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Ms. Tanakpur Hazir Ho
Gud ka Gobar Gas


Vinod Kapri
Writer - Director


























Film Review
मिस टनकपुर हाज़िर हो:गुड़ का गोबर गैस!!


मिस टनकपुर हाज़िर हो

गुड़ का गोबर गैस!!  no

FACT – चला छूटुआ आज तुमको देसी असल गाँववाली मिठाई खिलाते हैं. smiley
fact – आप गुड़ की बात कर रहे हैं, है ना भैया? cheeky

FACT – नहीं बचुआ हम गुलगुलों की बात कर रहे हैं..
fact – गुलगुला तो हमका बहुत भात है का बताये. पर गुलगुला बनाना आसान नहीं है, आप पहले बनाये हो कभी? surprise

FACT – अरे चुप कर छुट्टन. पहली बार हैं तो का हुआ, देख अभी यूं बनाते हैं...
fact – भैया हम कहे रहे थे, देखा अब गुड़ भी गया और गुलगुला भी नहीं बना. गुड़ का गोबर crying

FACT scowls at fact angry; fact cringes surprise..

fact – जब कभी हम अच्छी भली चीज़ का सत्यानास कर देते तब हमरी दादी कहती गुड़ का गोबर कर दिया. हम नहीं दादी कहती और वो अब इस दुनिया में भी नहीं है तो आप ग़ुस्सा नहीं कर सकते. डोंट टेक इट अदर वाईज पर हमरा गुड़ और मूड दोनों आप ख़राब कर दिए है भैया.. crying

FACT – सट अप. गोबर के भी कितने फायदे है, जानत हो? चल इसका गोबर गैस बना के दिखाते हैं.. smiley
fact – गुड़ का गोबर काफ़ी नहीं है भैया जों अब गैस भी बनाय रहे हो? frown

किसी देसी सच्ची घटना के गुड़ को लेकर हास्य व्यंग के गुलगुले खिलाने का वादा करने वाली यह film मिस टनकपुर हाज़िर हो महज़ भैंस का गोबर बनकर रह जाती है जिसमे हास्य के नाम पर Double Meaning जोक्स या Toilte Humour और व्यंग के नाम पर दर्द भरा ड्रामा दिखाई देता है.
गुलगुले की मिठास हमे कडवा तेल खिला दे और कड़वाहट का पता भी ना चलने दे तो व्यंग है नहीं तो फिर कोई और genre है drama-tragedy पर व्यंग नहीं.   

Film के Screenplay का विश्लेषण करने का कोई तथ्य नहीं रह जाता क्यूंकि पटकथा लेखन के मूलभूत सूत्रों से यह film बहुत दूर है. ना ही यह कोई बढ़िया हसाती है ना इसका व्यंग कोई कटाक्ष कर पता है. भैंस का रूपक लेकर समाज में स्त्री की स्थिति प्रस्तुत करने की नेक इच्छा तब धरी रह जाती है जब सवा दो घंटो की कहानी गोल गोल वहीं घुमती रहती है. ना plot आगे बढ़ता है ना characters कुछ करते हैं.. हाँ रोते धोते है, आपस में मन की भड़ास निकालते है पर उससे ज्यादा कुछ नहीं होता. First Half में, Film set-up में बर्बाद हो जाती है और second half में भी फिर कुछ विशेष नहीं होता. घटनाएँ होती है पर मौत जैसी गंभीर घटनाओ से भी ना plot पर कोई खास फरक पड़ता है ना चरित्रों पर. जितनी बेबस बेजुबान भैंस है उससे भी बेबस film का हीरो नज़र आता है, शुरू से अंत तक.

संक्षेप में plot यूँ है कि film का नायक अर्जुन लोगों का भला करने के चक्कर में, नपुंसक मुखिया की मायूस पत्नी से दिल लगा बैठता है. एक दिन वो रंगे हाथों पकड़ा जाता है तो मुखिया अपनी झूठी इज्ज़त बचने के लिए अर्जुन पर उसकी भैंस का बलात्कार करने का इल्ज़ाम लगाकर उसकी ज़िन्दगी बर्बाद कर देता है. अव्वल तो अर्जुन को ऐसा अनैतिक सम्बन्ध करने की क्या ज़रूरत होती है यह समझ नहीं पड़ता. अर्जुन का ना तो वैसा चरित्र दीखता है ना ही वैसा जुनूनी प्यार दोनों में नज़र आता है. शायद बाकि फालतू टाइमपास करने के बजाये उन दोनों में पनपते प्यार को दिखाया जाता तो बात हजम हो सकती थी. उसके बाद एक बार पुलिस के हत्थे चढ़ने के बाद अर्जुन भैंस से भी बदतर हो जाता है. चुपचाप जो हो रहा है सहता जाता है. मुखिया की पत्नी भी कुछ नहीं बोल पाती और भैंस तो फिर भी भैंस है. यह नहीं की Realistic ट्रीटमेंट समस्या है, पर film रुक सी जाती है और फिर हास्य व्यंग भी खासा नहीं है. अंत में जबरन एक झटके में, बिना कोई तर्क और तरीके के film को क्लाइमेक्स में झोंक दिया जाता है.  

Film के लेखक विनोद कापरीजी को अपने mileu की अच्छी जानकारी और समझ है जिसे किरदारों के नामों में, shots के details, framing में बखूबी इस्तेमाल किया हैं पर film की पकड़ उसकी script से बनती है जहा MTHH ढ़ीली है.

अलावा इसके व्यंग को शायद हँसते हँसाते रुलाना चाहिए वो बात यह film नहीं कर पाती है. हँसाती है और रुलाती है पर अलग अलग से. जब हँसाती है, जो बहरहाल बहुत सिमित बार होता है, तब कोई गंभीर बात नहीं कहती और जब गंभीर बात कहती है तो रोते धोते वहीं शायद ये film अपने genre से बाहर  नज़र आती है.

रूपक अच्छा है, कुछ onliners अच्छे हैं, पर film original सच्ची घटना को कही आगे नहीं ले जा पाती है, जो व्यंग घटना में पहले ही है उससे ज्यादा आपको कुछ नहीं मिलता.     

FOX Studio इस film के निर्माताओं में से एक है. मटरू की बिजली का मंडोला भी FOX ने ही बनायीं थी और उसमे भी गुलाबी भैंस की कुछ कॉमेडी थी. इस film में भी भैंस की कॉमेडी की कोशिश है. दोनों फ़िल्मों की असफलता को देखकर लगता है शायद फॉक्स को भैंस लकी नहीं साबित हो रही है तो उन्हें भी गोमाता का रुख करना चाहिए.. wink

FACT – तो मतलब मिस टनकपुर केस की तारीख को मिस कर दे..?
fact – केस ही डिसमिस कर दो भैया डिसमिस. डोंट टेक इट अदर वाईज..devil

  



   संजय शर्मा

Critic who loves to appreciate.

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