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Roy
अच्छी फ़िल्म होते-


Vikramjit Singh
Writer - Director


























Film Review
Roy:अच्छी फ़िल्म होते-होते


Roy- अच्छी फ़िल्म होते-होते रह गई... 

रॉय, एक सफल फ़िल्म हो सकती थी लेकिन.....एक अच्छे स्टोरी आइडिया और सटीक क्राफ़्ट और रणबीर कपूर जैसे स्टार के बाद भी अगर ये फ़िल्म सफल नहीं होगी इसके लिए पूरी तरह इसके डायरेक्टर-राइटर विक्रमजीत सिंह जिम्मेदार होंगे. अगर वो थोड़ा ख़तरा उठाते तो ये फ़िल्म एक बेहतर फ़िल्म होती और रणबीर कपूर की मदद से शायद ज़रूरत भर के पैसे भी कमा लेती. अगर उन्होंने जैकलीन फर्नाडिंज जैसी नई आई कैंडी की जगह किसी अभिनेत्री को लिया होता, अर्जुन रामपाल जैसे माचो लुक वाले एक्टर की किसी ऐसे एक्टर को लिया होता जो 80% इमोशनल फ़िल्म में दर्शकों से कनेक्ट कर पाता. और सबसे बड़ी बात फ़िल्म को ढाई घंटे तक खींचने के बजाय थोड़ा टाइट पेस के साथ पेश किया जाता है तो ये फ़िल्म अपनी मौजूदा हाल से बेहतर हालत में होती.

फ़िल्म को इसके भ्रामक प्रमोशन से भी नुकसान पहुँचेगा. हॉल में आए ज़्यादातर दर्शक एक क्राइम थ्रिलर देखने आए थे जिसमें चाकलेटी रणबीर कपूर एक बड़े चोर बने हैं. रणबीर कपूर ने फ़िल्म में ठीक काम किया है.

Roy एक रोमांटिक थ्रिलर है जिसे देखकर जॉन कैम्पेला की 'द सिक्रेट इन देयर आइज़'(2009) याद आती है. ऐसी आइडियाज़ को टाइट स्क्रिप्ट के साथ रिकार्डो डैरिन और सोलेदाद विलामिल जैसे अभिनेता चाहिए होते हैं, न कि अर्जुन रामपाल जैसे माचो हीरो और जैकलीन फर्नाडीज जैसी आई कैंडी.

रॉय, चाकलेटी रणबीर कपूर और क्राइम थ्रिलर की उत्तेजना की तलाश में आए दर्शकों को काफ़ी निराश करेगी. लेकिन सेंसिटिव और क्रिएटिव दर्शकों को फ़िल्म ठीक-ठाक वन-टाइम वॉच लगेगी. क्योंकि हर क्रिएटिव आदमी के जीवन में कोई न कोई रॉय होता ही है और हर सेंसिटिव आदमी अपनी तमाम कमियों के बावजूद भी 'कवि क्या कहना चाहता है' इसे महसूस कर ही लेता है.   

फ़िल्म का संगीत अच्छा है. मीत ब्रदर्स अंजान और कनिका कपूर का चिट्टियाँ कलाइयाँथिरकते पैरों को भाएगा. वहीं अंकित तिवारी 'सुन रहा है न तू', 'तेरी गलियाँ…' के बाद एक बार फिर टूट हुए दिलों की आवाज़ बनकर, 'तू है कि नहीं...' ले कर आएँ हैं...जिसका सेंटी मूड सेंटी लोगों को पसंद आएगा.  

 



   Rangnath Singh

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