1
 


दिल भईल दीवाना
न दिल है न कोई दीवान


























Film Review
दिल भईल दीवाना:न दिल है न कोई दीवाना


भोजपुरी फिल्म

दिल भईल दीवाना
न दिल है न कोई दीवाना  

कथा:- अरविन्द चौबे

पटकथा-संवाद:- लालजी यादव

गीत:- प्यारे लाल यादव, आर आर पंकज, मनोज मतलबी

निर्माता एवं निर्देशक :- अरविन्द चौबे

कलाकार:-    अरविन्द अकेला कल्लू, अर्चना सिंह, निशा दुबे, संजय पांडे, माया यादव,

      आलोक यादव, विराज भट्ट और मोनालिसा

 

दिल भईल दीवाना इस सप्ताह मुंबई में रिलीज हुई नई फिल्म है. फिल्म की कहानी खुद निर्माता-निर्देशक अरविन्द चौबे ने लिखी है. कहानी क्या है गंदे गाने गाकर हिट हुए गायक कलुआ उर्फ अरविन्द अकेला ‘कल्लू’ की लोकप्रियता को भुनाने के ख्याल से जैसे-तैसे कुछ जोड़  लिया गया है. पटकथा लेखक लालजी यादव ने भी निर्माता-निर्देशक की वैसी ही मदद की है, जैसी निर्माता-निर्देशक ने चाही है. भोजपुरी फिल्मों के तीन फॉर्मूले यहाँ भी हैं वल्गर गाने, हीरोइनों के साथ फूहड़ सीन और जबरदस्ती की फाइट. दोनों लेखकों की पूरी विद्वता इन्हीं के इर्दगिर्द घूमती रही है. बावजूद इसके फिल्म दर्शकों को रिझाने में नाकामयाब रह जाती है, क्योंकि फिल्म में कहीं कोई लय नहीं है. लेखक ने जब जो सीन चाहा, गढ़ लिया है.

स्क्रिप्ट लेखन का अपना व्याकरण और शिल्प है, पुरानी भोजपुरी फिल्मों में कुछ हद तक इसे निभाया भी गया, मगर इस दौर की भोजपुरी फिल्मों ने इसकी भरपूर अनदेखी की है. कहानी के नाम पर हिन्दी फिल्मों की सतही नकल, पटकथा के नाम पर मनचाहे दृश्य और संवाद के तौर पर द्विअर्थी शब्द और भाव, यही है इस दौर की भोजपुरी फिल्मों का सार.

अभिव्यक्ति की आजादी के संवैधानिक अधिकार के तहत ऎसी फिल्मों को रोका नहीं जा सकता, मगर इस तरह की फिल्मों ने भोजपुरी समाज की जिस तरह की छवि खड़ी की है, उसपर आपत्ति तो की ही जानी चाहिए. कहते हैं कला समाज का दर्पण होती है. उन कला विधाओं में सिनेमा भी एक है. क्या हमारी भोजपुरी फिल्में हमारे समाज का दर्पण हैं? कोई गैर भोजपुरी भाषी अगर भोजपुरी फिल्में देखकर भोजपुरी समाज को समझना चाहेगा, तो वह समाज की क्या तस्वीर गढ़ पाएगा?

भोजपुरी फिल्में कभी पूरे बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश की महिलाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ करती थीं. उन फिल्मों के गीत लोकगीत के तौर पर जन-जन में लोकप्रिय हो जाया करते थे. मगर आज की फिल्मों से हमारे समाज की महिलाएँ बाहर हैं, और गीत ऎसे बन रहे हैं कि मर्दों को भी सुनने में शर्म महसूस होती है. और चिंता यह है कि समाज मौन है. गंदे गाने लिखने वाले गीतकार संस्कृति मंत्री बन जाते हैं और गायक सांसद.

ससुरा बड़ा पैसेवाला से गायक का हीरो बनने का जो दौर शुरू हुआ था, वह अब भी जारी है और भोजपुरी फिल्मों की सबसे कमजोर कड़ी यही है. निर्माता-निर्देशक किसी मौलिक या अच्छी सी कहानी कहने के बजाय अलबम से हिट हुए गायकों की लोकप्रियता को भुनाने के लिए कहानी गढ़ते हैं और दिल भईल दीवाना जैसी वाहियात फिल्म बना देते हैं. पता नहीं यह सिलसिला कब थमेगा...?

फिल्म की कहानी यह है कि कल्लू पहले भैया की साली से रोमांस करता है, फिर उसे कॉलेज की एक लड़की पसंद आ जाती है. पहले तो दोनों प्रेमिकाएँ कल्लू को पाने के लिए लड़ती और गाने गाती हैं, मगर बाद में एक लड़की मैदान छोड़कर हट जाती है. मगर अब प्यार के दुश्मन बन जाते है उसके रिश्तेदार और उनके दोस्त, जो कि विलेन हैं, मगर कल्लू को रास्ते से हटाने के लिए फिल्म के दूसरे हीरो विराज को बचकाने तरीके से मजबूर करते हैं. दोनों में जोरदार फाइट होती है....कहानी कुछ समझ में आई? मुझे तो कुछ समझ में नहीं आई.

कल्लू को रत्ती भर भी अभिनय नहीं आता है. विराज भट्ट भोजपुरी फिल्मों के हीमैन माने जाते हैं. भगवान बचाए हीमैन से. माया यादव और संजय पांडे अच्छे कलाकार हैं, मगर ऎसी फिल्में करके अपने आपको वेस्ट कर रहे हैं. गीत-संगीत शोर-शराबे के सिवा कुछ नहीं है.

 

   

  

 



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

Click here to Top