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शमिताभ
बे सिर पैर कथानक


बाल्कि आर
लेखक - निर्देशक


निगेल जेनिस
लेखक


























Another Take
शमिताभ :Bollywood का दो घंटे का विज्ञ


(ये समीक्षा उनके लिए है जो  शमिताभ देख चुके हैं)

शमिताभ देखने के बाद मेरे ज़हन में पहला ख़्याल ये आया कि किसी अभिनेता की आवाज़ अमिताभ बच्चन जैसी न हो तो भी वो दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनन्द, बलराज साहनी, राजकुमार, संजीव कुमार, राजेश खन्ना, अनिल कपूर, सन्नी देओल, आमिर ख़ान या सलमान ख़ान हो सकता है. आवाज़ किसी अभिनेता को ख़ास पहचान देती है लेकिन ये उसके फ़न का सबसे ज़रूरी हिस्सा तो नहीं ही है. जिसे अभिनय आता है, जिसे संवाद अदायगी आती है उसके करियर पर इस बात को ज़्यादा असर नहीं पड़ता कि उसकी आवाज़ नाभि से निकलती है या गले से या मुँह से.
 

मुझे दूसरा ख़्याल यह आया कि ये तो बस वक़्त-वक़्त ही बात है वरना दुनिया का अबतक का सबसे बड़ा ग्लोबल स्टार चार्ली चैप्लिन बेआवाज़ ही था, जिसकी नकल आने वाले कई दशकों तक कई सवाक अभिनेता करते रहे. 

 

तीसरा ख़्याल यह आया कि अगर श्रीदेवी उधार की हिन्दी आवाज़(डॉयलॉग डबिंग) के साथ हिन्दी फ़िल्मों की सबसे बड़ी हिरोइनों में से एक बन सकती हैं तो दानिश क्यों नहींजो डबिंग कलाकार दूसरे हीरो-हीरोइनों के लिए सालों से आवाज़ देते आए हैं उनके अंदर भी वैसा आत्मसंघर्ष होता है जैसा शमिताभ में अमिताभ के अंदर होता दिखाया गया हैया क्या हिन्दी फ़िल्मों में हीरो के लिए बॉडी डबल की भूमिका करने वाले कलाकारों के मन में भी किसी फ़िल्म में अपने कंट्रिब्यूशन की पहचाने जाने की इच्छा होती हैक्या किसी दिन कोई बॉडी डबल किसी कुतुबमिनार पर चढ़कर चिल्लाकर ये कहेगा कि सलमान या आमिर का वो डेंजर वाला स्टंट मैंने किया था!!

 

शमिताभ, पूरी तरह से अमिताभ बच्चन के लिए बनाई गई फ़िल्म है जिसे फ़िल्म  कहना इसकी तारीफ़ करना ही होगा. अगर सही तरीके से कहा जाए तो यह अमिताभ बच्चन और बॉलीवुड का दो घंटे से ज़्यादा लंबा विज्ञापन है. या इसे कई ऑडियो-विज़ुअल चुटकुलों का कलेक्शन कहा जा सकता है. ये फ़िल्म बस दर्शकों को वहीं पसंद आती है जहाँ कोई कॉमिक सीन है. ये अलग बात है कि ज़्यादातर कॉमिक सीन फ़िल्म में जुगाड़ से फिट किए गए लगते हैं.

 

दो घंटे की फ़िल्म में अगर चार-पाँच मज़ेदार कॉमिक सीन हों उस फ़िल्म को देखने के बाद दर्शक फ़िल्म के प्रति इतनी उदारता ज़रूर बरतते हैं कि उसे 'वन टाइम वाच कहके उसकी इज़्ज़त बचा लें. वरना, घर जाकर कोई ये सोचे कि फ़िल्म थी क्या और किस बारे में थी तो उसे लगेगा कि उसका कोई सिर-पैर ही नहीं था.

 

अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान की तरह ख़ुद अपनी ही फ़िल्म में अपनी पुरानी फ़िल्मों को श्रद्धांजलि देते दिखते हैं. फ़र्क बस इतना है कि अमिताभ अपना लेवल शाहरुख़ के लेवल तक नहीं गिराते. फ़िल्म के निर्देशक का फ़िल्म बनाने के पीछे क्या मक़सद था ये तो वो जानें लेकिन फ़िल्म देखकर ये लगा कि उन्होंने अमिताभ की आवाज़ और अभिनय को ट्रिब्यूट देने, लाइफ़ब्वॉय और किंडल जैसे प्रोडक्ट के विज्ञापन दिखाने, धनुष को दूसरी हिन्दी फ़िल्म में कथित अभिनय का मौक़ा देने और अक्षरा हासन को करियर ब्रेक देने के लिए फ़िल्म बनाई है. 

 

रामगोपाल वर्मा ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि फ़िल्म के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ स्क्रिप्ट है लेकिन आजकल फ़िल्में पैकेजिंग से बनती हैं. शायद आर बाल्की का भी कुछ ऐसा ही दर्शन हो. अब ये अलग बात है कि रामू ये दर्शन देने से पहले शिवा और सत्या जैसी मार्डन क्लासिक बना चुके थे. बाल्की शायद भूल गए कि फ़ीचर फ़िल्म कोई एड फ़िल्म नहीं होती जो आधे-एक मिनट के किसी क्लिकिंग आइडिया के दम पर चल निकले. फ़िल्मों में किसी आइडिया को घंटे-दो घंटे तक क्लिक करते रहना होता है.

 

अमिताभ बच्चन तो अमिताभ बच्चन हैं, उन्हें सत्तर पार की उम्र में पर्दे पर अललटप्पू कहानी में बढ़िया अभिनय करते देखना राहत की बात है. हिन्दी सिनेमा के इतिहास में वो पहले अभिनेता हैं जिसे केंद्र में रखकर फ़िल्म बन रही है. इस श्रेणी में दिलीप कुमार की विधाता, क्रांति और सौदागर जैसी फ़िल्में ही याद आती हैं. लेकिन दिलीप साहब ने चीनी कमनिःशब्द, पा या शमिताभ जैसी फ़िल्में तो नहीं ही की थीं. 

 

फ़िल्म में धनुष को बेमिसाल अभिनय प्रतिभासम्पन्न अभिनेता दिखाया गया है. ये सच है कि फिल्म में उन्होंने सलमान ख़ान से बेहतर अभिनय किया है लेकिन ये भी सच है कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में अभी तक एक ही बस कंडक्टर सुपरस्टार बना है और वो हैं उनके ससुर रजनीकांत. और ये शायद रजनीकांत का स्टारडम ही है कि धनुष  को अपना जो भी है, जैसा भी है वो अभिनय दिखाने का मौक़ा मिल रहा है. बहरहाल, उनकी अभिनय प्रतिभा कितनी है ये तो आने वाले कुछ सालों में पता चल ही जाएगा. 

 

कमल हासन की छोटी बेटी अक्षरा हासन के बारे में इससे ज़्यादा कुछ नहीं जा सकता है कि वो फ़िल्म में स्वीट लगी हैं. पहली फ़िल्म में तो स्वीट लगने से काम निकल सकता है लेकिन उसेक बाद क्या होगा?

 

फ़िल्म में अमिताभ बच्चन और धनुष को दुनिया के महानतम अभिनेताओं और निर्देशकों के पोस्टरो से घिरा हुआ दिखाया गया है. फ़िल्म देखकर समझ नहीं आया कि बाल्की उनके माध्यम से हिन्दी फ़िल्मों की दरिद्रता पर व्यंग्य कर रहे हैं या अपने दोनों कलाकारों को प्रेरणा देने की कोशिश कर रहे हैं. बाल्की ने एक जगह तो अमिताभ को बहुत ही हास्यास्पद बना दिया है जब वो शराब के नशे में रॉबर्ट डी नीरो को चुनौती देते नज़र आते हैं. जाहिर उनकी पीढ़ी या उनके  बाद की पीढ़ी का कोई बॉलीवुड अभिनेता डी नीरो को ऐसी चुनौती होशो-हवाश दुरुस्त रहते हुए नहीं दे सकता.

 

शमिताभ जैसी फ़िल्मों की अगर गंभीर समीक्षा करने को कोई भी कोशिश बचकानी है क्योंकि ऐसी फ़िल्में किसी तरह की गंभीरता को प्रश्रय नहीं देतीं. अगर हिन्दी फ़िल्म के डायरेक्टर किसी वन लाइन आइडिया, कुछ हीरो-हीरोइन, डांस-म्यूज़िक-सॉन्ग, फ़न एंड फ़ाइट को जोड़कर एक ऐसा प्रोडक्ट बना सकते हैं जिससे दर्शकों को 'मज़ा' आए तो इन फिल्मों पर लिखते समय समीक्षकों को भी 'मज़ा' ही लेना चाहिए.

 



   रंगनाथ सिंह

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