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Juhi Chaturvedi
Writer


Piku
दिलचस्प फ़िल्म


Shoojit Sircar
Director


























Another Take
Piku:हल्की फ़ुल्की मनोरंजक


पिकू

लेखिका जूही चतुर्वेदी 

निर्देशक सुजीत सिरकार

एडिटर : चन्द्रशेखर प्रजापति

संगीत अनुपम रॉय

सिनेमैटोग्राफर : कमलजीत नेगी

इस सप्ताह रिलीज हुई हिन्दी फिल्मों में “पिकू” बड़ी ही दिलचस्प फिल्म है. पिकू फिल्म की नायिका का नाम है. कहानी नायिका और उसके पिता भाष्कर बनर्जी के इर्द गिर्द घूमती है और पिता पुत्री के रिश्ते को रोचक, लेकिन गंभीर तरीके से विश्लेषित करती है. कहानी क्या है... सुनना चाहेंगे, तो सुनाना जरा मुश्किल है, क्योंकि आमतौर पर हिन्दी फिल्मों में जिस तरह की कहानी हुआ करती है, वैसा कोई ठोस कथा तत्व नहीं है इस कहानी में. लेकिन रिश्तों का बड़ा बारीक विश्लेषण है. न सिर्फ बाप बेटी के रिश्तों को सुन्दरता से गढ़ा गया है, साली के चरित्र को भी बड़े ही भारतीय तरीके से बुना गया है. जीजा साली की नोंकझोंक के माध्यम से उस चरित्र का भी बड़ा सुन्दर बिंब खड़ा किया है, जो फिल्म में साकार रूप में नहीं है. यानी पिकू की माँ का चरित्र जो कि फिल्म शुरू होने से पहले ही स्वर्गवासी हो सकी है. बहरहाल पटकथा इतनी सहज और मजेदार है कि कहानी में उलझने के बजाय आप फिल्म के साथ बहते चले जाते हैं. हल्की फुल्की कहानी को कितनी ऊँचाई दी जा सकती है, यह इस फिल्म से सीखा जा सकता है. बासु चटर्जी और हृषिकेश मुखर्जी की फिल्मों की बरबस याद आ जाती है, लेकिन पटकथा बिल्कुल ही अलग और नए अंदाज संपन्न है. हालाँकि पटकथा के तकनीकी पक्ष पर भी बहस करने उतरेंगे, तो कई कमियाँ आप गिन गिना सकते हैं. कुछ लोगों को लग सकता है कि पटकथाकार ने कई टुकड़े बेवजह जोड़ रखे हैं. और फिल्म को जब चाहा क्लाइमेक्स की तरफ मोड़ दिया है. फिल्म के आखिरी दो दृश्य और पिकू को दो लड़कों के बीच फ़ँसाकर रखना मुझे भी अच्छा नहीं लगता, लेकिन बावजूद इसके फिल्म बांग्ला परिवेश और पात्रों को बड़ी ही निकटता से पर्दे पर प्रकट करती है. शुरुआत से ही फिल्म का स्वभाव कॉमेडी का है, लेकिन कॉमेडी फूहड़ तरीके से कहने की बजाय, जैसा कि पिछले कुछ सालों से बड़ी हिन्दी फिल्मों में देखने को मिल रहा है, बड़े ही स्वाभाविक और प्राकृतिक तरीके से कही गई है. इसमें सहज और नेचुरल संवाद का भी जबरदस्त योगदान है.

बहरहाल फिल्म की लेखिका जूही चतुर्वेदी ने तो अपना काम बड़े ही शानदार तरीके से किया ही है, निर्देशक सूजित सिरकार ने भी पटकथा को इतने सहज तरीके से प्रस्तुत किया है कि कहीं भी सिनेमाघर में दर्शक की तन्द्रा नहीं टूटने पाती है. दर्शक मुग्ध होकर साथ चलता चला जाता है. सिनेमैटोग्राफर कमलजीत नेगी और एडिटर चन्द्रशेखर प्रजापति ने भी फिल्म को सुन्दर और मनमोहक बनाने में निर्देशक का खूब साथ दिया है.

अभिनय के स्तर पर यह पिकू की शीर्षक भूमिका में दीपिका पादुकोण ने कमाल काम किया है. सहज और सुन्दर तो लगी ही है, पिकू के विभिन्न चारित्रिक आयामों को भी बड़ी ही कुशलता से प्रस्तुत किया है. दृश्य दर दृश्य पिकू के चरित्र की अलग अलग परतें खोलती है दीपिका. अमिताभ बच्चन के बारे में क्या कहना! वह बेहद सीजंड एक्टर हैं. जिस चरित्र में ढालिये, सहजता से ढल जाते हैं और चरित्र के आंतरिक पहलुओं को भी पर्दे पर अपने भावाभिव्यक्तियों से प्रकट कर देते हैं. इरफान और मौसमी चटर्जी फिल्म में सहकलाकार के तौर हैं, लेकिन मुख्य अभिनेताओं से कहीं कमजोर नहीं हैं.

फिल्म में अनुपम राय का संगीत है, लेकिन अपनी उपस्थिति उस स्तर पर दर्ज नहीं करा पाते, जिस स्तर पर फिल्म चलती है.

धनंजय कुमार



   धनंजय कुमार

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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