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तू मेरा हीरो
एक और कमज़ोर कड़ी


























Film Review
तू मेरा हीरो:एक और कमजोर कड़ी


तू मेरा हीरो : एक और कमजोर कड़ी

कथाकार – निर्देशक : रमाशंकर

पटकथा : रमाशंकर – अरविन्द तिवारी

संवाद : अरविन्द तिवारी

गीत : प्यारेलाल यादव, अरविन्द तिवारी, आजाद सिंह और जाहिद अख्तर

संगीत : घुंघरू

निर्माता : दीपक जैन

कलाकार : खेसारी लाल, रितिका, संजय वर्मा, माया यादव, श्रद्धा नवल, समर्थ चतुर्वेदी, जे पी सिंह, उमेश सिंह, संजय पाण्डे आदि

 

मुम्बई में इस सप्ताह जो भोजपुरी फिल्म रिलीज हुई है, उसका नाम है “तू मेरा हीरो.“  जैसे पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं, वैसे ही फिल्म के टाइटिल से पता लग जाता है कि कैसी फिल्म होगी. जो फिल्मकार एक टाइटिल तक नहीं सोच सकता, वो कैसी फिल्म बना सकता है ? जबकि फिल्म का लेखक ही निर्देशक है. निर्देशक रमाशंकर ने अपनी ही कहानी पर अरविन्द तिवारी के साथ मिलकर पटकथा लिखी है. लेकिन दोनों की युगलबंदी भी पटकथा में कोई रोचकता पैदा नहीं कर पाती है. मुंबई के पब से शुरू हुई फिल्म गाँव जाती है और शहरी लड़कियों के प्रति गाँववालों के संकीर्ण सोच में उलझ जाती है. हीरो गोविंद (खेसारीलाल) जो कि ठाकुर साहब का भक्त नौकर है, वह खुद शहर की लड़की के बारे में गंदे ख्याल रखता है. एक संवाद सुनिए, “ बिना परदा के खिड़की और शहर की लड़की एक जैसी होती है.” लड़कियों के बारे में इस तरह के ओछे ख्यालात सिर्फ इसी फिल्म में नहीं हैं, इस दौर की लगभग सभी भोजपुरी फिल्मों में लड़कियों को इसी तरह के गंदे और लिजलिजे सोच के साथ देखा और प्रस्तुत किया जाता रहा है. हीरो अपने दस लफंगे दोस्तों के साथ लड़की के साथ भद्दे तरीके से छेड़छाड़ करता है, गाना गाता है. फिर उस लड़की से उसे प्यार हो जाता है और फिर वही लफंगा सोच वाला हीरो, लड़की को कैसे कपड़े पहनना चाहिए, की नसीहत देने लगता है. इंटरवल तक फिल्म गाँव के नौकर हीरो का शहर की हीरोइन के साथ प्यार करवाने में खर्च हो जाती है, उसके बाद कहानी फेमिली ड्रामा की तरफ मुड़ती है. यह ट्रैक भी बड़ा बनावटी है. अटपटे सीन और सतही प्रस्तुति. अरविंद तिवारी के संवाद भी उसी स्तर के हैं.

फिल्म का गीत-संगीत पक्ष भी बड़ा उबाऊ और हल्का है. संगीतकार घुंघरू संगीत के नाम पर शोर पैदा करते हैं. और गीतकारों ने फिल्म को चालू बनाने में पूरी मदद की है.

खेसारी लाल ने अभिनय में अपने आपको जरूर सुधारा है, लेकिन फिल्म और अलबम का अंतर समझना चाहिए. हीरोइन रितिका के लिए मौका बढ़िया था, मगर असर नहीं जमा पाई. संजय पांडे भोजपुरी फिल्मों के आवश्यक अभिनेता के तौर पर दिख रहे हैं, अच्छे अभिनेता भी हैं वह, लेकिन अपने रोल और चरित्र पर ध्यान नहीं दिया, तो स्टीरियोटाइप हो जाएंगे. श्रद्धा नवल और समर्थ चतुर्वेदी को वेस्ट किया गया है. संजय वर्मा को अभिनय आता है, मगर लेखक को कॉमेडी कैरेक्टर गढ़ना आए तब तो. क्या कॉमेडियन को थप्पड़ से मारने और हगने, मूतने और पादने के दृश्य दिखाने से कॉमेडी पैदा होती है?   

भोजपुरी फिल्में रिलीज करनेवाले सिनेमाघर भी भोजपुरी फिल्मों की दयनीयता की कहानी बता देते हैं. गर्मी से तपते सिनेमाघर खुलेआम कानून की धज्जियाँ उड़ाते हैं, लेकिन चूँकि यहाँ फिल्म देखने के लिए मजदूर क्लास के लोग आते हैं, इसलिए किसी का ध्यान इस तरफ नहीं है कि सिनेमाघर में साफ-सुथरे शौचालय और पेशाबघर भी होने चाहिएँ. एसी की कौन कौन पूछे ? सिनेमहॉल के स्टाफ बताते हैं, “भोजपुरी देखनेवाले उस लायक नहीं हैं, जहाँ बैठेंगे, वहीं थूकेंगे, कुर्सियों पर पैर रखकर बैठेंगे.... जानवर की तरह बिहैव करते हैं. हम चाहते हैं, सिनेमाहॉल साफ सुथरा रहे, मगर दर्शक ही उस लायक नहीं हैं.” भोजपुरी फिल्मकार सुन रहे हैं?

फिल्मकारों का कहना है कि दर्शक जैसी फिल्म देखना चाहते हैं, हम वैसी ही फिल्म बनाते हैं. उन्हें इसी तरह की फिल्मों से मनोरंजन मिलता है. क्या सचमुच इस तरह की फिल्में मनोरंजन पैदा करती हैं?

धनंजय कुमार

   

 

 



   धनंजय कुमार

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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