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पंडित जी बताईं ना 2
अच्छा प्रयास


























Film Review
पंडित जी बताईं ना बिया:अच्छा प्रयास


                पंडित जी बताईं ना बियाह कब होई 2 :
                           अच्छा प्रयास

 

कथा, पटकथा व संवाद : कुन्दन शुक्ला

गीत : कुन्दन शुक्ला, प्यारेलाल यादव

निर्देशक : प्रशांत जम्मूवाला

निर्माता : रवि किशन एवं समीर त्रिपाठी

कलाकार : रवि किशन, सृंजिनी, अवधेश मिश्रा, सुशील सिंह, दीपक सिन्हा, राजा मोदी,एन के सिंह आदि

 

      भोजपुरी फिल्मों की श्रृंखला में “पंडित जी बताईं ना बियाह कब होई 2” इस सप्ताह मुम्बई में रिलीज हुई है. भोजपुरी फिल्मों में भी अब पार्ट टू की बीमारी लग रही है... इस फिल्म का कथानक के स्तर पर पिछली फिल्म ‘पंडित जी बताई ना बियाह कब होई’ से हालाँकि कोई संबंध नहीं है, लेकिन रवि किशन की हिट भोजपुरी फिल्मों में सबसे बढ़िया बिजनेस इसी फिल्म ने किया था, शायद इसी को कैश करने की मंशा के तहत इसका नाम रखा गया हो. हालाँकि यह फिल्म पिछली फिल्म की तुलना में काफी अच्छी है. खासकर कथानक के स्तर पर तो यह फिल्म बहुत ही हटकर और तारीफ के योग्य है. ‘ससुरा बड़ा पैसेवाला’ से परवान चढ़ी इस दौर की भोजपुरी फिल्मों का मूल विषय स्त्री देह का फूहड़ शोषण रहा है, लेकिन इस फिल्म में हीरोइन को बेहतर और ग्लैमरस तरीके से दिखाने की कोशिश है. यह फिल्म एक सुन्दर लव स्टोरी बनाने का प्रयास है.

लेखक कुन्दन शुक्ला की कहानी अच्छी है. फिल्म का आधार प्रेम कहानी है. बुट्टन यादव (रवि किशन) अपने पिता की मौत के बाद लॉ की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाता है और वह सायकिल ठीक करने की दुकान खोल लेता है. इस बीच उसका प्यार स्कूल टीचर (सृंजनी) से हो जाता है, लेकिन उसके अमीर बाप को जब यह खबर मिलती है, तो वह नाराज हो जाता है और बुट्टन से कहता है कि पहले उसकी बेटी को रखने लायक अपनी औकात बनाए, एक अच्छा घर तो बनाए. बुट्टन गाँव की अपनी एक कट्ठा जमीन के बल पर कि उसे बेचकर चाचा उसे जो हिस्से की रकम देगा, उससे घर बना लेगा, यह शर्त्त कुबूल कर लेता है, लेकिन चाचा उसे धोखा दे देता है और उसके हिस्से की रकम हड़प लेता है. बुट्टन तब बड़ा निराश होता है और गाँव की ग्रामीण बैंक की शाखा में डाका डालने की योजना बनाता है, इसमें वह दो और ग्रामीण को शामिल करता है जो अपनी गरीबी से परेशान हैं. यहाँ तक तो कहानी फॉर्मूला फिल्मों से प्रेरित है, लेकिन डाका डालने की घटना के बाद कहानी रोचक टर्न लेती है. पुलिस स्टेशन में बैंक मैनेजर नौ लाख रुपए की लूट की रिपोर्ट लिखवाता है, जबकि वास्तव में १६ करोड़ की लूट हुई है. यह एक दिलचस्प twist ज़रूर है पर पुर्णतः मौलिक नहीं है. १९७३ में एक अंग्रेज़ी film आयी थी Charley Varrick जिसका plot इसी Premise पर  based था. अंग्रेज़ी film में extra वाला cash किसी Don का होता है हमारी भोजपुरी film में ये अतिरिक्त रुपया विधायक (अवधेश मिश्रा) का काला धन है. खैर जब विधायक को पता चलता है कि बुट्टन ने डाका डाला है, तो वो उसे धमका कर पैसे वसूलने की कोशिश करता है, लेकिन बुट्टन ज्यादा चालाक निकलता है और पुलिस स्टेशन में सरेंडर कर देता है. इस तरह वह अपने सीधे सादे दोस्तों को डकैती कांड में फँसने से बचा लेता है. विधायक अपने रुपए वापस हासिल कर लेने के बाद बुट्टन की हत्या का प्लान बनाता है, लेकिन चालाक बुट्टन यहाँ भी विधायक को मात देता है और विधायक के पीए को एक करोड़ रुपए देकर फोड़ लेता है. सुपारी किलर बुट्टन की जगह विधायक को शूट कर मार डालता है. बुट्टन कोर्ट में भी अपनी चालाकी दिखाता है. बैंक मैनेजर ने 9 लाख की लूट की रिपोर्ट लिखवाई थी, जबकि पुलिस 50 लाख रुपए बरामद कर पेश करती है. इस वजह से विधायक के काला धन को मैनेज करने के जुर्म में बुट्टन का बदमाश सरपंच चाचा और उसकी प्रेमिका का बदमाश पटवारी पिता को न्यायालय 5-5 साल की कैद सुनाता है और बुट्टन को ईमानदारी से अपना सारा गुनाह स्वीकार कर लेने के पारितोषिक स्वरूप 6 महीने की कैद होती है. और 6 महीने की कैद से छूटने के बाद अपनी प्रेमिका से शादी करता है.

फिल्म की कहानी को समसामयिक बनाने में लेखक की दृष्टि दिखती है, लेकिन पटकथा लिखते हुए कुन्दन शुक्ला अपनी अयोग्यता साबित कर देते हैं कि उन्हें पटकथा लिखने की कला नहीं मालूम है. इस वजह से एक अच्छी कहानी, जिस पर अच्छी फिल्म बनाई जा सकती थी, बेअसर हो जाती है. हीरोइन के पिता के साथ समय खराब करने के बजाय विधायक की पृष्ठभूमि गढ़ने में अपनी लेखकीय दृष्टि लगाते तो फिल्म बेहतर होती. रवि के दोस्त मिस्त्री (दीपक सिन्हा) और जुगाड़ के चरित्र को और विश्वसनीय बनाये जाने की जरूरत थी. हालाँकि दीपक सिन्हा का पुलिस स्टेशन से पत्थर चुराकर नदी में फेंक आने का दृश्य अदभुत है. लेकिन... ! संवाद भी किसी और योग्य लेखक से लिखवाना चाहिए था.

फिर भी चूँकि फिल्मकार की कोशिश आम भोजपुरी फिल्मों से हटकर एक अच्छी और सेंसिबल फिल्म बनाने की है, इसलिए यह फिल्म बाकी भोजपुरी फिल्मों से कई गुना ऊपर है. निश्चित तौर पर अभिनेता रवि किशन की तड़प वजह है इसके पीछे. श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकार के साथ काम कर चुके रवि भारतीय सिनेमा में भोजपुरी अभिनेता के तौर पर जाने जाते हैं, ऎसे में उन्हें भोजपुरी फिल्मों की फूहड़ता और दयनीयता जरूर शर्मसार और निराश करती होगी. शायद इसी वजह से इस फिल्म के निर्माण का भार अपने कंधे पर लिया है. रवि को चाहिए था कि सिर्फ कहानी नहीं, पूरी स्क्रिप्ट अच्छी लिखवाते.

निर्देशक प्रशांत जम्मूवाला भी पटकथा लेखक और संवाद लेखक की तरह फिल्म की कमजोर कड़ी हैं. वह फिल्म को स्तरीय बनाने में जरा भी योगदान नहीं कर पाते हैं. गीतकार प्यारेलाल यादव और कुन्दन शुक्ला के खासकर रोमांटिक गीत सुनने में अच्छे लगते हैं. संगीतकार ने अलग प्रयास किया है, मगर बहुत कर्णप्रिय बनाने में सफल नहीं हो पाए हैं.

अभिनेता के तौर पर रवि किशन बेहद फ्रेश और परिपक्व लगते हैं. गरिमामय और प्यारे से दिखते हैं इस फिल्म में. हीरोइन के तौर पर सृंजनी मिसकास्ट है. वह खेत की आरी पर चलने वाली गाँव की लड़की के बजाय रैंप पर चलनेवाली मॉडल लगती है. हालाँकि उसने रवि के साथ बेहद सपोर्टिव अप्रोच पूरी फिल्म में बनाये रखा है और उसकी मेहनत दिखती भी है, लेकिन..! अवधेश मिश्रा और सुशील सिंह के पास अभिनय करने जैसा कुछ था ही नहीं, लेकिन दोनों की उपस्थिति फिल्म को ऊँचाई देती है. सुशील सिंह को तो पूरी तरफ वेस्ट किया गया है... जबकि वह भोजपुरी सिनेमा के जानदार अभिनेता हैं. दीपक सिन्हा तो मंजे हुए अभिनेता हैं ही, जुगाड़ की भूमिका निभानेवाले कलाकार ने भी अच्छा काम किया है.

कुल मिलाकर भोजपुरी फिल्मों की लड़ी में यह हीरे की तरह है... अनतराशा हीरा!

हा डिजाईन की प्रेरणा हलकी फुल्की बाहर से भले ही ली हो लेकिन भोजपुरी फ़िल्मों की श्रृंखला में फ़िर भी यह एक सराहनीय film है.  

 

धनंजय कुमार   



   Dhananjay Kumar

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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