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विजयपथ
नये पथ की आशा


























Film Review
विजयपथ:नये पथ की आशा


भोजपुरी फिल्म

विजयपथ : इस तरह की फिल्मों से निकल सकता है नया रास्ता

लेखक : लालजी यादव

गीतकार : प्यारेलाल यादव, श्याम देहाती, संतोष पुरी 

निर्देशक : संजीव बोहरपी

निर्मात्री : शाहजहाँ शेख

कलाकार : विजय वर्मा, अर्चना सिंह, आदित्य, आनन्द मोहन, विनोद मिश्रा, संजय पाण्डे

 

मुंबई के सिनेमाघर में इस सप्ताह रिलीज हुई भोजपुरी फिल्म का नाम है “विजयपथ”. फिल्म के कथा, पटकथा और संवाद, तीनों लालजी यादव ने लिखे हैं. कहानी में कोई नयापन नहीं है, फिर भी फॉर्मूलों को फूहड़ता से बचाकर इस्तेमाल किया गया है. फिल्म कहानी कहने की कोशिश है. हालाँकि शुरुआत में फिल्म की पटकथा बेहद बेजान और नीरस है, साथ ही, लंठई को बढ़ानेवाली भी लगती है, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, रोचक होने लगती है और सिनेमाघर में बैठे दर्शकों को मजा आने लगता है. फिल्म यादगार तो नहीं है, लेकिन जिस तरह की फिल्में भोजपुरी में बनाई जा रही हैं, फूहड़ और विकृत सोच से भरी, उनमें यह अच्छी है. पटकथा को और तार्किक बनाकर फिल्म और मनोरंजक बनाई जा सकती थी. संवाद अच्छे नहीं हैं.

गीतकार प्यारेलाल यादव, श्याम देहाती और संतोष पुरी ने कोई उल्लेखनीय गीत नहीं लिखे हैं. सब चलताऊ हैं. बधाई के पात्र फिर भी हैं कि वल्गर नहीं हुए हैं. गीतकार श्याम देहाती ने ही संगीत भी दिया है... दो धुनें हिन्दी गानों से उड़ाई गई हैं, बाकी भोजपुरी में आजमाई जा चुकी हैं. फिर भी फिल्म को गति देने में सहायक हैं, यह श्याम देहाती की उपलब्धि है.

निर्देशक संजीव बोहरपी की कामयाबी यह है कि ढीली और नीरस शुरुआत वाली फिल्म को संभाल लिया है... जैसी पटकथा है, उससे बेहतर पिक्चराइजेशन करके दिखाया है. इसमें उनका भरपूर साथ दिया है कलाकारों ने. विजय वर्मा और उसके साथी अभिनेता (नाम मालूम नहीं) ने नए होने के बावजूद अच्छा काम किया है. अगर पटकथा बेहतर होती तो और कमाल करते. दूसरा हीरो आदित्य भी अच्छा है. हीरोइन अर्चना सिंह ने भी ठीक ही किया है, मगर उसकी सहेली की भूमिका निभानेवाली लड़की में ज्यादा संभावना दिखती है. दूसरी हीरोइन ठीक है. ताजगी है. छोटी सी भूमिका में विनोद मिश्रा उपस्थिति जता देते हैं तेल लगाके.

आनंद मोहन भोजपुरी की उपलब्धि हैं. कमाल संभानाएँ हैं उनमें, लेकिन लेखक ने उनका बेहतर इस्तेमाल नहीं किया है. आनन्द अपनी विशेष अभिनय शैली से अपने आपको अलग और मौलिक बना लेते हैं. भोजपुरी गानों के अलबमों में तो उनका खूब इस्तेमाल हुआ है, मगर टाइप्ड बनाकर. यह उस कलाकार का दुर्भाग्य है कि उसे सही जगह नहीं मिली है अबतक. पूरी तरह भोजपुरिया है वह आदमी, जरा भी बनावटी नहीं. विलेन की भूमिका में संजय पाण्डे बेहतर हैं. उनमें भी काफी संभावनाएँ हैं, अगर अच्छा रोल मिले, अच्छी स्क्रिप्ट मिले.

इस फिल्म की अच्छी बात यह भी है कि यह भोजपुरी फिल्म की गायक हीरो की घटिया सीरिज को तोड़ती है. दर्शक भी गायक सीरिज से ऊब गए हैं, यह दिखता है. भोजपुरी फिल्मों का भला भी तभी होगा, जब फिल्मकार गायक सीरिज के हीरो से मुक्ति पाएँगे और अच्छे अभिनेताओं पर विश्वास कर उन्हें मौका देंगे. गायक सीरिज का तमाशा बहुत हो गया. अगर यह परिवर्त्तन आता है, तो बेशक हम कह सकते हैं कि भोजपुरी सिनेमा के भी अच्छे दिन आनेवाले हैं.           



   धनंजय कुमार

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