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बाहुबली
पर्दे से आँखे ना हट�


एस एस राजामौली
लेखक - दिग्दर्शक


वि विजेंद्र प्रसाद
कथा


























Movie Review
बाहुबली:शब्दों पर दृश्य भारी


बाहुबली

लेखक : वी विजयेन्द्र प्रसाद, एस एस राजामौली, राहुल कोडा एवं मदन कर्की

निर्देशक : एस एस राजामौली

कैमरा मैन सेंथिल कुमार  

एक्शन : पीटर हैन, कलोइअन वोदेनिकौअरव , ली विट्टकर

संगीत निर्देशक : एम एम किरवनि

निर्माता : शोबू यरलग्द्दा, के राघवेन्द्र राव एवं प्रसाद देवीनेनी

कलाकार : प्रभाष, तमन्ना, राणा दगुबती, सत्यराज, रम्या कृष्णन,नासर आदि.

 

बाहुबली, टाइटिल से तो लगता है कि आज के जमाने के किसी बदमाश नेता की कहानी होगी, लेकिन फिल्म देखने जाने पर पता चलता है कि यह तो राजा-रजवाड़ों के जमाने की फिल्म है. फिल्म की कहानी पूरी तरह काल्पनिक है, लेकिन बड़े ही विश्वसनीय तरीके से यह किसी इतिहास को प्रस्तुत करती प्रतीत होती है. कहानी पर भारतीय महागाथा महाभारत का खूब प्रभाव है. लेकिन चरित्र वहाँ से उठाए गये नहीं हैं.

कहानी एक नवजात शिशु की जान बचाने के संघर्ष से शुरू होती है, जंगल, पहाड़ और अद्भुत झरनों के दृश्यों के साथ फिल्म की शुरुआत होती है. रानी सी एक महिला शिशु को बचाने के लिए संघर्ष करती है और अंतत: अपनी जान देकर उसे बचाने में सफल हो जाती है.

यह शिशु एक राज परिवार का उत्तराधिकारी है, लेकिन उसका षडयंत्रकारी चचेरा दादा और चाचा उसकी हत्या कर देना चाहता है. यह शिशु अपने राज्य से दूर एक गाँव में पलता है, लेकिन उसकी जिज्ञासा (या कहें नियति) बार-बार उसे ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं से बहते झरनों के पास ले जाती है, यशोदा बनकर जिस माँ ने उसे पाला है, वह जानती है कि उसके पार उसकी जान को खतरा है, इसलिये वह बार बार उसे जाने से रोकती है, लेकिन बड़ा होकर वह (शिवा) परी सी सुन्दर एक लड़की के पाश में फँसकर उस पार चला ही जाता है. उस पार जाने के बाद पता चलता है कि अवंतिका नाम की यह लड़की अपनी महारानी को छुड़ाने के लिए संघर्ष कर रही सेना की एक टुकड़ी की एक सिपाही है. नायक शिवा राजमहल में जा पहुँचता है और अपने षडयंत्रकारी चाचा का वध कर कैद की गई रानी माँ को छुड़ाता है. इसी दौरान जब राजा का विश्वासी बहादुर गुलाम कटप्पा से उसकी मुलाकात होती है, तो वह उस देखते ही पहचान लेता है, चूँकि वह अपने राजा पिता बाहुबली का हमशक्ल है. कटप्पा उसके सामने समर्पण कर देता है. शिवा उससे अपना अतीत पूछता है, कटप्पा बताता है कि किस तरह से उसके दादा की अकाल मृत्यु के बाद उसका चचेरा दादा, जो कि अपंग होने की वजह से राजसिंहासन पर बैठने के अयोग्य होने की कुंठा के चलते अपने बेटे को राजा बनाना चाहता था, लेकिन राजमाता यानी उसकी चचेरी दादी किस तरह से उसके पिता को राजा घोषित करती है... शिवा पूछता है कि फिर राजा यानी मेरे पिता की हत्या किसने की तो, कटप्पा इस प्रश्न का उत्तर देता है और फिल्म यहीं समाप्त हो जाती है, इस सूचना के साथ कि अगला भाग देखिये 2016 में.

यह फिल्म पूरी तरह निर्देशक एस एस राजामौली की फिल्म है. विजयेन्द्र प्रसाद की कहानी को जिस सुन्दरता और भव्यता के साथ निर्देशक ने परदे पर उतारा है, वह अद्भुत और अविस्मरणीय है. कुछ पल के लिए भी आँखें परदे से नहीं हटती हैं. पौने तीन घंटे की यह फिल्म वस्तुतः दो भागों में है. पहला भाग प्राकृतिक दृश्यावलियों झरनों, जंगलों आदि से गुजरती हीरो हीरोइन का स्वप्निल प्यार दिखाती राजमहल और राजमहल में पल रहे षडयंत्र तक पहुँचती है, जबकि दूसरा भाग पूरी तरह से युद्ध के दृश्यों से निबद्ध है. पहला भाग रोमांटिक और मोहक है, जबकि दूसरा भाग युद्ध के उन्माद और भावनाओं के आवेग से भारी. निर्देशक ने स्पेशल इफेक्ट्स, पटकथा और एक्शन का सहयोग लेकर बड़ा ही जबरदस्त समां बाँधा है. कैमरा मैन सेंथिल कुमार का भी उन्हें खूब साथ मिला है. एक वाक्य में कहें तो फिल्म में बार-बार शब्दों के संसार पर दृश्यों का संसार भारी पड़ जाता है. संवाद एकाध दृश्य के अलावा कहीं भी अपना असर नहीं छोड़ पाते हैं. पूरी फिल्म को निर्देशक अपने विजन से ऊपर उठाये चलता है. शिव पर जल चढ़ाने से लेकर शिव को झरने के पास पुनर्स्थापित करने तक के दृश्य फिल्म को भारतीय संस्कृति से जोड़ते हैं. हीरो हीरोइन के रामांटिक दृश्यों और गानों में टैटू का भी सुन्दर और मोहक इस्तेमाल किया गया है. नायक शिवा और बाहुबली के रूप में प्रभाष ने अपना सर्वोत्तम आंगिक अभिनय किया है. अवंतिका के रूप में तमन्ना भाटिया, और भल्लाल के रूप में राणा दगुबती ने भी अच्छा अभिनय किया है. कटप्पा के रोल में सत्यराज सबसे अधिक फबते हैं.

मीडिया में पहले से आई खबरों के मुताबिक इस फिल्म के निर्माण में ढाई सौ करोड़ के करीब खर्च हुआ है, खर्च दिखता भी है, लेकिन सबकुछ जबरदस्त होने के बावजूद एक सवाल तो उभरता ही है कि इस फिल्म की प्रासंगिकता क्या है...? क्या लेखक–निर्देशक का उद्देश्य सिर्फ एक ऎडवेंचरस वार फिल्म बनाना था, या आज के समाज से कुछ कहना भी...? इस भाग में वैसा कुछ मैसेज तो नहीं दिखता, शायद अगले भाग में कुछ हो... !   

धनंजय कुमार

 

 

 

 



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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