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साफ-सुथरी
भोजपुरी फिल्म


ओम प्रकाश यादव
लेखक - निर्देशक


























Film Review
सजना मँगिया सज:साफ-सुथरी भोजपुरी फिल्


 

भोजपुरी फिल्म समीक्षा

सजना मँगिया सजाई दS हमार :  साफ-सुथरी भोजपुरी फिल्म  

कथा : एल वी शास्त्री

पटकथा-संवाद       : ओमप्रकाश यादव

गीत : राकेश निराला और कन्हैया कुशवाहा

संगीत : राकेश निराला

निर्देशक : ओमप्रकाश यादव (ओम जी)

निर्माता: हलचल सिंह

कलाकार : अरविन्द अकेला कल्लु, नेहाश्री, अजित आनन्द, प्रीति सिंह, मनोज टाइगर, सी पी भट्ट, अमित कुमार, चन्दन सिंह कश्यप, बालसोर सिंह और सुरेन्द्र पाल. 

 

मुम्बई के सिनेमाघरों में इस शुक्रवार रिलीज हुई भोजपुरी फिल्म का नाम है “सजना मँगिया सजाई दS हमार”. यह फिल्म न सिर्फ टाइटिल से भोजपुरी है बल्कि पृष्ठभूमि में भी भोजपुरिया परिवेश है. गाँव, गली, घर, खेत, बैलगाड़ी, झूला, खटिया, गाय, भैंस सब हैं. हालाँकि, एल वी शास्त्री की कहानी में कोई मौलिकता और नयापन नहीं है, फिर भी कहानी में भोजपुरीपन है. शास्त्री जी ने फिल्म की कहानी में एक साथ कई नए पुराने मुद्दों को पिरोने की कोशिश की है, लेकिन इस क्रम में कोई भी विषय मजबूती से अभिव्यक्त नहीं हो पाई है. हिन्दू-मुस्लिम भाईचारा, बेटी बचाओ, डॉक्टरों को सेवाभाव से गाँव के अस्पतालों में भी काम करना चाहिए, किसानी से विमुख होते युवावर्ग, प्रेमकथा, शिवगुरू का प्रचार और फिर हिन्दी फिल्म “मैंने प्यार किया” का प्रभाव.

पटकथा और संवाद लेखक ओमप्रकाश यादव, जो कि फिल्म के निर्देशक भी हैं, कहानी को रोचक स्क्रिप्ट में ढालने में नाकामयाब रहे हैं. दृश्य बेहद सतही और संवाद बस चलताऊ हैं. फिर भी फिल्म का धवल पक्ष यह है कि फिल्म साफ-सुथरी है. न वल्गर आइटम साँग है और न ही फूहड़ दृश्य और न ही द्विअर्थी संवाद. यहाँ तक कि होली गीत में भी वही शालीनता बरती गई है. हीरोइनों की वेशभूषा भी भोजपुरी क्षेत्र के अनुकूल है. यही वजह है कि स्क्रिप्ट स्तर पर कई तकनीकी कमियाँ होने के बावजूद फिल्म अच्छी लगती है और अस्सी के दशक की भोजपुरी फिल्मों की याद दिलाती है.

फिल्म मूल तौर पर एक फॉर्मूला प्रेमकथा पर आधारित है, जिसकी प्रेरणा 1989 में आई राजश्री प्रोडक्शंस की सुपरहिट “मैंने प्यार किया” से ली गई है. ‘मैंने प्यार किया’ में अमीर लड़के और गरीब लड़की के प्रेम की कथा थी, यहाँ भी हीरो राजा (अरविन्द अकेला कल्लु) गाँव के बड़े किसान (सुरेन्द्र पाल) का बेटा है, जबकि हीरोइन कुसुम (नेहाश्री) उनके हलवाहा की बेटी है. राजा के प्रेम को राजा के पिता गरीब हलवाहे की बेटी की वजह से नकार देते हैं. राजा अपना बड़ा घर छोड़कर कुसुम के मिट्टी के घर में आ जाता है, मगर यहाँ कुसुम के पिता शर्त रखते हैं कि गरीब किसान बनकर रहना होगा. राजा अपना प्यार पाने के लिए यह शर्त स्वीकार लेता है और अंततः शर्त्त जीतता है.

हीरोइन का पिता अपनी बेटी के लिए दामाद किसान चाहता है. यह भोजपुरिया क्षेत्र के लिए बड़ा ही विचारोत्तेजक विषय है. बिहार और उत्तरप्रदेश देश के दो बड़े कृषि प्रधान प्रदेश हैं और वास्तविकता यह है कि कृषि की लगातार बुरी होती हालत की वजह से वहाँ के युवक खेती और गाँव छोड़कर रोजी-रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. स्थिति यह है कि पढ़-लिखा युवा ही नहीं, अनपढ़ मजदूर युवा वर्ग भी खेती और गाँव से दूर होता जा रहा है.

हालाँकि खेती और गाँव से पलायन इस क्षेत्र में कोई नई समस्या नहीं है. लेकिन फर्क यह है कि आजादी के पहले जमीन्दारों से त्रस्त होकर, मजबूरी में छोटे किसान और मजदूर भागकर शहर आते थे, जबकि आज बड़े किसानों के बेटे भी आराम की नौकरी करने और अपने स्वप्नों को पूरा करने के लिए शहरों का रुख कर रहे हैं.

गाँव के लोग पहले ‘उत्तम खेती मध्यम बान, निम्न चाकरी भीख निदान’ कहा करते थे. मतलब खेती का कार्य सबसे उत्तम है, बिजनेस मध्यम दर्जे का काम है, जबकि चाकरी यानी नौकरी सबसे निम्न स्तर का कार्य है और भीख बस किसी तरह पेट भरने भर के लिए है. लेकिन यह कहावत अब गाँव में अप्रासंगिक हो गई है. गाँव में रह रहे हर माता-पिता की यही इच्छा है कि उसका बेटा खेती से हटे और पढ़ लिखकर कोई अच्छी - सी नौकरी करे. यह इच्छा खेती की अनिश्चितता और उनकी उपज की न्यूनतम कीमत मिलने की वजह से उपजी है.

महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और आंध्र प्रदेश के किसानों की तरह आत्महत्या कर लेने की प्रवृति यूपी-बिहार के किसानों में इसलिए नहीं है कि उनके समाजों में पलायन की परंपरा बहुत पुरानी है. लेकिन इसी पलायन की वजह से यूपी-बिहार के गाँव पहले जितने सुन्दर हुआ करते थे, आज उतने ही बदहाल और उजाड़ से दिखते हैं. हालाँकि सुखद बात यह है कि अमीर वर्गों में न सही, मजदूर वर्ग के लोगों में अभी भी अपनी माटी के प्रति प्रेम है. गाँव अभी भी उनके दिल और दिमाग बसा है. तभी तो वे कमाने के लिए भले ही मुंबई, दिल्ली, सूरत आदि शहरों में आते हैं, मगर कमाई का बड़ा हिस्सा बचाकर खेत खरीदने और पक्का घर बनाने के लिए गाँव भेज देते हैं. भोजपुरी फिल्मों के दर्शक भी इसी वर्ग के लोग हैं. लेकिन दुख की बात यह है कि भोजपुरी फिल्मों के लेखकों और फिल्मकारों में इस टीस को पहचानने की समझ नहीं है.

‘सजना मँगिया सजाई दS हमार’ के कथाकार एल वी शास्त्री जी ने यह इस टीस को पहचाना है, ये अलग बात है कि फिल्म लेखन के शिल्प की जानकारी नहीं होने की वजह से दोनों लेखक अपनी बात सही तरह से अभिव्यक्त नहीं कर पाए हैं. सिनेमाहॉल में बैठे दर्शक बावजूद इसके फिल्म को इंज्वाय कर रहे रहे थे. और यह बात संभावना जगाती है कि भोजपुरी में अच्छी फिल्म की संभावना अभी भी बची है.                    

गीतकार राकेश निराला और कन्हैया कुशवाहा के पास अच्छे गीत लिखने का मौका था, मगर दोनों में किसी भी गीतकार ने उसका लाभ नहीं उठाया है. गीत के बोल निष्प्रभावी हैं. संगीतकार राकेश निराला संगीत में भी कुछ कमाल नहीं कर पाए हैं.

निर्देशक ने इस फिल्म में कल्लु से भी अभिनय करवा लिया है. नेहाश्री ने अच्छी अभिनेत्री होने का सबूत दिया है. अमित कुमार ने कॉमेडी में सहजता बनाए रखी है. सुरेन्द्रपाल सीजन्ड एक्टर की तरह हैं.       

 

 

 

 

 



   Dhananjay Kumar

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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