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तीसरी कसम का
घटिया रीमेक


श्री मनोज टाइगर
कथा पटकथा और संवाद


























Film Review
जान लेबू का हो:तीसरी कसम का घटिया Remake


जान लेबू का हो

लेखक- मनोज टाइगर

गीतकार- विनय बिहारी

निर्माता- मनोज कुमार चौधरी

निर्देशक- राजू सिंह

छायाकार- आर आर प्रिंस

कलाकार- पवन सिंह, मोनालिसा, सुशील सिंह, मनोज टाइगर, दीपक सिन्हा, ब्रजेश त्रिपाठी.

 

आज से कोई 47-48 साल पहले यानी 1966 में एक फिल्म आई थी ‘तीसरी कसम’. जी हाँ, वही राजकपूर-वहीदा रहमान अभिनीत फिल्म ‘तीसरी कसम.’ इस फिल्म को इसलिए यहाँ याद करा रहा हूँ कि इस शुक्रवार मुंबई में रिलीज हुई भोजपुरी फिल्म ‘जान लेबू का हो’ की कथा उसी फिल्म से प्रेरित लगती है. तीसरी कसम बिहार के प्रसिद्ध कहानीकार-उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ पर अधारित थी. पटकथा प्रख्यात पटकथा लेखक नबेन्दु घोष ने लिखी थी और संवाद स्वयं फणीश्वर नाथ रेणु ने ही लिखे थे. ‘जान लेबु का हो’ के कथा-पटकथा और संवाद तीनों मनोज टाइगर ने ही लिखे हैं. यह फिल्म ‘तीसरी कसम’ का पासंग भी नहीं है. तल्ख भाषा में कहें, तो तीसरी कसम का कितना घटिया रीमेक किया जा सकता है, ‘जान लेबू का हो’ देखकर आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं. तीसरी कसम की पृष्ठभूमि बिहार ही थी, और इस फिल्म की पृष्ठभूमि भी बिहार है. तीसरी कसम उस समय के ग्रामीण समाज की अदभुत गाथा थी. लेखक की दृष्टि अगर तीक्ष्ण और सम्पन्न होती तो वह आज के बिहार के समाज का चित्रण कर सकता था. किंतु लेखक ने इस फिल्म को भी उन्हीं ऊलजलूल फॉर्मूलों में बाँध दिया, जिनसे भोजपुरी फिल्में लंबे समय से दूषित हैं. बनावटी कहानी, मनचाहे दृश्य और वल्गर संवाद.

तीसरी कसम का नायक हीरामन गाँव का भोला-भाला गाड़ीवान था. इस फिल्म में पवन एक टपोरी किस्म का युवक है. उस फिल्म में हीरोइन हीराबाई नौटंकी की नर्तकी थी और गाँव में नौटंकी ग्रुप के साथ उसका आना हुआ था, जबकि इस फिल्म में फिल्म की शूटिंग के लिए हीरोइन मोना का आना होता है. तीसरी कसम में हीरामन और हीराबाई लंबी और रोचक बैलगाड़ी यात्रा में एक दूसरे के करीब आए थे, जबकि यहाँ, जबरन पवन मोना के करीब आ पहुँचता है. बहरहाल, दोनों फिल्म की और ज्यादा तुलना का कोई मतलब नहीं है यहाँ हम सिर्फ प्रेरणा को दर्शाते हुए मूल फिल्म पर आते हैं.

पवन भोला भाला युवक है, मगर हीरामन की तरह नहीं, 1993 में आई वेंकटेश–करिज्मा कपूर अभिनीत फिल्म ‘अनाड़ी’ के रामा की तरह. हालाँकि दोनों की पारिवारिक और परवरिश की स्थितियाँ बेहद भिन्न हैं. भोजपुरी फिल्मों के साथ गहरी समस्या यह है कि लेखन को बेहद ही बचकाने और मनमाने तरीके से देखा-समझा जा रहा है. इस वजह से शिल्प के स्तर पर कथा, पटकथा और संवाद तीनों कंगाल नजर आते हैं. इस फिल्म के साथ भी यही समस्या है. किसी भी फिल्म में हीरो-हीरोइन से लेकर एक सीन में भी आने वाले चरित्र के कैरेक्टराइजेशन की बड़ी भूमिका होती है, मगर भोजपुरी फिल्मों में प्रायः इस पर ध्यान तक नहीं दिया जाता. इस फिल्म में भी किसी चरित्र पर जरा भी विचार नहीं दिखता है. इसलिए फिल्म बिल्कुल ही प्रभाव नहीं बना पाती है. कलाकारों के अभिनय की सीमाएँ इस समस्या को और उजागर कर देती हैं.

गीत के स्तर पर भी फिल्म में कोई नई बात नहीं है. वही पुरानी उपमाएँ, वल्गर शब्द, वल्गर भाव. ‘तीसरी कसम’ के गीत शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी ने लिखे थे. ‘सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है.’ ‘सजनवा वैरी हो गए हमार.’ ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई काहे को दुनिया बनाई.’ ‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजड़ेवाली मुनिया.’ ‘पान खाय सैयाँ हमारो, मलमल के कुरते पर छींट लाल-लाल.’ आदि गीत आज भी जुबान पर हैं, मगर इस फिल्म का कोई गीत जुबान पर लाने लायक भी नहीं है. जबकि फिल्म के गीतकार भोजपुरी फिल्मों के सबसे बड़े गीतकार विनय बिहारी हैं, जो इस वक्त बिहार के कला और संस्कृति मंत्री भी हैं. फिल्मों-अलबमों के गीतगार के तौर पर कितनी गंध फैलाई है, इससे भोजपुरी गाने सुनने वाले अच्छी तरह परिचित हैं. कला और संस्कृति मंत्री बनने के बाद कुछ तो शर्म करते, मगर... खैर, गीतों के बोल देखिए- ‘मजा मोहब्बत के हमरा से दिल हार के ले लS.’ यह गीत रामलीला समिति की तरफ से आयोजित कार्यक्रम में गाया जा रहा है. बाकी गीतों के बोल हैं, लचके कमरिया, सरके चुनरिया, जान लेबू का हो..., देहिया फैलल जाता राजा महँगाई जे करे..., भोजपुरिया भतार..., चोलिया के खोल दीं बटाम...,  सैयाँ सेजिया पे आवते पथर जाला हो... और ‘कहिया चालू करब हमर लभ के मशीन...’

कुल मिलाकर ‘जान लेबू का हो’ भोजपुरी फिल्मों की लंबी होती लिस्ट में शामिल होती एक फिल्म भर ही है.

धनंजय कुमार   

 

 



   धनंजय कुमार

धनंजय कुमार भोजपुरी और हिंदी फ़िल्म और टीवी के लेखक हैं..

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