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Mangal Phera
Horror or Horrible?


























Film Review
मंगल फेरा:हॉरर नहीं हॉरिबल


मंगल फेरा
हॉरर नहीं हॉरिबल

कथा : दशरथ राठोड़

पटकथा श्रीधर शेट्टी- पीयूष शाह

संवाद : मो रफी खान

गीत : मुन्ना दुबे, राकेश निराला, दशरथ राठोड़

निर्देशक : श्रीधर शेट्टी

संगीत राकेश त्रिवेदी

निर्माता : गायत्री राठोड़

कलाकार : विनय आनंद,अपूर्वा बिट, दशरथ राठोड़,श्री कंकिणी, उदय श्रीवास्तव, रोहित सिंह मटरू

मुंबई के सिनेमाघरों में भोजपुरी फिल्मों की श्रृंखला में इस सप्ताह “मंगल फेरा” रिलीज हुई है. फिल्म का कथानक हॉरर श्रेणी का है. फिल्म की कथा दशरथ राठोड़ ने लिखी है. दशरथ भोजपुरी फिल्मों के नियमित लेखक नहीं है, इसलिए कथानक में मौजूदा भोजपुरीपन नहीं है. न तो हीरोइन की देह पर आकर्षित होनेवाला हीरो है और न ही आइटम साँग पर थिरकनेवाला विलेन. कहानी का ताना बाना अभागिन लड़की, मंगल दोष और भूत को आधार बनाकर गढ़ा गया है. फिल्म की कहानी में नयापन नहीं है. उस पर से फिल्म की पटकथा भी पुराने ढर्रे पर ही जैसे तैसे चलती है. दृश्य इतने ढीले और उबाऊ हैं कि फिल्म इंटरवल तक पहुँचते पहुँचते दर्शकों के सर में दर्द भर देती है. फिल्म हॉरर है, लेकिन वास्तव में हॉरिबल है. फिल्म गति बेहद धीमी है, इसलिए झेलना और भी बोझिल हो जाता है.

      फिल्म की नायिका की कुंडली में मंगल दोष है, इसलिए शादी से पहले ही दो दूल्हे मौत की भेंट चढ़ चुके हैं. माँ भी उसे अभागिन कहकर कोसती है, इसलिए नायिका रात में आत्महत्या करने के ख्याल से घर से निकलती है और नदी में कूद जाती है, लेकिन अचानक हीरो मोटरसाइकिल से आ जाता है और उसे पानी से निकालता है. हीरो हीरोइन को बचा लेता है. दोनों प्यार करने लगते हैं. हीरो का पिता ठाकुर है, पहले तो वह पूरी राजपूती शान के अनुरूप शादी से इंकार कर देता है, लेकिन बाद में मसखरे की तरह स्वीकृति दे देता है. समझना मुश्किल है कि हीरो का बाप (उदय श्रीवास्तव) विलेन है या कॉमेडियन...? खैर, मारिये गोली बाप को, हीरो हीरोइन की शादी से पहले पंडित विलेन की तरह प्रकट होता है और बताता है कि लड़की को मंगल दोष है, जिसका समाधान यह है कि लडकी की शादी पहले बरगद से करवायी जाय, फिर एक साल बाद वास्तविक वर यानी हीरो से करवायी जाय. वैसा ही होता है, बरगद के पेड़ के साथ लड़की की शादी करवायी जाती है, लेकिन अब बरगद का भूत उस लड़की के पीछे पड़ जाता है. भूत हीरो को रास्ते से हटाने के लिए उसके मन्दबुद्धि भाई के शरीर का इस्तेमाल करता है. भूत उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है और फिर कहानी पारिवारिक होते हुए अपनी गति को प्राप्त हो जाती है.

फिल्म के गीत वल्गर नहीं हैं, लेकिन पुराने हिंदी गानों की धुनों पर आधारित हैं. पटकथा की तरह गाने भी स्लो हैं. गानों की प्लेसंग भी मनचाही है, जब मन किया गीत डाल दिया. निर्देशन भी उसी स्तर का है. अभिनेता विनय आनंद का दुर्भाग्य है कि अच्छा अभिनेता होने के बाद भी उसे अच्छी फिल्में नहीं मिलतीं. या यह भी कहा जा सकता है कि उसे अच्छी फिल्म चुनने की समझ नहीं है.

कुल मिलाकर यह फिल्म पैसों की बर्बादी है, प्रोड्यूसर के पैसों की और दर्शकों के पैसों की भी.

धनंजय कुमार



   Dhananjay Kumar

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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