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Chhora Ganga Kinarewala
यादों को बर्छी से ब


Santosh Mishra
Writer


























Film Review
छोरा गंगा किना:यादों को बर्छी से बिंध


भोजपुरी फिल्म समीक्षा

छोरा गंगा किनारेवाला :  यादों को बर्छी से बिंधनेवाला  

लेखक : संतोष मिश्रा

गीत : राजकुमार आर. पाण्डेय, प्यारेलाल यादव और संतोष पुरी

निर्माता : धीरेन्द्र चौबे

निर्देशक : राजकुमार आर. पाण्डेय

कलाकार : प्रदीप पांडेय चिंटु, बेनजीर खान, रवि किशन, स्वीटी छाबड़ा, संजय पांडे, अवधेश मिश्रा, सीमा सिंह, ब्रजेश त्रिपाठी आदि

मुम्बई के सिनेमाघरों में भोजपुरी दर्शकों के लिए इस सप्ताह जो फिल्म रिलीज हुई है उसका नाम है “छोरा गँगा किनारेवाला”. नाम सुनकर याद आते हैं अमिताभ बच्चन, सुपरहिट फिल्म ‘डॉन’ और अंजान लिखित उस फिल्म का कर्णप्रिय और बेहद लोकप्रिय गीत “खइके पान बनारसवाला...”

फिल्म का नायक राजू गाइड है. राजू गाइड सुनकर क्लासिक फिल्म “गाइड” के नायक देव साहब बरबस याद आ रहे हैं. और याद आ रहे हैं आर के नारायण, जिनके कालजयी उपन्यास “द गाइड” पर यह फिल्म बनी थी, और याद आ रहे हैं विलक्षण निर्देशक विजय आनन्द तथा फिल्म की नायिका वहीदा रहमान. लेकिन दुख की बात यह है कि भोजपुरी फिल्म “छोरा गँगा किनारेवाला” हमारी यादों को बर्छी से बुरी तरह बिंध देता है. फिल्म देखते हुए मन शर्मनाक टीस से भर जाता है. और फिल्म रायटर्स एसोसिएशन की वेबसाइट के लिए  इस फिल्म की समीक्षा लिखते हुए मुझे यह सोचना पड़ रहा है कि क्या भोजपुरी फिल्म के नाम पर जो कुछ दिखाया जा रहा है, वह वाकई हमारे समाज के लोगों का मनोरंजन कर पाती हैं? और अगर ये फिल्में मनोरंजन करती हैं तो वह कौन सा दर्शक वर्ग है?

भोजपुरी फिल्में सिर्फ भोजपुरी भाषी समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं, बल्कि यह पूरे बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तरप्रदेश के विभिन्न भाषाओं मगही, मैथिली, अंगिका, बज्जिका, अवधी, खोरठा, कुर्माली आदि दसियों भाषिक समाजों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं. इसलिए ये भोजपुरी फिल्में हमारे समाज के चिंतन, संस्कृति और कलात्मक समझ पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं.

हमारे क्षेत्र से सिर्फ मजदूरों ने ही शहरों की ओर पलायन नहीं किया, बल्कि पढ़े-लिखे और भद्र जनों ने भी पलायन किया. और लोग अपने क्षेत्र-प्रदेश का बखान करते हुए प्रायः कहते-सुनते मिल जायेंगे कि देश में सबसे ज्यादा आइएस, आइपीएस ऑफीसर, इंजीनियर, डॉक्टर और बैंक पीओ हमारे ही समाजों से आते हैं. फिर सवाल उठता है कि भोजपुरी फिल्मों के दर्शक सिर्फ मजदूर वर्ग ही क्यों है? और मजदूर वर्ग में भी सिर्फ पुरुष ही क्यों हैं? इस वर्ग की महिलाएँ भोजपुरी फिल्में देखने क्यों नहीं आतीं? 

ऎसा भी नहीं है कि भोजपुरी भाषियों को अपनी भाषा और अपने लोकसंगीत से लगाव नहीं है? महेन्दर मिसिर और भिखारी ठाकुर भोजपुरी समाज के दो बड़े लोक कलाकार और लेखक-गीतकार हुए. विन्ध्यवासिनी देवी, शारदा सिन्हा जैसी लोकगायिका हुई, जिनके गाए गीत घर-घर में सुने गए. आज भी सुने जाते हैं. फिर भोजपुरी फिल्मों का ऎसा हश्र क्यों?

1962 में जब पहली भोजपुरी फिल्म बनी थी, तो उसके गीत हिन्दी फिल्मों के महान गीतकार शैलेन्द्र ने लिखे थे, दूसरी फिल्म लागी “नाहीं छूटे रामा” के गीत मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखे थे, लेकिन आजकल की फिल्मों के गीत इतने गंदे क्यों ?

भोजपुरी फिल्मों और अलबमों के मामले में सेंसर बोर्ड और सरकारी सांस्कृतिक एजेंसियों ने भी बड़ी गैर जिम्मेदारी का काम किया है. गानों और फिल्म के दृश्यों में कामोत्तेजना भड़काने वाले अश्लील विषय और भाव आँख मूदकर पब्लिक तक जाने दीजिए. वेश्याओं पर अश्लीलता फैलाने का केस दर्ज करनेवाली पुलिस भोजपुरी फिल्मों के मामले में कानून की धाराएँ भूल जाती है. संस्कृति बचाने का दावा कर कभी वेलेंटाइन डे और जब तब पार्कों में बैठे प्रेमी जोड़ों को पकड़कर शालीनता और संस्कृति का पाठ पढ़ाने वाले समाज के ज्ञानी ठेकेदार भोजपुरी फिल्मों और अलबमों पर एक बार भी तलवार क्यों नहीं भाँजते?

2000 के बाद की भोजपुरी फिल्मों ने जो दर्शक वर्ग तैयार किया है, उसे देखकर चिंता होती है हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है.... ? मनोरंजन के नाम पर क्या सिर्फ काम कुंठाएँ ही है इस वर्ग के पास? जहाँ स्त्री सिर्फ देह है और पुरुष हवसी, वहसी और जानवर से भी बदतर हो जाता है.

इस फिल्म की स्क्रिप्ट भी संतोष मिश्रा ने इसी विषय को आधार बनाकर लिखी है. हीरो राजू गाइड; गाइड कम, छिछोरा लड़का ज्यादा है. वह हरिद्वार घूमने आई एक लड़की का जबरन गाइड बन जाता है और फिर भद्दे डायलॉग मार मार के उससे प्यार करने लग जाता है. इस बीच दोनों रास्ता भटक जाते हैं और जंगल में फंस जाते हैं. वहाँ दोनों का सामना दो आदिवासी भाई-बहन से होता है, दोनों सेक्स के भूखे हैं. राजू अविश्वसनीय मारपीट कर हीरोइन को जंगल से निकलता है.  फिर उसका सामना होता है सामंती सोच रखनेवाले लड़की के पिता और होनेवाले उसके पति और ससुर से. फिर हीरो की अविश्वसनीय फाइट होती है. इस क्रम में हीरोइन जख्मी हो जाती है. हीरो उसे लेकर हॉस्पीटल आता है, लेकिन पुलिस हीरो को गिरफ्तार कर लेती है. जहाँ उसकी मुलाकात एक महिला जेलर से होती है. वह महिला जेलर हीरो की कहानी सुनने के बाद अपनी कहानी सुनाती है कि किस तरह से उसकी (राजू गाइड ) प्रेमिका के होनेवाले पति और उसके बाप ने उसके इंस्पेक्टर पति की हत्या कर दी. महिला जेलर हीरों को जेल से भागने में सहायता करती है. और फिर हीरो बदमाशों को उसके आखिरी अंजाम तक पहुँचाता है.

स्क्रिप्ट में कैरेक्टराइजेशन का इतना लोचा है कि कौन हीरो है और कौन विलेन फर्क करना मुश्किल है. विलेन किसी लड़की का रेप कर देता है, तो गेस्ट अपियरेंस में पधारे हीरो रविकिशन अपने सिपाही से कहता है कि कमरे में ले जाकर इसके साथ भी वही करो, जो इसने लड़की के साथ किया. वाह रे हीरो...! संतोष मिश्रा ने खूब बेमतलब की डायलॉगबाजी की है, गंदे शब्दों का भी छककर इस्तेमाल किया है.   

गीत राजकुमार आर. पाण्डेय, प्यारेलाल यादव और संतोष पुरी ने लिखे हैं. पहला गीत फिल्म में अच्छा लगता है. दूसरा गीत जो कि हीरो हीरोइन का पहला रोमांटिक गीत है, बल्गर है. एक गीत मोहरा फिल्म के गीत ‘ना कजरे की धार, ना कोई किया सिगार’ की पेरोडी है.              कुल मिलाकर मैं भोजपुरी फिल्मों का कॉमर्स समझने की कोशिश कर रहा हूँ. निर्देशक राजकुमार आर पांडेय ने पिछले दिनों फिल्म रायटर्स एसोसिएशन द्वारा आयोजित महेन्दर मिसिर के कार्यक्रम में ऎसी फिल्मों को डिफेंड करते हुए कहा था कि फिल्में दो प्रकार की होती हैं, एक आर्ट्स्टिक फिल्में और दूसरी कमर्शियल फिल्में. हाल की ऎसी ही कुछ फिल्मों को देखकर मैं कह सकता हूँ कि कमर्शियल फिल्में भी दो प्रकार की होती है, एक अच्छी फिल्में, जिन्हें परिवार के साथ देखी जा सकती हैं और दूसरी वो, जिन्हें सिर्फ स्त्रियों को लेकर विकृत सोच रखनेवाले काम कुंठित पुरुष देख सकते हैं.

तोहरा देखले बिना मन कैसे भरी-गीत

 



   धनंजय कुमार

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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