने के लिए एक दुष्ट साधु इच्छाधारी नाग नागिन की हत्या कर देता है. नाग नागिन का मनुष्य रूप में पुनर्जन्म होता है. नागिन यानी हीरोइन अलग घर में जन्म लेती है और नाग यानी हीरो अलग घर में. इस जन्म में हीरोइन को एक फॉरेस्ट ऑफीसर प्रेम करता है, लेकिन सँपेरे की बीन की आवाज उसे अपनी ओर खींचती है. नाग पंचमी से पहले वाली रात में सुनहरी पूँछ वाले साँप का सपना भी आता है. लेकिन, ऎसा क्यों होता है, उसे नहीं पता. एक दिन उसे पता चल जाता है कि वह पूर्व जन्म में नागिन थी और सँपेरा नाग. उसका प्रेमी इन बातों को फालतू मानता है. कहानी को समसामयिक बनाने के मकसद से कहानीकार मनोज कुशवाहा ने साँपों और अन्य जीवों की स्मगलिंग का ट्रैक जोड़ा है. दुष्ट साधु के अलावा फिल्म का यह दूसरा खल पात्र भी है. लेकिन बावजूद इसके कहानी में नयापन और रोचकता पैदा नहीं हो पाती, क्योंकि इस ट्रैक में भी कोई नयापन नहीं है. कुल मिलाकर कहें तो मनोज कुशवाहा ने कोई नई कहानी नहीं रची है. पुरानी कहानियों को मिलाकर खिचड़ी पकाई है, लेकिन अपरिपक्व पटकथा लेखन की वजह से बेमजा बन गई है. पटकथा बिल्कुल फार्मूले के अनुसार चलती है और इस क्रम में पटकथा कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय पात्रों को धाँसू तरीके से इंट्रोड्यूस करने में राह भटक जाती है और भोजपुरी फिल्मों के टिपिकल फॉर्म में जाकर अटक जाती हैं, जहाँ बेमतलब के गाने और डबल मीनिंग डायलॉग्स लीड ले लेते हैं. इस चक्कर में फिल्म इंटरवल के बाद पूरी तरह अपना इंटरेस्ट खो देती है. मनोज कुशवाहा के संवाद भी चलताऊ ही हैं, तुकबंदी वाले.

निर्देशक विष्णु शंकर वेलू पवन सिंह को लेकर अच्छी कहानी चुनकर अच्छी फिल्म बना सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा को जियान किया है. पवन सिंह काम करते करते अभिनेता के तौर पर निखर गये हैं और पर्दे पर उनकी एपियरेंस भी हीरोइज्म से भरी लगती है. विष्णु शंकर वेलू खुद दूसरे हीरो की भूमिका में हैं और उपस्थिति अच्छी लगती है. हीरोइनें कमजोर लगती हैं. ब्रजेश त्रिपाठी अपनी रूटीन भूमिका में हैं. प्रकाश जैस के पास करने जैसा कुछ नहीं था, और भोजपुरी फिल्मों के विलेन आमतौर पर जिस तरह से लाउड एक्सप्रेशन से भरा अभिनय करते हैं, प्रकाश वह नहीं कर पाया है, क्योंकि वह नेचुरल एक्टर है. उसे गहराई वाली भूमिका ही विलेन के तौर पर स्वीकार करनी चाहिये.

लोकेशन के चयन में भोजपुरी फिल्म वाले अक्सर मात खा जाते हैं. इस फिल्म में भी यह दिखता है. फिल्म के बजट का बड़ा हिस्सा (लगभग आधा) हीरो पर खर्च कर दिया जाता है, और प्रायः भोजपुरी फिल्मों में स्क्रिप्ट और लोकेशन पर खर्च करने के लिए निर्माता के पास बजट ही नहीं होता. लिहाजा, ऎसी बिना दिमाग वाली चालू स्क्रिप्ट और जो मिल गया, उसी लोकेशन पर जैसे तैसे शूटिंग कर देना ही निर्देशक का लक्ष्य हो जाता है. फिल्म की रचनात्मकता और सुन्दरता बजट की कमी की भेंट चढ़ जाती है. यही वजह है कि पिछले साल से भोजपुरी फिल्मों के व्यवसाय और निर्माण में कमी आई है. दर्शकों के बीच भोजपुरी फिल्मों को लेकर उदासीनता दिखने लगी है और बिहार में भी भोजपुरी फिल्मों को रिलीज करनेवाले सिनेमाहॉल कम होते जा रहे हैं. भोजपुरी फिल्मों के स्टारों को पर इस पर विचार करना चाहिये, नहीं तो संभव है, फिर एक बार भोजपुरी फिल्मों के निर्माण पर संकट के बादल छा जाये.    

धनंजय कुमार   



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

Click here to Top