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औरत खिलौना नहीं
पर उपदेश कुशल बहुत


Aslam Shaikh
Writer - Director


























Film Review
औरत खिलौना नही:पर उपदेश कुशल बहुतेरे


भोजपुरी फिल्म समीक्षा

औरत खिलौना नहीं : पर उपदेश कुशल बहुतेरे

 

कथा-पटकथा :     असलम शेख़

संवाद        :     मनोज कुशवाहा

गीत         :     प्यारेलाल यादव, संतोष पुरी, पंकज वसुधरी और शोमारू भारद्वाज

निर्देशक      :     असलम शेख

निर्माता      :     अविनाश रोहरा एवं मो. असलम

कलाकार     :     मनोज तिवारी, रिंकु घोष, मोनालिसा, मोहिनी घोष, अवधेश मिश्रा, आलोक

यादव, ऋतु पांडे, प्रकाश जैस आदि...

 

 

यह फिल्म आम भोजपुरी जैसी वल्गर नहीं है, मगर ऎसी भी नहीं है, जिसकी बहुत तारीफ की जाय... फिल्म की कथा-पटकथा खुद निर्देशक असलम शेख ने लिखी है. असलम शेख भोजपुरी फिल्मों के नामचीन निर्देशक हैं. कई फिल्में निर्देशित कर चुके हैं. इस दौर के भोजपुरी फिल्मों के निर्देशकों की श्रृंखला में वह बेहतर निर्देशक हैं. मगर लेखक के तौर पर यह फिल्म बेहद बासी और सतही है. फिल्म का आइडिया हिन्दी फिल्म ‘रंग दे बसंती’ से उठाया गया है. मगर कथा का विस्तार गड़बड़ है और पटकथा पूरी तरह फिल्मी. इसलिए अच्छा आइडिया कॉपी करने के बाद भी फिल्म वह प्रभाव पैदा नहीं कर पाती. ‘रंग दे बसंती’ में भगत सिंह पर नाटक कर रहे लड़के भगत सिंह से प्रेरित होते हैं और इस फिल्म में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई पर नाटक रही लड़कियाँ लक्ष्मीबाई से प्रेरित (?) होती हैं. मगर दोनों फिल्म में स्वर्ग और नर्क का फर्क है.

भोजपुरी फिल्मों में हिन्दी टाइटिल का चलन यहाँ भी बदस्तूर है. पता नहीं भोजपुरी में इन्हें कोई अच्छा टाइटिल क्यों नहीं मिलता? और भोजपुरी अगर इतनी कंगाल भाषा है कि अच्छा शीर्षक तक नहीं मिलता, तो भोजपुरी में फिल्म बनाते क्यों हो भाई? बहरहाल, फिल्म का नाम ‘औरत खिलौना नहीं’ रखा है लेकिन पूरी फिल्म में लेखक-निर्देशक-अभिनेता खुद उसी से ही खेलते रहे हैं. फिल्म में रेप और रेप की कोशिश की प्रचुरता है... औरत की कहानी में दहेज आ जाये तो कहानी भोजपुरिया लगने लगती है..? हिंदी फिल्मों से तो दहेज कब का निर्वासित हो चुका है. मनोज तिवारी गेस्ट आर्टिस्ट की तरह हैं, एक नया लड़का (नाम नहीं मालूम) सिर्फ एक्शन के लिए गढ़ा गया है. तीन हीरोइने हैं रिंकु घोष (रजनी), मोनालिसा (माला) और मोहिनी घोष (मोना). माला और मोना के साथ रेप हो जाता है, जबकि रजनी को सरेआम नंगा किया जाता है. इसके अलावा आइटम साँग हैं. पूरी फिल्म में विलेन अवधेश मिश्रा और उनके सुपुत्र लड़की को देखते ही रेप के लिए लालायित हो जाया करते हैं. प्रकाश जैस और ऋतु पांडे का कॉमेडी ट्रैक भी देह के खेल से ही जुड़ा हुआ है.

कहानी तो जो है सो है, पटकथा के तौर पर मनमाना दृश्यों का संयोजन है. दृश्यों की लड़ी बिल्कुल ही कंविंसिंग नहीं है. यही वजह है कि फिल्म दर्शकों से कहीं भी जुड़ नहीं पाती. पटकथा पर फिल्मी झटकों का जोर है. मनोज कुशवाहा के संवाद बेहद फूहड़ हैं.

‘चुम्मा-चाटी बहुत भईल कब राति के खटिया हीली’ यह रोमांटिक गीत है, मेन हीरो अपनी पहली प्रेमिका (इसका भी रेप होता है और बेचारी आत्माहत्या कर लेती है. हीरो उस बलात्कारी का खून करके भगोड़ा अपराधी का जीवन जी रहा है) के साथ यह गीत गाता है. बाकी गीत  और फिल्मों की तुलना में थोड़े बेहतर हैं, मगर संगीतकार धनंजय मिश्रा किसी भी गीत को गुनगुनाने लायक बनाने में सफल नहीं हो पाए हैं. रिंकु घोष में ताजगी नहीं रही अब. मोनालिसा भी खुद बार-बार रिपीट कर रही है. अवधेश मिश्रा की उपस्थिति प्रभाव पैदा करती है. उनके बेटे के तौर पर नए लड़का भी बढ़िया है.

 

धनंजय कुमार   

  

 



   Dhananjay Kumar

Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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